इंसान सदियों से सुंदर होने के उपाय खोजता रहा है। अब विज्ञान भी इसके रहस्य खोजने में लगा है। मसलन त्वचा की संरचना के विज्ञान व उसे हमेशा जवान रखने, एजिंग की प्रक्रिया जानने और रोकने के उपायों के अलावा हार्मोन और सौंदर्य के बीच संबंध की तलाश जारी है। इसमें कॉस्मेटिक सर्जरी, जीन एडिटिंग, एआई आधारित तकनीकों से काफी हद तक सफलता मिली है और स्थायी समाधान की भी उम्मीद है।
क्या इंसानी खूबसूरती का कोई स्थायी और सार्वभौमिक फार्मूला हो सकता है? 19वीं शताब्दी से ही विज्ञान इस सवाल का जवाब ढूंढ़ रहा है। यह सवाल आज केवल दर्शन या सौंदर्यशास्त्र का सवाल नहीं है बल्कि खूबसूरती का रहस्य और उसकी खोज अब विज्ञान भी अपने स्तर पर न सिर्फ कर रहा है बल्कि इस सवाल के कई हिस्सों की खोज कर भी चुका है। आधुनिक विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, जेनेटिक्स और कॉस्मेटिक मेडिसिन का अब लगभग यह केंद्रीय विषय बन चुका है कि दुनियाभर के इंसानों के लिए एक सार्वभौमिक खूबसूरती का पैमाना क्या हो? दरअसल इंसान सदियों से सुंदर होने के उपाय खोजता रहा है। कभी प्राकृतिक नुस्खों से, कभी शल्य चिकित्सा से, कभी जीन एडिटिंग से, तो कभी एआई आधारित तकनीकों से।
खूबसूरती की खोज की शुरुआत
विशेषकर जब से एनाटॉमी और डर्मटलॉजी का व्यवस्थित विकास हुआ तभी से वैज्ञानिक इंसान की स्थायी खूबसूरती का समाधान खोज रहे हैं। मसलन -त्वचा की संरचना का विज्ञान क्या है और इसे हमेशा जवान कैसे बनाये रखा जा सकता है? उम्र बढ़ने की प्रक्रिया क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है? हार्मोन और सौंदर्य के बीच क्या संबंध हैं, क्या हार्मोन में ही इंसानी सौंदर्य का रहस्य छिपा है? दरअसल 20वीं सदी के मध्य में प्लास्टिक सर्जरी का विकास होकर वह एक स्वतंत्र चिकित्सा शाखा बनी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद घायल सैनिकों के संदर्भ में विशेषकर चेहरे और शरीर की बनावट तकनीकों पर लगातार शोध हुआ और यह उन्नत हुईं, जिसके बाद कॉस्मेटिक सर्जरी लगभग चमत्कार की तरह सामने आयी। इस दौर में अनेक जैविक शोधों से यह स्पष्ट हुआ कि त्वचा का रंग, बालों की बनावट, चेहरे की आकृति और झुर्रियां - इन सबका बड़ा हिस्सा जीन द्वारा नियंत्रित होता है। अतः जीन नियंत्रण का विज्ञान समझ लिया जाए तो एक तरह से खूबसूरती पर नियंत्रण संभव है।
सौंदर्य का केंद्र है जेनेटिक्स
साल 2003 में ह्यूमन जेनोम प्रोजेक्ट लांच होना बड़ी बदलावकारी घटना थी। इससे यह समझ में आया कि मानव शरीर में मौजूद हजारों जीन, हमारे शरीर की अलग-अलग संरचनाओं और गुणों के लिए जिम्मेदार हैं। इस शोध से पता चला कि त्वचा की मोटाई का कारण क्या है? कोलेजन का उत्पादन कैसे होता है? उम्र बढ़ने की गति क्या होती है? बाल झड़ते क्यों हैं? केंद्रीय रूप से इन सबके पीछे विशिष्ट कारण सिर्फ जीन हैं। आज वैज्ञानिक जीनों की पहचान करके एजिंग के रहस्य का पर्दाफाश करने में लगे हैं। सैद्धांतिक रूप से जीन स्तर पर बदलाव करके एजिंग प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता है।
प्रभावी है कॉस्मेटिक टेक्नोलॉजी
हालांकि कॉस्मेटिक टेक्नोलॉजी अभी अस्थायी ही है। लेकिन यह सौंदर्य विज्ञान का सबसे विकसित क्षेत्र है और एस्थेटिक मेडिसिन को भविष्य में इंसान की खूबसूरती को स्थायी रूप देने में सक्षम माना जा रहा है। आज इसी विज्ञान के चलते- बोटोक्स, डर्मल फिलर्स, लेजर स्किन रिसर्फेसिंग तथा केमिकल पील्स जैसी प्रक्रियाओं से हम अपनी झुर्रियां कम कर रहे हैं। त्वचा को चिकनी, मुलायम और टाइट रख पाने में सफल हो रहे हैं तथा चेहरे को पसंदीदा आकृति देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अभी यह 100 फीसदी संभव नहीं है, लेकिन लगातार यह पहले से बेहतर होती जा रही है। ऐसे में कॉस्मेटिक टेक्नोलॉजी बहुत जल्द खूबसूरती का स्थायी समाधान बनकर सामने आ सकती है।
जीन एडिटिंग में भविष्य
साल 2012 के बाद जीन एडिटिंग तकनीक जिसे सीआरआईएसपीआर-सीएएस9 कहा जाता है, ने चिकित्सा जगत में क्रांति ला दी है। क्रिसपर (सीआरआईएसपीआर) तकनीक के जरिये वैज्ञानिक खराब जीन काट सकते हैं, नये जीन जोड़ सकते हैं, जीन के व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं। उम्मीद है कि भविष्य में इंसान गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर और जेनेटिक डिस्ऑर्डर से पार पाने में सफल रहेगा। एजिंग के प्रभाव को धीमा किया जा सकता है, बाल झड़ना रोका जा सकता है। हालांकि इसमें नैतिक और कानूनी द्वंद्व भी हैं।
एआई और पर्सनलाइज्ड ब्यूटी
आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस आधारित सिस्टम के जरिये अब हम यह जान सकते हैं कि किसी व्यक्ति की त्वचा कितनी बूढ़ी है, वह किस रफ्तार से बूढ़ी हो रही है, उसे किस उम्र में कौन सी समस्या परेशान करेगी और उस परेशानी से निपटने के लिए कौन सी तकनीक या प्रक्रिया प्रभावी साबित होगी। इस सारी जानकारी को पर्सनलाइज्ड ब्यूटी प्लान के नाम से जानते हैं और इस प्लान के अस्तित्व में आने के बाद अब अलग-अलग इंसानों का स्वतंत्र रूप से खूबसूरत और स्वस्थ होना ज्यादा आसान हुआ है। लेकिन अभी यह पूरी तरह से विकसित विज्ञान नहीं बल्कि रोकथाम तक की सीमित है। अभी इस तकनीक के जरिये हम किसी इंसान में स्थायी परिवर्तन नहीं हासिल कर पा रहे। लेकिन वैज्ञानिकों को भरोसा है कि अब स्थायी समाधान हासिल करने में बहुत देर नहीं है। -इ.रि.सें.

