सर्दी के मौसम में धूप की कमी होती है, वहीं इन दिनों रक्तसंचार धीमा रहता है तो मूड-डिप और सुस्ती आदि की समस्या हो सकती है। सूर्य ऊर्जा सक्रिय करने और मूड लिफ्टिंग के लिए सूर्य नमस्कार खास तौर पर फायदेमंद हो सकता है। यह सेरोटोनिन स्तर बढ़ाता है। इससे व्यक्ति का मन व भावनाएं मजबूत होती हैं।
सर्दियों में होने वाला मौसमी डिप्रेशन आमतौर पर धूप की कमी, कम शारीरिक गतिविधि और ठंड के कारण होता है। भारतीय योगचर्या में ऐसे कई आसन हैं, जो हमारे हार्मोनल बैलेंस और सूर्य ऊर्जा को सक्रिय करने तथा मूड लिफ्टिंग न्यूरोट्रांसमीटर बढ़ाने में मददगार होते हैं, लेकिन इन सबमें प्रभावी और वैज्ञानिक रूप से सबसे ज्यादा मददगार योगासन है सूर्य नमस्कार।
मददगार है सूर्य नमस्कार
दरअसल सूर्य ऊर्जा का अवशोषण बढ़ाता है। सर्दियों में धूप कम मिलती है, ऐसे में सूर्य नमस्कार शरीर के सौर प्लेक्सेस चक्र को सक्रिय करता है, जिससे मूड, आत्मविश्वास और शरीर की ऊर्जा बढ़ती है। साथ ही यह सेरोटोनिन को भी बढ़ाता है। क्योंकि डायनेमिक मूवमेंट और डीप ब्रिदिंग से मस्तिष्क में खुशी के हार्मोन सेरोटोनिन का स्तर बढ़ता है और दुखी रहने पर गिरता है। इसके अलावा ठंड में जो रक्तसंचार धीमा हो जाता है, सूर्य नमस्कार उसे तेज करता है। उससे थकान, सुस्ती और मानसिक धुंधलापन कम होता है। यही नहीं, सांसों की लय और मानसिक तनाव भी सूर्य नमस्कार से सीधा-सीधा रिश्ता रखते हैं। हम सब जानते हैं कि लयबद्ध श्वास प्रक्रिया हमारे सिंपेथेटिक यानी स्ट्रेस और पैरासिंपेथेटिक यानी रिलैक्स सिस्टम को संतुलित बनाती है और क्योंकि सूर्य नमस्कार से हमारी श्वास प्रक्रिया लयबद्ध रहती है, इसलिए हम रिलैक्स महसूस करते हैं।
ऐसे करें सूर्य नमस्कार
शुरुआत में सूर्य नमस्कार चार से छह राउंड तक और धीरे-धीरे जब अभ्यस्त हो जाएं, इसे बढ़ाकर 12 चक्रों तक करना चाहिए। सबसे पहला राउंड या चक्र है प्रार्थना आसन। इसके लिए पैरों के साथ हथेलियां जोड़ें और लंबी सांस लें। यह प्रक्रिया हमें सूर्य नमस्कार के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है। इस महत्वपूर्ण आसन की दूसरी प्रक्रिया या दूसरा आसन, हस्त उत्तानासन है, जिसमें बांहों को फैलाया जाता है। इसके लिए हाथ ऊपर की ओर, पीठ थोड़ी पीछे करें। इससे ऊर्जा चैनल खुलते हैं। तीसरा चरण है हस्तासन- इसमें खड़े-खड़े आगे की तरफ झुकना होता है, लेकिन पैर सीधे होने चाहिए, हाथ आगे झुकना चाहिए और अंगुलियां पैरों के पास होनी चाहिए। इस पोज से दिमाग में रक्तसंचार बढ़ता है। चौथी प्रक्रिया या पोज है अश्व संचालनासन, इसमें दाहिना पैर पीछे होता है, सिर ऊपर होता है, इस पोज से छाती खुलती है और टेंशन कम होती है। पांचवीं प्रक्रिया या पोज है- दंडासन। इससे पूरा शरीर एक दंड के रूप में रहता है यानी पूरा शरीर एक सीध में होता है। इस आसन से एंडोर्फिन रिलीज होता है। छठी प्रक्रिया या पोज है अष्टांग नमस्कार। इससे घुटने, छाती, ठोड़ी जमीन पर स्पर्श करते हैं। इस आसन से हृदय क्षेत्र सक्रिय होता है।
उत्साह बढ़ाने के लिए भुजंगासन
सूर्य नमस्कार के सातवें पोज को भुजंगासन कहते हैं। इसमें छाती को उठाएं, कंधे पीछे ले जाएं। ऐसा करने से शारीरिक उत्साह बढ़ता है और थकान घटती है। पर्वतासन- यह इस आसन की आठवीं प्रक्रिया पोज है। इसके चलते कूल्हे ऊपर करने होते हैं और पूरा शरीर ‘वी’ शेप में उलटा हो जाता है। इस आसन से दिमाग को ऑक्सीजन की आपूर्ति होती है और हमारा मूड बेहतर रहता है। अब अंत में चार आसन दोहराए जाते हैं। इस तरह फिर से अश्व संचालनासन पोज करना होता है। बस फर्क ये होता है कि पहली बार जो पैर आगे निकाला होता है, अब दूसरा पैर आगे निकालते हैं। इसके बाद पद हस्तासन को दोहराते हैं और इस बार दोनो पैरों के पास झुकते हैं। अगला आसन हस्त उत्तानासन है, जिसमें हाथ ऊपर करके हल्का बैकबैंड करना होता है। अंत में फिर पहली वाली स्थिति में आ जाते हैं यानी प्रार्थना आसन। यह करते ही सूर्य नमस्कार का एक राउंड पूरा हो जाता है। शुरुआत करते समय एक या दो राउंड करने चाहिए और जैसे-जैसे आपकी क्षमता बेहतर होने लगे, अपने राउंड बढ़ा दें। लेकिन कभी भी तब नहीं करना चाहिए, जब यह आसन करते समय बहुत थकान आदि महसूस हो।
सावधानियां भी बरतें
यूं तो सूर्य नमस्कार एक साथ बेहद वैज्ञानिक और सरल प्रक्रिया वाला आसन है, फिर भी इसे करते समय कुछ सावधानियां बरतनी जरूरी होती हैं। मसलन जिन्हें तेज बुखार हो या शरीर में अत्यधिक कमजोरी हो, हाल में किसी भी वजह से सर्जरी हुई हो, हाई बीपी हो, स्लिप डिस्क या गंभीर किस्म का कमर दर्द रहता हो, उन्हें सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहिये। वहीं कुछ खाकर तुरंत सूर्य नमस्कार करना बहुत घातक होता है। साथ ही कभी भी सूर्य नमस्कार सांस रोककर नहीं करना चाहिए। -इ.रि.सें.
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