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आपदा प्रबंधन में चीनी नाकामी उजागर कर गया जलप्रलय

नेपाल-तिब्बत सीमा पर तबाही

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हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ ने चीन के आपदा प्रबंधन सिस्टम, ग्लेशियल लेक निगरानी और समय पर चेतावनी प्रणाली की गंभीर खामियां उजागर की हैं। पहले द्विपक्षीय मीटिंग में भी चीन के अधिकारियों ने सूचना साझा करने में पारदर्शिता नहीं दिखाई। वहीं अब अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की उसकी कोशिश जारी है। चीनी सरकारी प्रचार तंत्र समय पर सूचनाएं देने में चूक पर लीपापोती में लगा है। यह परस्पर समझौतों पर अमल में नाकामी भी दर्शाता है। इस आपदा से नेपाल में जान और माल का बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है, अब चुनौती पुनर्निर्माण की है जिस पर अरबों डॉलर खर्च का अनुमान है।

चीन अक्सर ‘मैत्रेयी ब्रिज़’ को लेकर ‘चौड़ा’ होता था, कि दुनिया वालो देखो-हमने स्टेट ऑफ़ आर्ट पेश किया है। आठ जुलाई 2025 को लेंडे नदी में आई बाढ़ इस नेपाल और चीन को जोड़ने वाले ‘स्टेट-ऑफ-द-आर्ट’ के रूप में घोषित मितेरी पुल को बहा ले गई। तब कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई थी। इस साल 1 जनवरी को पोर्ट को फिर से बनाने और फिर से खोलने में लगभग छह महीने लगे। आठ महीने बाद, मितेरी पुल पोर्ट फिर से तबाह हो गया है। अगर ‘स्टेट-ऑफ-द-आर्ट बॉर्डर फैसिलिटी’ 14 महीनों में दो बार तबाह हो गई, तो यह साइट चुनने, घटिया इंफ्रास्ट्रक्चर कंस्ट्रक्शन और तिब्बत में ग्लेशियल लेक मॉनिटरिंग और अर्ली-वॉर्निंग सिस्टम की पूरी तरह से नाकामी के बारे में गंभीर सवाल खड़े करता है।

जिस चीन को साइंस-टेक्नोलॉजी में अमेरिका-रूस से टक्कर लेने वाला हम मानते रहे, वो इस महाआपदा में बुरी तरह से एक्सपोज़ हुआ है। चीन का प्रोपेगंडा तंत्र बजाय समय पर सूचनाओं को देने में चूक को स्वीकार करने के नेपाल को भेजे जाने वाली सहायता का ढोल पीटने में लगा हुआ है। राष्ट्रपति शी मिस्र गए, उसका कवरेज दिखाने और उससे पहले शंघाई कोऑपरेशन की शिखर बैठक में शी की शिरकत का गुणगान करके नेपाल में चीन की नाकामियों को ढकने का प्रयास वहां का सरकार नियंत्रित मीडिया कर रहा है। वहीं चीनी सरकार ने किसी भी जवाबदेही से इनकार किया है।

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तबाही के खुलासे पर चीनी कार्रवाई

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गत 27 अगस्त को नेपाल में चीनी एम्बेसी ने फेसबुक पर एक बयान जारी किया, जिसमें चेतावनी न देने या ऊपर की तरफ बांध टूटने से तबाही लाने के आरोपों को ‘फेक न्यूज़’ बताया गया। एम्बेसी के बयान में लिखा था, ‘आरोप लगाने से कुछ नहीं होता। सहयोग से जानें बचती हैं।’ ह्यूमन राइट्स ग्रुप्स के मुताबिक, जो लोकल तिब्बती विदेशी पत्रकारों से बात करने या ऑनलाइन अपने इंडिपेंडेंट अकाउंट शेयर करने की कोशिश करते हैं, उन्हें तुरंत हिरासत में लिया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है। बीते 26 अगस्त को ‘तिब्बत मडस्लाइड’ थोड़ी देर के लिए ट्रेंड हुआ, लेकिन अगली सुबह घरेलू मौतों का आंकड़ा तीन लोगों की मौत और 558 लोगों के लापता होने पर तुरंत स्थिर हो गया। आठ दिन बाद सरकारी न्यूज़ एजेंसी शिन्हुआ ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में 21 लोगों की मौत को स्वीकार किया।

