जहां ज़मीन पर देश की विकास गाथा रची जा रही, वहीं इसके विकास की मज़बूत इमारत समंदर किनारे भी आकार ले रही है। जहां क्रेनों की गूंज, कंटेनरों की कतारें और लहरों पर चलते जहाज़ डिजिटल स्क्रीन पर चमकते आंकड़ों संग आर्थिक दिशा तय कर रहे हैं। बजट 2026 ने इस पर मुहर लगा दी है कि भारत अब बंदरगाहों को सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की धुरी मान रहा है। नज़र अब ब्लू इकॉनोमी पर है। लेखिका ने पीआईबी महाराष्ट्र व चंडीगढ़ के साथ देश के सबसे बड़े कंटेनर हैंडलिंग और पहले 100 फीसदी लैंडलॉर्ड पोर्ट जेएनपी (जवाहर लाल नेहरू पोर्ट) और पहले सैटेलाइट पोर्ट वाधवां का दौरा किया। जहां उन्होंने अधिकारियों से बातचीत कर जाना कि भारत के बंदरगाह कैसे अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं।
देश के आर्थिक नक्शे में कुछ वर्षों में बंदरगाह, शिपिंग और मेरीटाइम लॉजिस्टिक्स सेक्टर सबसे तेज़ी से उभरा है। कभी बंदरगाह सिर्फ माल उतारने–चढ़ाने की जगह थे, आज वही बंदरगाह देश का विकास इंजन बन चुके हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर दिखती है देश के सबसे बड़े कंटेनर पोर्ट जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी, यानी जेएनपीए और उसके भविष्य के विस्तार वाधवां सैटेलाइट पोर्ट में। केंद्रीय बजट 2026 में 5,164.8 करोड़ रुपये का पोर्ट एंड शिपिंग को एलोकेशन किया गया है। अगले 5 सालों में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग बनाने का लक्ष्य है, साथ ही कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम, 10,000 करोड़ की कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग योजना को अमलीजामा पहनाने की कोशिश होगी। इसके अलावा इनलैंड शिप रिपेयर हब्स वाराणसी और पटना में बनेंगे। यानी नीति, तकनीक और गति तीनों का संगम बन चुके हैं भारत के बंदरगाह और इसी तरक्की का अगला बड़ा अध्याय है देश का पहला सैटेलाइट पोर्ट वाधवां।
देश में सर्वाधिक कंटेनर हैंडलिंग क्षमता
देश में 12 प्रमुख बंदरगाह हैं। इनके अलावा भारत के पहले सैटेलाइट पोर्ट के रूप में विकसित हो रहे वाधवां प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। जेएनपीए की जनरल मैनेजर मनीषा जाधव के मुताबिक इसका पहला चरण 2029 तक पूरा होने की उम्मीद है। बता दें कि पिछले तीन दशकों से जेएनपीए भारत के समुद्री व्यापार की रीढ़ बना हुआ है। इस बंदरगाह ने देश को कंटेनर युग में प्रवेश कराया, पश्चिमी भारत को वैश्विक व्यापार से जोड़ा और आयात-निर्यात के लिए एक भरोसेमंद गेटवे तैयार किया। आज इसकी कंटेनर हैंडलिंग क्षमता 8.4 मिलियन टीईयू से बढ़कर 10.4 मिलियन टीईयू (बीस फुट लंबा कंटेनर) तक पहुंच चुकी है। हालांकि मुंबई के बाहर समंदर में इस सैटेलाइट पोर्ट के विस्तार के साथ चुनौतियां भी बढ़ीं मसलन 24 घंटे तक इंतज़ार करते ट्रक, टर्मिनल में खाली स्लॉट, ईंधन की बर्बादी और पार्किंग की समस्या। इन्हीं से निजात पाने के लिये तकनीक के साथ कदमताल करते हुए जेएनपीए फिर सीपीपी यानी सेंट्रलाइज्ड पार्किंग प्लाजा लेकर आया।
सेंट्रलाइज्ड पार्किंग प्लाजा
जेएनपीए के ट्रैफिक एडवाइज़र नागेश अकुडे बताते हैं कि सेंट्रलाइज्ड पार्किंग प्लाजा यानी सीपीपी ने लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को नए सिरे से परिभाषित कर दिया। यह ऐसा सिस्टम है जो ट्रकों को रोकता नहीं, बल्कि उन्हें सही समय पर, सही क्रम में आगे बढ़ाता है। डिजिटल और आरएफआईडी आधारित इस मॉडल के बाद ट्रक लोडिंग- अनलोडिंग का औसत समय 24 घंटे से घटकर 5.5 घंटे रह गया, वहीं पार्किंग समस्या खत्म हो गई। यहां रीफर कंटेनरों के लिये अलग जोन बनाया गया। सीपीपी में एक साथ 2800 से अधिक कंटेनर लोडेड ट्रकों को व्यवस्थित तरीके से संभालने की क्षमता ने जेएनपीए की परिचालन दक्षता को पूरी तरह बदल दिया। नागेश अकुडे का कहना है कि सीपीपी के बनने से लंबे जाम से मुक्ति मिली, ईंधन की बर्बादी कम हुई, कार्बन उत्सर्जन घटा। सीपीपी के एमडी राजेंद्र साल्वे इसे लॉजिस्टिक्स वर्कफ्लो का री-डिज़ाइन कहते हैं।
हालांकि, वैश्विक व्यापार के बदलते स्वरूप के चलते भविष्य सिर्फ एक मेगा पोर्ट पर नहीं टिका रह सकता। समंदर के अंदर जहाजों की संख्या और आकार दोनों बढ़ रहे हैं। नतीजा डीप ड्राफ्ट की मांग भी बढ़ी है।
वाधवां बंदरगाह - पहला सैटेलाइट पोर्ट
