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गीत-संवाद ही बन गए हिंदी की पाठशाला

हिंदी दिवस : 14 सितंबर

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फिल्मी गीतों व संवादों ने हिंदी को भारत से बाहर पहचान दिलाई, तो देश के भीतर हजारों गीतों ने अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच अपनी जगह बनाई। आज भी कोई हिंदी गीत दक्षिण भारत के किसी शहर में सुनाई दे जाए तो असामान्य बात नहीं लगती। सिनेमा ने किसी से यह नहीं कहा कि हिंदी सीखिए। बस अपनी कहानियां दिखाई, गीत सुनाए और किरदारों को हिंदी में बोलते दिखाया।

हिंदी दिवस पर हिंदी की चर्चा हो और फिल्मों का जिक्र न हो, यह कुछ ऐसा ही है जैसे बरसात की बात हो और मिट्टी की खुशबू को भूल जाएं। हिंदी के प्रचार-प्रसार में सिनेमा ने जो काम किया है, वह किसी योजना या मुहिम के तहत नहीं हुआ। फिल्मों ने अपनी कहानी कही, गाने गाए, संवाद बोले और देखते-देखते हिंदी देश के उन हिस्सों तक पहुंच गई, जहां वह घर की भाषा नहीं थी। इस बात को समझने के लिए बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। अपने बचपन के दिनों को याद कीजिए। घर में रेडियो पर फिल्मी गीत बजते थे। सुनने वाले को यह पता नहीं होता था कि वह हिंदी भाषा के प्रचार में कोई योगदान दे रहा है। उसे तो बस गीत अच्छा लगता था। उसकी धुन, आवाज और बोल मन में बैठ जाते थे। जो लोग हिंदी नहीं जानते थे, वे भी कई बार गीत के बोल गुनगुना लिया करते थे।

संवादों-गीतों ने सिखाई हिंदी

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फिल्मों ने हिंदी को किसी पाठशाला की तरह नहीं सिखाया। उन्होंने उसे बोलते हुए दिखाया। कभी हीरो के संवाद में, कभी मां की डांट में, कभी प्रेमिका की नाराजगी में और सबसे ज्यादा गीतों में। हिंदी फिल्मों के गीतों की दुनिया अपने आप में एक लंबी कहानी है। मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, किशोर कुमार, आशा भोंसले, मुकेश जैसे गायकों की आवाजें दूर-दूर तक पहुंचीं। इन आवाजों को सुनने के लिए हिंदी जानना जरूरी नहीं था। गीत अच्छा लगना चाहिए था, बस। कई गैर-हिंदी भाषी लोग ऐसे मिल जाएंगे जो हिंदी में दो मिनट बातचीत करने में अटक जाएंगे, लेकिन किसी पुराने हिंदी फिल्मी गीत की चार पंक्तियां पूरे भरोसे के साथ गा देंगे। गीत के हर शब्द का अर्थ शायद उन्हें मालूम न हो, लेकिन धुन और बोल याद रहेंगे।

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सागरों के पार पहुंचे गीत यादगार

फिल्मी गीतों की यह यात्रा भारत तक ही सीमित नहीं रही। राज कपूर की फिल्मों की लोकप्रियता इसका उदाहरण है। एक समय सोवियत संघ और कुछ दूसरे देशों में उनकी फिल्मों के साथ उनके गीत भी पहुंचे। श्री 420 का ‘मेरा जूता है जापानी’ इस सिलसिले में खास तौर पर याद आता है। गीत में जापान है, इंग्लैंड है और हिंदुस्तान है, लेकिन गीत हिंदी में है। राज कपूर के अंदाज और शंकर-जयकिशन के संगीत ने इसे ऐसा गीत बना दिया जिसे भाषा की पूरी समझ के बिना भी याद रखा जा सकता था। राज कपूर की फिल्मों को पसंद करने वाले बहुत से विदेशी दर्शकों के लिए हिंदी कोई पढ़ी जाने वाली भाषा नहीं थी। वह पर्दे पर दिखाई देने वाले भारत की आवाज थी। गीतों ने इस पहचान को और आसान कर दिया।

गैर-हिंदी भाषी इलाकों तक पहुंच

हिंदी फिल्मों और उनके गीतों ने उन इलाकों में भी जगह बनाई, जहां हिंदी लोगों की मातृभाषा नहीं थी। दक्षिण भारत में हिंदी फिल्मों को लंबे समय से देखा जाता रहा है। हिंदी फिल्मी गीत भी वहां सुने जाते रहे हैं। तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम भाषी इलाकों में हिंदी गीतों की अपनी जगह रही है। पुराने दौर में रेडियो और बाद में कैसेटों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई। घरों के अलावा दुकानों, बसों और छोटे-बड़े समारोहों में बजते हिंदी गीत धीरे-धीरे परिचित होते गए। किसी दक्षिण भारतीय को हिंदी बोलते सुनना भी कई बार दिलचस्प अनुभव होता है। हिंदी उसकी पहली भाषा नहीं है, इसलिए बोलते समय उसकी अपनी भाषा की छाप सुनाई देती है। लेकिन सुनने वाला समझ जाता है कि बात क्या कही जा रही है। किसी को हिंदी सीखने के लिए पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ी। फिल्में देखते हुए ‘क्या हुआ’, ‘कहां जा रहे हो’, ‘मुझे नहीं पता’, ‘तुम ठीक हो’ जैसे वाक्य कानों में पड़ते रहे। जिस तरह हिंदी फिल्मों और उनके गीतों ने दक्षिण भारत में अपनी जगह बनाई, उसी तरह दक्षिण भारतीय सिनेमा भी हिंदी पट्टी में पहुंचा। दक्षिण भारत में हिंदी गीत सुनने वालों की कमी नहीं रही। गीत सुनने के लिए भाषा की जानकारी जरूरी नहीं होती। धुन अच्छी लगी तो गीत याद रह जाता है। शब्दों का अर्थ बाद में भी समझा जा सकता है।

फिल्म संगीत का लंबा सफर

राज कपूर के गीतों से लेकर रफ़ी, लता, किशोर और आशा भोंसले की आवाजों तक हिंदी फिल्म संगीत की यह यात्रा लंबी रही है। ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे गीतों ने हिंदी को भारत से बाहर पहचान दिलाई, तो देश के भीतर हजारों गीतों ने अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच अपनी जगह बनाई। आज भी कोई हिंदी गीत दक्षिण भारत के किसी शहर में सुनाई दे जाए तो यह कोई बहुत असामान्य बात नहीं लगती। सिनेमा ने किसी से यह नहीं कहा कि हिंदी सीखिए। फिल्मों ने बस अपनी कहानियां सुनाईं, गीत सुनाए और अपने किरदारों को हिंदी में बोलते दिखाया।

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