चीन में सोशल मीडिया पर पोस्ट करनेवाले दर्जनभर लोग हिरासत में लिए गए हैं। इन पर आरोप है कि उन्होंने इंटरनेट पर आपदा में मरने और लापता होने वाले लोगों का ऐसा आंकड़ा पोस्ट किया, जो सरकार के आधिकारिक डेटा से काफी ज़्यादा था। पकड़े गए लोगों में से लियूनाम के एक यूजर ने दावा किया था कि मडफ्लड में 3,000 से अधिक लोग मारे गए, जबकि किउ नामक यूजर ने लिखा कि तिब्बत में सैकड़ों लोग मरे हैं, और असल में 3,000 लोग लापता हैं।

प्रोपेगंडा मशीनरी का उपयोग

हिमालय की सीमा के कीचड़ भरे किनारों पर हज़ारों लापता अपनों को ढूंढ रहे परिवारों के लिए, सहयोग उतना ही धुंधला है, जितना डिजिटल फ़ायरवॉल के पीछे का सच। चीन की बड़ी माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट वीबो पर भी कहानी को इसी तरह मैनेज किया गया। चीन की प्रोपेगंडा मशीन एक बार फिर नेपाल सीमा पर अपनी नाकामियां छिपाने में व्यस्त हो गई। दो बहुत ज़्यादा प्रचारित, लंबी सरकारी रिपोर्टें खबरों में छाई रहीं। उनमें से पहला, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बचाव और राहत के कामों को कोऑर्डिनेट करने के लिए सेंट्रल पोलित ब्यूरो की मीटिंग बुलाई, और दूसरी ख़बर थी- प्रीमियर ली कियांग का आपदा का मुआयना करने के लिए ग्यिरोंग पहुंचना।

तथ्य ऐसे आए सामने

फिर भी, चीन की नाकामियों की खबरें किसी न किसी सूरत में छनकर बाहर आती ही रहीं। चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ (CAS) के रिसर्चर्स ने कैलकुलेट किया कि जब मलबे का बहाव तिब्बत के ग्यिरोंग पोर्ट के चेकपॉइंट से टकराया, तो उसकी सरफेस वेलोसिटी 19 मीटर प्रति सेकंड थी। उसके बाद बॉर्डर क्रॉसिंग से 52 किलोमीटर दूर नेपाल की त्रिशूली नदी पर बने पुल तक पहुंचने तक बाढ़ की सरफेस वेलोसिटी लगभग 11.7 मीटर प्रति सेकंड थी। इसका मतलब है कि बहाव को पुल तक पहुंचने में 46 से 75 मिनट लगे। नेपाली अधिकारियों ने बॉर्डर पार करने के बाद बहाव को समय पर चेतावनी देने में नाकाम रहने के लिए चीनी सरकार की आलोचना की है।

पूरी जानकारी न देने की बात पर लीपापोती

नेपाल की राजधानी काठमांडू में 27 मई 2026 को हुई मीटिंग में बाढ़, मौसम और ग्लेशियर से जुड़े खतरों पर नज़र रखने और उनसे निपटने के लिए सहयोग को मज़बूत करने पर चर्चा की थी। उस बैठक में हिमनदों की सूची और खतरे की मैपिंग चीनी पक्ष से मांगी गई। दो नेपाली अधिकारियों ने कहा कि मीटिंग के बाद उन्हें ग्लेशियर के खतरों और पानी के लेवल के बारे में चीन से उतनी जानकारी नहीं मिली, जितनी वे चाहते थे। उन्हें डर था कि कम डेटा शेयरिंग से बड़ी आपदाओं का अंदाज़ा लगाने और उनके लिए तैयारी करने की उनकी क्षमता पर असर पड़ सकता है।