महाराष्ट्र के पालघर ज़िले में, मुंबई से 150 किलोमीटर उत्तर में बन रहा है , देश का पहला सैटेलाइट पोर्ट, वाधवां। इसे रणनीतिक रूप से ऐसे डिजाइन किया गया है कि यह जेएनपीए पर बढ़ते लोड को कम कर सके। जनरल मैनेजर मनीषा कहती हैं कि वाधवां पोर्ट देश का 13वां प्रमुख बंदरगाह है ,100 फीसदी ग्रीन पोर्ट है, जो ऑल-वेदर डीप ड्राफ्ट पोर्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह पोर्ट उन बड़े कंटेनर जहाज़ों को सीधे हैंडल कर सकेगा, जिनके लिए मौजूदा बंदरगाहों पर सीमित गहराई और कम जगह बड़ी चुनौती है।
हैंडलिंग क्षमता के विकास का मतलब
वाधवां पोर्ट की प्रस्तावित कंटेनर हैंडलिंग क्षमता लगभग 24.5 मिलियन टीयूई (मानक माप इकाई) बताई जा रही है। यानी क्षमता के लिहाज़ से यह पोर्ट न सिर्फ जेएनपीए का सहायक होगा बल्कि भविष्य में दुनिया के टॉप-10 कंटेनर पोर्ट्स में शामिल होने की क्षमता रखेगा। यह भारत के समुद्री व्यापार को एक नया वैश्विक दर्जा दिलाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा। खास बात यह है कि वाधवां सिर्फ एक बंदरगाह ही नहीं, एक ‘टाउनशिप मॉडल’ के तौर पर विकसित हो रहा है। जहां 4 आधुनिक अस्पताल, स्कूल और स्किल डेवलपमेंट सेंटर बनाए जाएंगे। रिहायशी क्षेत्र के अलावा व्यावसायिक परिसर होगा, लॉजिस्टिक्स पार्क और हरित क्षेत्र के साथ सार्वजनिक सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।
समुद्र के नीचे भी तैयारियां
वाधवां पोर्ट को डीप-सी पोर्ट के रूप में विकसित किया जा रहा है, जिसके लिए समुद्र के नीचे बड़े स्तर पर ड्रेजिंग, आधुनिक नेविगेशन चैनल, अंडर-वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है ताकि बड़े जहाज़ निर्बाध आ-जा सकें। विकसित हो रहे इस ग्रीन पोर्ट में रिन्यूएबल एनर्जी का उपयोग होगा, इलेक्ट्रिक उपकरण, पर्यावरणीय प्रबंधन प्रणाली जैसे प्रावधान शामिल हैं।
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि मैंग्रोव संरक्षण, समुद्री जैव-विविधता और मछुआरा समुदाय इस परियोजना की सबसे बड़ी परीक्षा होंगे। साफ है कि जहां जेएनपीए देश के मौजूदा समुद्री व्यापार की रीढ़ है, वहीं वाधवां भविष्य की जरूरतों को पूरा करेगा। वाधवां न केवल कंटेनर ट्रैफिक को बांटेगा,जहाज़ों की प्रतीक्षा अवधि घटाएगा और भारत को वैश्विक समुद्री मानचित्र पर और मजबूत करेगा।
सागर किनारे भविष्य की इबारत
केंद्रीय बजट 2026 इस पूरी समुद्री रणनीति को मजबूती देता है। कुल पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जिससे पोर्ट-लिंक्ड सड़क, रेल और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क को सीधा लाभ मिलेगा। 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों, कोस्टल कार्गो प्रमोशन स्कीम और 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग योजना से साफ है कि सरकार समुद्री व्यापार को भविष्य की रीढ़ मानकर चल रही है। इन फैसलों का सीधा असर जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी जैसे स्थापित बंदरगाहों पर पड़ेगा और वाधवां जैसे नए पोर्ट्स को राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नेटवर्क से मजबूत तरीके से जोड़ेगा। दरअसल अभी सभी बड़े जहाज़ों को रिपेयर के लिये कोच्चि या विशाखापत्तम का रुख करना पड़ता है। बजट के नये प्रावधानों के बाद जेएनपीए में आधुनिकीकरण और ऑटोमेशन बढ़ेगा। इससे देश के पहले सैटेलाइट पोर्ट वाधवां को मजबूत मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी मिलेगी। कंटेनर की क्षमता बढ़ेगी, लॉजिस्टिक्स कॉस्ट और टर्नअराउंड टाइम कमी आएगी। सरकार का आकलन है कि जब देश का 90 फीसदी तक का विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते से हो रहा है तो ऐसे में पोर्ट का कुशल होना बेहद जरूरी है नहीं तो मेक इन इंडिया का सपना अधूरा रह जायेगा। यह सिर्फ जेएनपीए और वाधवां की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है,जो अपना भविष्य समंदर के किनारे लिख रहा है। जेएनपीए ने देश के विदेशी व्यापार को आधार दिया तो वहीं वाधवां बंदरगाह इस राह को ग्लोबल हाईवे में बदलने जा रहा है। वाधवां एक ऐसा नया अध्याय लिखने जा रहा है जो समुद्री व्यापार को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी, लॉजिस्टिक्स और टाउनशिप के साथ देश को अगले 50 वर्षों के लिए तैयार करेगा।

