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बालमन को उलझनों से बचाएगी संवेदनशील पहल

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस : 10 सितंबर

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कई बार बच्चा किसी समस्या के कारण परेशानी व तनाव में होता है लेकिन पैरेंट्स को नहीं बताता है। उस निराशा व चुप्पी के पीछे परीक्षा का दबाव, कम अंक आने का डर, दोस्ती टूटना, स्कूल बुलिंग, रंगरूप को लेकर असुरक्षा, सोशल मीडिया पर तुलना व साइबर बुलिंग जैसा कोई कारण हो सकता है। ऐसी स्थिति में बच्चों-किशोरों में आत्मघात के मामले भी सामने आते हैं। जिनकी रोकथाम के लिए जरूरी है कि अभिभावक उसके बदले व्यवहार को लेकर सचेत रहें, उसकी दिक्कत समझें, बातचीत करें, भरोसा पैदा करें व जरूरी हो तो विशेषज्ञ की मदद लें। 

कभी बच्चा स्कूल से लौटकर बैग पटकता था और बिना किसी झिझक के बता देता था कि आज टीचर ने क्या कहा, किस दोस्त से क्यों झगड़ा हुआ या खेल में कौन जीता? आज वही बच्चा अपने कमरे में घंटों चुप बैठा रहता है, मोबाइल की स्क्रीन पर उसकी उंगलियां चलती रहती हैं, लेकिन घरवालों से बातचीत के शब्द कम होते जाते हैं। पूछिये क्या हुआ, तो छोटा सा जवाब मिलता है- ‘कुछ नहीं’। पर यह ‘कुछ नहीं’ हमेशा कुछ नहीं होता, कई बार उसके पीछे परीक्षा का दबाव, कम अंक आने का डर, दोस्ती टूटने का दु:ख, स्कूल बुलिंग, शरीर और रंगरूप को लेकर असुरक्षा, सोशल मीडिया पर तुलना, साइबर बुलिंग या माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने का अपराधबोध छिपा होता है। यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है, जब बच्चा यह मान ले कि उसकी परेशानी सुनने वाला कोई नहीं। हर साल 10 सितंबर का विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस हमें इसी अनदेखे संकट की ओर देखने का अवसर देता है।

सफलता का सीमित और छोटा पैमाना

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बच्चों और किशोरों के संदर्भ में आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर बात करते समय जरूरी है कि हम सनसनी से बचें और उस मानसिक पीड़ा को समझें, जिसमें कोई बच्चा खुद को बेहद अकेला या निराश महसूस कर सकता है। हमने बच्चों की सफलता का पैमाना बहुत छोटा कर दिया है। इसे परीक्षा के अंकों, रैंक, प्रवेश परीक्षा की सफलता, नौकरी और उपलब्धियों से जोड़ दिया है। अंक 95 प्रतिशत आये तो उत्सव, 75 प्रतिशत आये तो दु:ख। यह अच्छी बात नहीं है। क्योंकि बच्चे की जिंदगी सिर्फ मार्कशीट नहीं। हालांकि कई बार माता-पिता का इरादा गलत नहीं होता, वे बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए मेहनत करने को कहते हैं। लेकिन लगातार तुलना, ‘देखो फलां जी का बेटा... या तुम्हारी सहेली तुमसे आगे क्यों निकल गई।’ धीरे-धीरे बच्चे के मन में यह बात बैठ जाती है, कि उसकी स्वीकार्यता वास्तव में उसकी उपलब्धियों पर निर्भर है। ऐसे में असफलता केवल एक परीक्षा में कम अंक नहीं रह जाती, वह बच्चे की अपनी पूरी पहचान पर सवाल उठाने लगती है। स्कूल में किसी बच्चे को लगातार चिढ़ाया जाना, उसके शरीर, रंग, कपड़े, भाषा या परिवार को लेकर मजाक उड़ाया जाना, यह मामूली शरारत नहीं। कई बार यह बच्चे के लिए रोज का मानसिक दबाव बन जाती है।

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डिजिटल दुनिया ने जटिल बनायी समस्या