नेपाल के फ्लड फोरकास्टिंग डिवीज़न (बाढी पूर्वानुमान शाखा) के ‘हाइड्रोलॉजिस्ट’ सौहाद्र जोशी, जो 27 मई की मीटिंग में थे, ने कहा, ‘असल में हम उनसे यही चाहते थे, और अब भी चाहते हैं, कि अगर हिमनद जल्दी हिलते हैं, और उस इलाके के आसपास भी हलचल होती है, तो हम थोड़ा पहले जानना चाहेंगे। अतीत में जो कुछ गड़बड़ियां और लापरवाही चीन की ओर से हुई है, उसकी लीपापोती में काठमांडू स्थित चीनी दूतावास लग चुका है। चीनी दूतावास ने शनिवार को एक्स पर एक बयान में कहा कि उसका डेटा-शेयरिंग समय पर हुआ है। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि दोनों पक्षों ने ‘मौसम विज्ञान, जल संसाधन और आपदा रोकथाम और उसे कम करने के क्षेत्र में अच्छा सहयोग’ बनाए रखा है।

आपदा प्रबंधन के समझौतों की नाकामी

12-13 अक्तूबर, 2019 को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के काठमांडू दौरे के दौरान नेपाल और चीन ने 20 क्षेत्रों में सहयोग का अहद (वादा) किया था, जिनमें सूचना-साझाकरण मंच बनाना, ट्रांस-हिमालयन मल्टी-डाइमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क, प्राकृतिक खतरों की निगरानी करना और आपदा-जोखिम-न्यूनीकरण परियोजना को लागू करना भी शामिल था। बाद के सालों में भी नेपाल और चीन के बीच 9-सूत्रीय और 9-क्षेत्रीय सहयोग का सिलसिला जारी रहा, जिसके तहत साल 2022 और दिसंबर 2024 में प्रधानमंत्रियों के दौरों के दौरान कई समझौतों को नवीनीकृत किया गया है। लेकिन, व्यवहार में यह सब वास्तविकता से काफी दूर था। ख़ासकर, आपदा प्रबंधन के मामले में चीन बार-बार फेल करता रहा।

कैसे पटरी पर आएगी ज़िन्दगी?

26 अगस्त 2026 को भोटेकोशी-त्रिशूली नदी कॉरिडोर में आई बाढ़ ने तबाही का जो मंज़र पेश किया है, वो भयावह है। सड़कों, स्कूलों और हेल्थ पोस्ट जैसे ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, हज़ारों प्रॉपर्टी मिनटों में इस महाआपदा में बह गईं। काल के गाल में समा चुके हज़ारों मुर्दा और लापता लोगों ने अपने परिजनों के लिए जीवन भर का गहरा ज़ख्म छोड़ दिया है। रविवार तक महाआपदा के मृतकों की संख्या यदि दो हज़ार भी छू जाये, तो आश्चर्य मत कीजियेगा। स्थिति हाहाकारी न बने, इसलिए मृतकों की संख्या का खुलासा सोच-समझकर किया जा रहा है।

काठमांडू के सिंह दरबार स्थित ‘राष्ट्रिय विपद् जोखिम न्यूनीकरण तथा व्यवस्थापन प्राधिकरण’ (एनडीआरआरएमए) के एक आकलन से चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसमें अनुमान लगाया गया है कि लगभग 1.6 मिलियन लोग प्रभावित हुए हैं। सैटेलाइट मैपिंग से भोटेकोशी-त्रिशूली कॉरिडोर के साथ प्रभावित ज़ोन में 4,689 इमारतों की पहचान हुई है। बाढ़ ने ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को भी तबाह किया या नुकसान पहुंचाया : 41 मोटर वाले पुल बह गए, और चार और डैमेज हो गए, जबकि उत्तरी बॉर्डर से जुड़ने वाली 40 किलोमीटर सड़कें पूरी तरह बह गईं। उन्नीस स्कूल, जिनमें 6,901 छात्र पढ़ते थे, या तो पूरी तरह तबाह हो गए या डैमेज हो गए, जबकि चार हेल्थ पोस्ट तबाह हो गए और दो दूसरे थोड़े डैमेज हो गए।

