पसंदीदा विकल्प के चुनाव से कामयाबी
हां कहना सकारात्मक माना जाता है और न कहना नकारात्मक, लेकिन बात अगर कैरियर चुनने की हो तो न कहना ज्यादा सकारात्मक होता है। इसलिए जो काम न करना चाहते हों, उसके आसान विकल्प मिलें तो बेहतर है ‘न’...
हां कहना सकारात्मक माना जाता है और न कहना नकारात्मक, लेकिन बात अगर कैरियर चुनने की हो तो न कहना ज्यादा सकारात्मक होता है। इसलिए जो काम न करना चाहते हों, उसके आसान विकल्प मिलें तो बेहतर है ‘न’ कहने का जोखिम उठाना सीखें। मनपसंद विकल्प के चुनाव से कामयाबी के चांस ज्यादा होते हैं।
जिंदगी में कई बार ‘हां’ से ज्यादा जरूरी और ताकतवर होता है, ‘नहीं’। विशेषकर कैरियर में सफल होने के लिए अगर शुरू से ही हमें यह पता हो कि हम क्या नहीं बनना चाहते, तो बहुत फायदा होता है। कैरियर के संबंध में ऑक्सफोर्ड में हुए एक शोध के मुताबिक 60 फीसदी से ज्यादा लोग ऐसे कामों में लगे होते हैं, जिन्हें वो करना पसंद नहीं करते, मगर जोखिम न उठाने के चलते वो ऐसे काम जीवनभर करते रहते हैं। इसके साथ ही एक अन्य शोध हुआ है कि दुनिया में जितने सफल लोग हैं, उसमें 90 फीसदी से ज्यादा ऐसे हैं, जो उस काम को कर रहे हैं, जिसे वह करना चाहते थे। दरअसल जब हम कोई ऐसा काम करते हैं, जो हमारा मनपसंद होता है, उसमें सफल होने के चांस 10-20 फीसदी नहीं बल्कि करीब 100 फीसदी ज्यादा होते हैं। इसलिए सफलता की असली नींव क्या करना है, से नहीं बल्कि क्या नहीं करना है, से पड़ती है। जिस दिन हम यह समझ लेते हैं कि हम जीवन में क्या नहीं करना चाहते, उसी समय हमारे करने वाले कामों की लिस्ट बिल्कुल साफ और सफलता की उम्मीद बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है।
‘नहीं’ क्यों जरूरी है
हम अकसर यह मानकर चलते हैं कि हां कहना सकारात्मक होता है और न कहना नकारात्मक, लेकिन बात अगर स्पष्ट रूप से जिंदगी में कैरियर की दिशा चुनने की हो तो न कहना ज्यादा सकारात्मक होता है बजाय किसी चीज में हां कर देने के। ‘हां’ कहना जितना आसान होता है, उसका नुकसान उतना ही बड़ा होता है। इसलिए जो काम न करना चाहते हों, उसे करने के आसान विकल्प मिलें तो बेहतर है ‘न’ करना सीखें।
‘नहीं’ से शुरुआत सफल कैरियर की
सफल लोग पहले यह तय करते हैं कि उन्हें क्या नहीं करना। इसलिए वे हर काम और हर मौके पर कूद नहीं पड़ते। वे हर सलाह को आदेश नहीं मानते। ऐसे लोग हर अपेक्षा को अपने सिर पर नहीं ढोते। दरअसल सफलता के दर्शन को दुनिया में कई नामों से जाना जाता है जैसे- फोकस, प्राथमिकता, सीमाएं और आत्मनियंत्रण। लेकिन सबका मूल एक ही है। आखिर मैं क्या नहीं करना चाहता?
‘न’ कहने का डर किसलिए
इसकी वजह है कि न कहना गैर सामाजिक माना जाता है। इसलिए लोग न कहने से बचते हैं। लेकिन अगर न कहने से आप बचते हैं तो आखिरकार उसी न में फंस भी जाते हैं। इसलिए जब कैरियर के बारे में गंभीरता से सोचें तो अपनी सबसे पहली और जरूरी लिस्ट यह बनाएं कि आप क्या-क्या नहीं करना चाहतें। अगर समय रहते आपमें यह स्पष्टता नहीं आयी, तो एक दिन आपको मजबूर होकर ‘नहीं’ खुद सिखा देगी। मसलन बीमारी के जरिये, असफलता के चलते या पछतावे के कारण।
साबित करने की तार्किकता
कामयाबी के लिए यह भी बेहतर है कि आप खुद को हर जगह साबित ‘नहीं’ करने की सोच बनाएं। दरअसल जगह अपनी काबिलियत दिखाने की कोई जरूरत नहीं होती। अपनी काबिलियत वहीं दिखाइये, जहां वाकई उसकी जरूरत है। वहीं लोग क्या कहेंगे, इस डर से आप फैसले ‘नहीं’ करते। जिस दिन आप फैसले लेने में लोग क्या कहेंगे को माइनस कर लेते हैं तो आपके सारे फैसले सही होने लगते हैं।
सही विकल्पों का चुनाव
सही चीजें चुनना, गलत चीजें छोड़ने में स्वतः शामिल हैं। इसलिए असली सफलता गलत चीजों को छोड़ना है। हम अकसर सोचते हैं सफलता का मतलब क्या है? सही कॉलेज चुनना, सही नौकरी चुनना, सही पाटर्नर चुनना। लेकिन ये अधूरी बात है। क्योंकि सही चुनना इस तथ्य में निहित है, जब आप गलत चुनने से खुद को बचा लें। इसलिए सही फैसला, सही चुनना नहीं है। सही फैसला गलत को छोड़ना है या नहीं चुनना है। गलत आदतें, गलत दोस्त, गलत कार्यस्थल, गलत दिशा और गलत सोच। इन्हें अगर हम छोड़ने की एक बार हिम्मत कर लें, तो सफलता का दरवाजा आसानी से खुल जाता है।
अपने ‘न’ की सूची बनाएं
तो अपने भीतर झांकिये और पेन उठाइये, फिर डायरी में लिखिए - मुझे किन बातों से दुख होता है। मैं क्या करके खालीपन महसूस करता हूं। मैं किससे मिलने के बाद बेचैन हो जाता हूं। किन लोगों के बीच खुद को छोटा महसूस करता हूं। अंत में यह लिख दीजिए मैं अब ये नहीं करुंगा। -इ.रि.सें.

