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सैलरी और सुरक्षा से आगे अच्छी नौकरी के बदलते मायने

नई पीढ़ी का बदलता कैरियर दर्शन

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आजकल युवा अपनी जिंदगी की सहूलियतों के सामने नौकरी के आकर्षणों की परवाह नहीं करते। बेशक सैलरी महत्वपूर्ण है लेकिन युवा अपनी जिंदगी का हिसाब भी लगाना चाहता है। सफलता की कीमत तनाव, परिवार से दूरी और अपने लिए शून्य समय के रूप में चुकाना उसे मंजूर नहीं। वर्क-लाइफ बैलेंस नौकरी में मिलता है, तो छोटे शहर में भी रहना भी उसे मंजूर है।

 

कभी नौकरी चुनने का सबसे आसान पैमाना था- सैलरी कितनी मिलेगी? बड़ा पैकेज है, तो इसका मतलब है नौकरी अच्छी है। सिर्फ यही नहीं इसका मतलब यह भी था कि कंपनी मशहूर है और भविष्य सुरक्षित है। लेकिन आज का युवा इस गणित में कुछ और चीजें भी जोड़ता है। इसीलिए कोई युवा 12 लाख रुपये सालाना पैकेज की जगह 9 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी भी चुन सकता है बशर्ते वहां काम के घंटे तय हों, सप्ताहांत पूरी तरह से उसका अपना हो और घर लौटने के बाद ऑफिस के फोन और ई-मेल पीछा न करें। दिल्ली के एक युवा ने पिछले दिनों यही किया। वह अपनी 12 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी को छोड़कर 9 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी को ज्वाइन कर लिया। इसके पीछे वजहें वही थीं, जो ऊपर गिनायी गई हैं। वास्तव में 27 वर्षीय रोहित सिंह ने 12 लाख रुपये सालाना पैकेज वाली नौकरी इसलिए छोड़ी क्योंकि उसमें उसे अपने शहर से दूर बंगलूरु में रहना था। जाहिर है वहां रोहित अकेले रहता और उसकी सारी जिंदगी बस नौकरी तक सिमटकर रह जाती। इसलिए दिल्ली में भले उसका पैकेज 3 लाख रुपये सालाना कम है, लेकिन वह अपने शहर में रह रहा है। मम्मी-पापा के साथ रह रहा है, यहां उसका अपना सर्किल है, बचपन के दोस्त हैं और काम से आने के बाद शाम को उसकी अपनी एक दुनिया है।

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जिंदगी की सहूलियतों को पहल

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रोहित कोई इक्का-दुक्का उदाहरण नहीं है, आज 30 फीसदी से ज्यादा युवा अपनी जिंदगी की सहूलियतों के सामने नौकरी के आकर्षणों की परवाह नहीं करते। क्योंकि आज का युवा सैलरी स्लिप के साथ अपनी जिंदगी का हिसाब भी लगाना चाहता है। उसके लिए सवाल अब यह नहीं है कि नौकरी उसकी जिंदगी कितनी लेती है बल्कि यह है कि नौकरी लेने के बाद मेरी जिंदगी कितनी बचती है? आज का युवा नौकरी चाहता है,लेकिन ऐसी नौकरी नहीं, जिसमें उसकी पूरी जिंदगी नौकरी की ही हो जाए। वह पैसे कमाना चाहता है, लेकिन पैसे के बदले अपना हर दिन गिरवी रखने को तैयार नहीं है। सफलता की कीमत लगातार तनाव, परिवार से दूरी और अपने लिए शून्य समय के रूप में चुकाना उसे मंजूर नहीं। वो पिछली सदी के 80 और 90 के दशक के युवा थे, जो बेहतर नौकरी के लिए, बेहतर सैलरी के लिए, कुछ भी छोड़ने को तैयार थे।

महत्वाकांक्षा के बदले मायने

आज का युवा महत्वाकांक्षी तो है, लेकिन उसने महत्वाकांक्षा का अर्थ बदल दिया है। इसलिए अब उसके लिए सिर्फ बड़ी सैलरी काफी नहीं। जबकि अब तक की पीढ़ियों के लिए कैरियर चुनते समय सैलरी पैकेज सबसे महत्वपूर्ण मानक था। ऐसा नहीं है कि आज सैलरी का महत्व ही नहीं है। आज भी इसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन आज का युवा इसके लिए अपना सब कुछ खोने के लिए तैयार नहीं है। आज का युवा अच्छी नौकरी को भी सवालों के चश्मे से देखता है और मालूम करता है-

क्या नौकरी के घंटे तय हैं? क्या इसमें वीकेंड सुकूनभरा होगा? क्या घर पहुंचने के बाद ऑफिस का फोन या ई-मेल तो पीछा नहीं करेगा? क्या उसे अपना काम करने की आजादी होगी? क्या वह अपने काम से वह सीख पायेगा, जिसकी बदौलत उसका कैरियर आगे बढ़े? क्या उसका काम उसके निजी मूल्यों से मेल खाता है? वास्तव में आज का युवा खुद को ऑफर की गई नौकरी को इन सवालों की कसौटी पर कसता है। वह थोड़ी कम सैलरी या कम सुविधाओं से तो काम चला सकता है, लेकिन जिंदगी जीने की आजादी से समझौता नहीं करता।