तबाह इन्फ्रास्ट्रक्चर के पुनर्निर्माण की चुनौती

नेपाल में रोड विभाग के डीजी डॉ. बिजय जायसी के मुताबिक, रसुवा में मैत्रेयी ब्रिज और धादिंग में मालेखु के बीच 41 पुलों में से 35 बाढ़ से डैमेज हो गए। इनमें से 32 पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हैं, और तीन को थोड़ा नुकसान हुआ है। डिपार्टमेंट ने कहा कि छह पुल अभी भी ठीक हैं, जिससे लोग त्रिशूली नदी के दोनों किनारों के बीच आ-जा सकते हैं। दोनों विभागों के बयानों से लगता है, कि आपस में तालमेल नहीं है। नेपाल पुलिस के मुताबिक, नुवाकोट, धाडिंग, चितवन, गोरखा, तनहुं, और पूर्वी और पश्चिमी नवलपरासी दोनों जगहों से लाशें बरामद हुई हैं- यह बाढ़ त्रिशूली और नारायणी नदी सिस्टम से होकर गुज़री, जो बाढ़ की शुरुआत वाली जगह से सैकड़ों किलोमीटर दूर है।

इस आपदा ने नेपाल की ऊर्जा अधोसंरचना को भी गहरा झटका दिया है। 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, जिनमें कुछ चालू हैं, कुछ बन रहे हैं, को नुकसान हुआ। संचार सेवाएं रुक गईं। कुल नुकसान का अंदाज़ा लगाने में समय लगेगा, लेकिन यह कई बिलियन डॉलर तक होने की संभावना है। सर्च और रेस्क्यू की कोशिशों के साथ-साथ, सरकार के सामने बेसिक कनेक्टिविटी ठीक करने और फिर पुनर्वास और पुनर्निर्माण करने का भी मुश्किल काम है।

नेपाल की पूर्व मंत्री सरिता गिरी सवाल उठाती हैं, ‘9.50 पर आपदा प्रभावित स्थल के लिए नेपाली सेना का हेलीकॉप्टर उड़ा, उसके दो घंटे बाद 11.50 पर गृह मंत्रालय का हेलीकॉप्टर रवाना होता है। क्यों? राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् के प्रमुख प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने आपदा के 72 घंटे बाद विदेश से आपदा सहायता को हरी झंडी दी। इससे देश को कितना नुकसान हुआ? सरकार को बताना चाहिए। नेपाल जो अपने इंफ़्रा विकास के लिए विदेशी सहायता पर सर्वाधिक निर्भर है, कैसे सुनिश्चित किया जाये कि पुनर्निर्माण में भ्रष्टाचार नहीं होगा? उसके लिए सबसे ज़रूरी है पारदर्शिता। ‘प्रधानमन्त्री दैवी प्रकोप उद्धार कोष’ के लिए सिर्फ़ एक हफ़्ते में 7.376 अरब नेपाली रुपये से ज़्यादा, सहयोग राशि आ चुकी है। हालांकि, यह काफ़ी नहीं है। नेपाल योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और नेशनल रिकंस्ट्रक्शन अथॉरिटी के पूर्व सीईओ गोविंद राज पोखरेल के शुरुआती अंदाज़े पर भरोसा करें, तो इस आपदा से उबरने और पुनर्निर्माण पर कम से कम 6 अरब डॉलर से अधिक ख़र्च आएगा।

बाढ़ से उजड़े हज़ारों पीड़ितों के पास अपने घर फिर से बनाने के लिए ज़मीन नहीं है। वापस उन जगहों पर मकान निर्माण बुद्धिमानी नहीं होगी, जो नदियों के किनारे थे। इसके लिए पूरी बस्तियों को दूसरी जगह ले जाना होगा, और हाईवे और पुलों को फिर से ठीक करना होगा। यह सब बहुत महंगा साबित होने जा रहा है। यह आपदा बर्फ़-चट्टान के हिमस्खलन की वजह से हुई थी, जिसमें ग्लोबल वार्मिंग भी एक वजह है। नेपाल को जलवायु से होने वाली ऐसी आपदाओं के लिए अकेला ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यह इंटरनेशनल कम्युनिटी की ज़िम्मेदारी है, खासकर उन देशों की जिन्होंने ग्लोबल वार्मिंग में बहुत ज़्यादा योगदान दिया है।

