बदलती जीवनशैली, अनियमित आहार-विहार, निष्क्रियता, अपर्याप्त निद्रा, मानसिक तनाव व डिजिटल निर्भरता आदि ने स्वास्थ्य जटिलताएं पैदा की हैंै। ऐसे में ‘आयुर्वेदा फॉर अ हेल्दियर टुमॉरो’ स्वास्थ्य की दिशा में एक व्यापक चिंतन का आह्वान है। आयुर्वेद की विशिष्टता है-स्वास्थ्य को केवल रोग की अनुपस्थिति के रूप में न देखकर उसे शरीर, मन, इंद्रियों और आत्मा के समन्वय एवं प्रसन्न स्वरूप में देखना।
मानव जीवन की सबसे बड़ी आकांक्षाओं में से एक है-स्वस्थ, दीर्घ और सार्थक जीवन। मनुष्य ने रोगों की पहचान, निदान और उपचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने अनेक असाध्य समझे जाने वाले रोगों के उपचार के नए द्वार खोले हैं, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि की है और चिकित्सा-प्रौद्योगिकी को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। फिर भी दुनिया के सामने कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका उत्तर केवल अधिक औषधियों, अधिक अस्पतालों अथवा अधिक उन्नत तकनीकों में निहित नहीं है। क्या हम आने वाली पीढ़ियों को केवल दीर्घ जीवन देंगे या वास्तव में स्वस्थ, सुख व खुशहाल जीवन भी दे पाएंगे?
भौतिकवाद की दौड़ में तेजी से बदलती जीवनशैली, अनियमित आहार-सुविधाओं के प्रयोग से शारीरिक निष्क्रियता, अपर्याप्त निद्रा, मानसिक तनाव, डिजिटल निर्भरता, पर्यावरणीय असंवेदनाओं तथा सामाजिक-व्यावसायिक दबावों ने शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को जटिल बना दिया है। ऐसे समय में ‘आयुर्वेदा फॉर अ हेल्दियर टुमॉरो’ केवल पढ़ने का ही विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दिशा में एक व्यापक चिंतन का आह्वान है। ग्यारहवें आयुर्वेदिक दिवस-2026 का यह विषय केंद्रीय आयुष मंत्रालय की समृद्ध आयुर्वेदिक ज्ञान परंपरा को भविष्य की बदलती स्वास्थ्य आवश्यकताओं से जोड़ने की दृष्टि प्रस्तुत करता है।
स्वास्थ्य : रोगमुक्ति से प्रसन्नता तक
आयुर्वेद की सबसे विशिष्टताओं में से एक है-स्वास्थ्य को केवल रोग की अनुपस्थिति के रूप में न देखकर उसे शरीर, मन, इंद्रियों और आत्मा के समन्वय एवं प्रसन्न स्वरूप में देखना। सुश्रुत संहिता में स्वास्थ्य की अत्यंत व्यापक परिभाषा दी है- ‘समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रिया:।। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते’।। इस श्लोक में स्वास्थ्य के दो स्तर स्पष्ट दिखाई देते हैं। पहला है शारीरिक पुष्टि/सौष्ठव: दोषों की समता, रेग्युलेटेड बॉडी फंक्शंस, अग्नि की सम्यक अवस्था यानी गुड स्टेट ऑफ डाइजेशन एंड मेटाबॉलिज्म तथा धातु और मल की सामान्य क्रियाशीलता। दूसरा आयाम है- ‘प्रसन्नात्मन्द्रियमनाः’ अर्थात् आत्मा, इंद्रिय और मन की प्रसन्नता। स्वास्थ्य एक समग्र अवस्था (होलिस्टिक स्टेट) है। इसलिए स्वस्थ भविष्य का अर्थ केवल रोगों की संख्या को कम करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तियों और समुदायों का निर्माण करना है जो शारीरिक रूप से समर्थ, मानसिक रूप से संतुलित, सामाजिक रूप से सक्रिय और जीवन के प्रति प्रसन्न हों।
भविष्य की स्वास्थ्य प्रणाली की नींव
चरकसंहिता में आयुर्वेद के प्रयोजन को प्रस्तुत किया गया है-‘स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम् आतुरस्य विकार प्रशमनं च।’ आयुर्वेद रोगी के उपचार तक सीमित नहीं है,वह स्वास्थ्य की रक्षा को भी समान महत्व देता है। यानी क्युरेटिव हेल्थ केयर से प्रिवेंटिव और प्रमोटिव हेल्थ की ओर बढ़ना। आयुर्वेद की दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार-विहार, व्यायाम, निद्रा, सद्वृत्त और आचार रसायन जैसी अवधारणाएं विशेष महत्व रखती हैं।