स्थायित्व अब प्राथमिकता नहीं

अगर नयी पीढ़ी को वर्कलाइफ बैलेंस और फ्लैक्सिबल ऑवर्स नौकरी में मिलते हैं, तो वह रिमोट या छोटे शहर में भी रहना पसंद कर सकता है। उसके लिए कैरियर अब सीधी सड़क नहीं रहा। पहले ठीक-ठाक नौकरी मिली तो लोग पूरी उम्र उसी के साथ गुजार देते थे। लेकिन आज किसी भी युवा के लिए अच्छी से अच्छी नौकरी में दस साल तक एक जगह गुजारना भी मुश्किल होता है। साल 2024 के एक आकलन के मुताबिक, आईटी और सर्विस सेक्टर में युवा औसतन साढ़े तीन से चार साल नौकरी एक जगह कर रहे थे। आज एक इंजीनियर की नौकरी का स्थायित्व औसतन तीन साल है। विभिन्न फर्मों में मैनेजर का औसत स्थायित्व भी पांच साल से ज्यादा नहीं। युवा अब अपनी पहली नौकरी के साथ पूरी जिंदगी गुजारने का सपना नहीं देखता।

कैरियर स्विच का मतलब

युवा आजकल कैरियर स्विच को असफलता नहीं बल्कि एक्सप्लोरेशन मानता है। आज एक इंजीनियर कल को फोटोग्राफी में भी जा सकता है, तो यह भी संभव है कि एक डॉक्टर, डॉक्टरी का पेशा छोड़कर कंटेंट क्रिएशन करने लगे या मीडिया की भागदौड़ भरी जिंदगी का हिस्सा हो जाए। आज जरूरी नहीं है कि एक मैनेजमेंट ग्रेजुएट कहीं नौकरी ही करे, हो सकता है वो एक बहुत मामूली स्तर से अपना बिजनेस शुरू कर दे। एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं जब किसी युवा ने शानदार कार्पोरेट नौकरी छोड़कर फ्रीलांसिंग करना शुरू कर दिया। यहां तक कि सिविल सर्विसेज को छोड़कर पढ़ाना शुरू कर देते हैं। अब कैरियर एक प्रोफेशन तक सीमित नहीं रहा। युवा कहते हैं जिसमें दिल लगे, उसी कैरियर में जिंदगी बिताओ।

डिजिटल सुविधाओं का असर

वास्तव में यह बदलाव डिजिटल इकोनॉमी, रिमोट वर्क, ऑनलाइन लर्निंग फैसिलिटी और क्रिएटिव इकोनॉमी के कारण संभव हुआ है। इसलिए अब युवा अपने कौशल को एक से अधिक बाजारों में इस्तेमाल करने की संभावना देखता है। उसके लिए ऑफिस की शानदार कुर्सी से ज्यादा उसका अपने काम पर कंट्रोल होता है। वह काम करना है, कहां से करना है और कितना करना है, इन सवालों में थोड़ी स्वतंत्रता जरूर चाहता है और यही आजादी उसे नौकरी के प्रति अधिक सकारात्मक भी बनाती है। इसलिए फ्लैक्सिबल वर्किंग अब केवल सुविधा नहीं, कई युवाओं के लिए नौकरी चुनने का बेहद महत्वपूर्ण आधार है।

मेहनत को लेकर संदेह नहीं

आज का युवा कम मेहनत नहीं करता है यानी वह मेहनत करने से पीछे नहीं हटता। बल्कि जहां उसे सीखने को मिलता है, वहां बिना कहे ज्यादा वक्त बिताता है। यहां तक कि वे कई अतिरिक्त प्रोजेक्ट तक करते हैं। दो दशक पहले तक युवा सालों की जानी-मानी किसी कंपनी में नौकरी करने को प्राथमिकता देता था, वहीं आज उसकी पहली पसंद स्टार्टअप है और स्टार्टअप में काम करते हुए वह कभी अपनी घड़ी की तरफ नहीं देखता, रात-रात तक बिना ड्यूटी की शर्त काम करता रहता है। दरअसल, स्टार्टअप में कोई काम बिल्कुल शुरू से सीखने को मिलता है दूसरी बात यह कि वह अपनी मनपसंद जॉब करता है। इसलिए मेहनत से नहीं ऊबता बल्कि वह रिजल्ट देने वाला बनने की कोशिश में रहता है। हालांकि उसके लिए नौकरी और उसकी पहचान एक ही नहीं है। आज का युवा कह सकता है, मैं मार्केटिंग प्रोफेशनल हूं, लेकिन मेरी रुचि संगीत में है या मैं सॉफ्टवेयर डेवलपर हूं, लेकिन अपना वीकेंड मैं पॉटरी करते हुए गुजारता हूं। उसके लिए प्रोफेशन उसके जीवन का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं। -इ.रि.सें.

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