डिजिटल दुनिया ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। पहले स्कूल की छुट्टी के बाद बुलिंग कुछ समय के लिए रुक जाती थी, अब अपमानजनक संदेश, मीम, फोटो या टिप्पणियां बच्चे के मोबाइल तक घर पहुंच सकती हैं और सबसे कठिन बात माता-पिता को अकसर इसका पता तब चलता है, जब बच्चा काफी समय से इसे अकेले झेल रहा होता है। खतरनाक बात यह कि सोशल मीडिया ने तमाम समस्याओं, चाहे वह तुलना की जाने की हो या बुलिंग की, को 24 घंटे की समस्या बना दिया है। बच्चा मोबाइल खोलता है तो उसे दूसरे बच्चों की उपलब्धियां डराने लगती हैं। किसी का शानदार बर्थडे, किसी की सपनीली पिकनिक, किसी की नई ड्रेस, किसी की परीक्षा में सफलता और किसी के हजारो फॉलोअर्स। बच्चे को यह नहीं दिखायी देता कि सोशल मीडिया पर दिखायी जाने वाली जिंदगी वास्तविक जिंदगी का पूरा चित्र नहीं है, वो तो बस इस सबसे अपनी तुलना करने लगता है और सोचने लगता है, सब मुझसे बेहतर हैं। यही कारण है कि बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर निगरानी के साथ-साथ उनसे डिजिटल दुनिया की वास्तविकता पर बातचीत करना भी जरूरी है। सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं कि मोबाइल छोड़ दो। बच्चे को समझाना होगा कि ऑनलाइन पॉपुलेरिटी और वास्तविक सेल्फ-वर्थ दो भिन्न चीजें हैं।

व्यवहार में बदलाव पर निगरानी जरूरी

याद रखिए, सबसे खतरनाक संकेत हमेशा नाटकीय नहीं होते। किसी बच्चे के व्यवहार में आये हल्के से बदलाव को भी जांचना चाहिए और अगर यह लगातार बना रहे, तो गंभीर हो जाएं। अगर वह दोस्तों से दूर रहने लगा हो, पढ़ाई में रुचि न ले रहा हो, उसकी नींद या खाने के व्यवहार में बदलाव दिखे, खुद को बेकार या बोझ समझने लगा हो, तो इन सब बातों को केवल उम्र का असर कहकर टालना ठीक नहीं। हालांकि ऐसे संकेतों का अर्थ हमेशा आत्महत्या का जोखिम भी नहीं होता, लेकिन ऐसे लक्षण यह जरूर बताते हैं कि बच्चे को भावनात्मक मदद की जरूरत है। ऐसे में माता-पिता बच्चे को डराएं नहीं। शांत तरीके से पूछें, ‘बेटा/बेटी तुम्हारे दिमाग में क्या चल रहा है, क्या कोई ऐसी बात है जिसे तुम हमसे कहने से डर रहे हो? अगर तुमसे कोई गलती हो गई, तब भी हम तुम्हारे साथ हैं।’ ऐसे वाक्य बच्चे के लिए अपनी बात कह देने की हिम्मत बंधाते हैं।

धैर्य के साथ गंभीरता बरतें अभिभावक

जरूरी नहीं कि मां-बाप बच्चे के हर सवाल को सुनकर उसे तुरंत समाधान सुझाने लगें। मां-बाप को तुरंत भाषण भी नहीं शुरू कर देना चाहिए कि तुम्हारी उम्र में हमें भी समस्याएं थीं, कि इतनी छोटी-छोटी बात पर परेशान क्यों हो जाते हो? ये तमाम बातें बोलने की जरूरत नहीं है। क्योंकि बच्चे को अपने होने की स्वीकृति चाहिए होती है। इसलिए उसकी बात को ध्यान से सुनें, उसे छोटा मत करें और अगर स्थिति गंभीर लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, स्कूल काउंसलर या अन्य विश्वसनीय पेशेवर की सहायता लें। खास बात यह कि मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या काउंसलर की मदद लेने का मतलब यह नहीं कि बच्चा मानसिक रूप से कमजोर या पागल है। दरअसल जिस तरह शरीर के बीमार होने पर एक डॉक्टर की जरूरत होती है, वैसे ही मन के संकट में घिर जाने से मनोचिकित्सक चाहिए।

घर में भरोसे और सुरक्षा का माहौल

घर को ऐसा स्थान बनाइये, जहां असफल होना भी सुरक्षित हो। शायद आत्महत्या रोकथाम की सबसे मजबूत शुरुआत किसी हेल्पलाइन से भी पहले घर में होती है। ऐसा घर जहां बच्चा कह सके कि मेरे अंक खराब आए हैं या कि मेरा दोस्त मुझसे बात नहीं कर रहा, मुझे अपने शरीर को लेकर अच्छा नहीं फील होता या यह कि मैं बहुत परेशान हूं। दिल की ऐसी बातें मां-बाप के सामने निकालकर रखते समय बच्चे को भरोसा होना चाहिए कि गलत होने पर भी वह मां-बाप के समक्ष अपना मूल्य नहीं खोयेगा। वास्तव में यह सुरक्षा ही बच्चे को बेबाक बनाती है, उसे किसी भयावह परेशानी से बचाने के लिए सरल और विश्वसनीय तरीका भी है। यदि बच्चे को अपने घर में ऐसा माहौल मिले, जहां उसे भरोसा हो कि उसके साथ नाइंसाफी नहीं होगी, तो वह आत्महत्या जैसे भयावह कदम को कभी नहीं उठायेगा। -इ.रि.सें.

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