दिनचर्या और ऋतुचर्या
आयुर्वेद में दिन और रात्रि का क्रम, ऋतुओं का परिवर्तन, जलवायु, आहार और जीवनचर्या इन सभी के बीच एक अंर्तसंबंध स्वीकार किया गया है। दिनचर्या व्यक्ति को नियमितता प्रदान करती है, जबकि ऋतुचर्या बदलते पर्यावरण के अनुरूप शरीर और जीवनशैली में आवश्यक अनुकूलन का मार्गदर्शन करती है। दिनचर्या के मूल सिद्धान्तों- नियमितता, संयम, स्वच्छता, उचित आहार, पर्याप्त निद्रा और शारीरिक सक्रियता- को आधुनिक जीवन के संदर्भ में समझना अधिक उपयोगी होगा।
आहारः भोजन से आगे, स्वास्थ्य का आधार
भोजन केवल शरीर को ऊर्जा प्रदान करने का माध्यम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, बल, पोषण और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है। भोजन शरीर की वास्तविक आवश्यकता और भूख के अनुरूप किया जाना चाहिए। कब खाना है, कितना खाना है, क्या खाना है और क्या नहीं-इन सभी का विवेकपूर्ण निर्धारण हमारी अपनी जिम्मेदारी है।
जीवनशैली संबंधी रोगों की चुनौती
जीवनशैली के रोग वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने दीर्घकालिक चुनौती हैं। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर जैसी स्थितियों में जीवनशैली की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन स्थितियों का प्रबंधन केवल औषधियों तक सीमित नहीं रहता।
दीर्घायु से गुणवत्तापूर्ण आयु की ओर
मानव जीवन की औसत आयु बढ़ने के साथ स्वस्थ वृद्धावस्था भविष्य की प्रमुख स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में से एक है। वृद्धावस्था का उद्देश्य केवल अधिक वर्षों तक जीवित रहना नहीं होना चाहिए। वास्तविक लक्ष्य होना चाहिए- स्वतंत्रता, कार्यक्षमता, मानसिक समर्थता, सामाजिक सहभागिता और गरिमापूर्ण जीवन का संरक्षण। आयुर्वेद का रसायन विषय इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। रसायन की अवधारणा को केवल दीर्घायु के संकीर्ण अर्थ में देखने के बजाय शरीर और मन की समर्थता, स्वास्थ्य संरक्षण तथा जीवन की गुणवत्ता के व्यापक संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। लॉन्जिविटी से हेल्दी लॉन्जिविटी की ओर बढ़ना। भविष्य का स्वास्थ्य केवल अत्याधुनिक अस्पतालों, नवीनतम तकनीकों और प्रभावशाली औषधियों से निर्धारित नहीं होगा। वास्तविक स्वस्थ भविष्य तब निर्मित होगा, जब व्यक्ति अपने स्वास्थ्य का सहभागी बनेगा, जब आहार स्वास्थ्य का आधार बनेगा। जब दिनचर्या स्वास्थ्य संरक्षण का माध्यम बनेगी।
स्वस्थ व्यक्ति और स्वस्थ समाज
आयुर्वेद सिखाता है कि स्वास्थ्य निरंतर संतुलन की प्रक्रिया है। शरीर और मन, व्यक्ति और समाज, मनुष्य और प्रकृति तथा परंपरा और नवाचार इन सभी के बीच संतुलन ही स्वस्थ भविष्य की आधारशिला बन सकता है। इसीलिए ‘आयुर्वेदा फॉर अ हेल्दियर टुमॉरो’ पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का संकल्प है। आयुर्वेद की दृष्टि में स्वास्थ्य शरीर की सीमा पर समाप्त नहीं होता, वह मन की प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता तक विस्तृत होता है।
- लेखक कुरुक्षेत्र स्थित श्रीकृष्णा आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।