बाढ़ की वजह : अमेरिका भी कन्फ्यूज़ हुआ

साइंटिस्ट अभी भी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि हालिया बाढ़ में एक के बाद एक हुई घटनाओं की यह कड़ी कैसे बनी, आपदा कितनी बड़ी थी, और यह असल में कहां से शुरू हुई? किस पक्ष ने लापरवाही की? बता दें कि 26 अगस्त 2026 की सुबह की शुरुआती रिपोर्ट्स से पता चला कि भूकंप की वजह से एवलांच हुआ था, जिससे लहेंडे खोला ब्लॉक हो गया था, जिससे एक टेम्पररी डैम बन गया था जो बाद में टूट गया। ‘लहेंडे खोला’, एक ट्रांसबाउंड्री हाई-एल्टीट्यूड नदी है, जो तिब्बत की ग्यिरोंग काउंटी से निकलती है, और दक्षिण नेपाल में बहती है, जहां यह भोटेकोशी और त्रिशूली नदी सिस्टम की एक सहायक नदी के तौर पर काम करती है। ठीक से देखा जाये, तो मड-फ्लड के कारणों को समझने में अमेरिका भी कन्फ्यूज़ कर गया। यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) ने पहले कहा था कि 4.4 मैग्नीट्यूड के भूकंप की वजह से बाढ़ आई। लेकिन, प्लैनेट लैब्स की सैटेलाइट इमेजरी से पता चला कि ग्लेशियर और चट्टान का एक बड़ा हिस्सा 5,200 मीटर की ऊंचाई से टूटकर 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिर गया था। ‘यूएसजीएस’ ने बाद में अपने आकलन में बदलाव किया, और यह नतीज़ा निकाला कि ग्लेशियर के बड़े पैमाने पर टूटने से ही 5.2 मैग्नीट्यूड का सीस्मिक सिग्नल पैदा हुआ था। भूगर्भ-विज्ञानियों का मानना है कि ग्लेशियर और चट्टान के गिरने से बर्फ और मलबा लहेंडे वैली में आ गया, जिससे नदी ब्लॉक हो गई, और फिर पानी और मलबे का एक बड़ा बहाव नीचे की तरफ भोटेकोशी और त्रिशूली में चला गया। नेपाल का हाइड्रोलॉजी और मौसम विज्ञान विभाग भी चीन की तरफ से शेयर की गई सैटेलाइट इमेज के आधार पर इसी नतीजे पर पहुंचा।

हिमालयी क्षेत्र में त्रिपक्षीय आपदा प्रबंधन समझौता ज़रूरी

तिब्बत में चीन द्वारा साल 2000 से 2026 तक लगभग 193 से अधिक जलविद्युत बांध बनाए या नियोजित किए जा चुके हैं, जिनकी कुल संख्या 300 से भी अधिक हो सकती है। हालिया मेगा परियोजनाओं में यारलुंग त्सांगपो परियोजना है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है। जुलाई 2025 में चीन ने तिब्बत के न्यिंगची शहर में यारलुंग त्सांगपो नदी (ब्रह्मपुत्र नदी) पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू किया है। यह परियोजना तिब्बत के मेडोग काउंटी में नदी के ग्रेट बेंडक्षेत्र पर स्थित है, जो अरुणाचल प्रदेश सीमा के पास है। इसकी अनुमानित क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट (60 गीगावाट) है, जो चीन के थ्री गॉर्जेस डैम से लगभग तीन गुना अधिक है। विश्व की विशालतम जल विद्युत परियोजना की लागत लगभग 137 अरब डॉलर आंकी गई है। इस बांध के कारण निचली धाराओं में जल प्रवाह, पर्यावरण और रणनीतिक सुरक्षा को लेकर भारत और बांग्लादेश में चिंताएं बढ़ गई हैं। सबसे बड़ी बात, तिब्बत से आने वाली प्राकृतिक आपदाओं और जल प्रवाह की निगरानी के लिए भारत, चीन और नेपाल के बीच कोई आधिकारिक त्रिपक्षीय समझौता नहीं हुआ है। जबकि हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन के लिए एक पारदर्शी त्रिपक्षीय या क्षेत्रीय सहयोग तंत्र बनाने की आवश्यकता है। सच यह है कि चीन तिब्बत क्षेत्र से जुड़ी हाइड्रोलॉजिकल और हिमनद संबंधी जानकारी साझा करने से बचता रहा है। चीन की तिब्बत में रेयर अर्थ मटेरियल से लेकर, रेल-रोड-अधोसंरचना, जलविद्युत जैसी कितनी परियोजनाएं चल रही हैं, वो एक रहस्य जैसा है।

-लेखक जियोपॉलिटिकल मामलों के जानकार हैं।

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