Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

संयुक्त परिवार के सुकून में स्त्री अस्मिता की तलाश

देश में आजकल एकल परिवार बहुतायत में हैं व संयुक्त परिवार कम हो रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण भी इसी सामाजिक बदलाव की ओर संकेत करता है। यह केवल रहन-सहन का परिवर्तन नहीं, बल्कि सोच, अपेक्षा और आत्मसम्मान का...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

देश में आजकल एकल परिवार बहुतायत में हैं व संयुक्त परिवार कम हो रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण भी इसी सामाजिक बदलाव की ओर संकेत करता है। यह केवल रहन-सहन का परिवर्तन नहीं, बल्कि सोच, अपेक्षा और आत्मसम्मान का सवाल है। प्रमुख वजह है साझे परिवार में महिलाओं पर जिम्मेदारियों का असमान बोझ वहीं व्यक्तिगत आजादी की कमी भी। कामकाजी महिलाओं के लिए संतुलन कठिन हो जाता है। लेकिन इससे बच्चे दादा-दादी के सान्निध्य से वंचित रह जाते हैं।

कभी भारतीय समाज की पहचान रहा संयुक्त परिवार आज धीरे-धीरे एक यादगार में बदलता जा रहा है। एक छत के नीचे कई पीढ़ियों का साथ, रसोई से आंगन तक गूंजती आवाज़ें और बच्चों के आसपास बुजुर्गों का साया- यह सब अब अपवाद बनता जा रहा है। इस समस्त बदलाव के केंद्र में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि आख़िर महिलाएं संयुक्त परिवार से दूरी क्यों बना रही हैं?

2011 की जनगणना बताती है कि देश में केवल 18 प्रतिशत घर ऐसे बचे हैं, जहां दो या उससे अधिक विवाहित दंपति साथ रहते हैं। हालिया अनुमानों के अनुसार, लगभग 66 प्रतिशत परिवार न्यूक्लियर हो चुके हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) भी इसी सामाजिक बदलाव की ओर संकेत करता है। यह केवल रहन-सहन का परिवर्तन नहीं, बल्कि सोच, अपेक्षा और आत्मसम्मान का सवाल है।

घरेलू बोझ और असमान जिम्मेदारियां

संयुक्त परिवार में महिला की भूमिका परंपरागत रूप से तय होती रही है। वह घर की धुरी मानी जाती है, लेकिन फैसलों की मेज पर उसकी कुर्सी अक्सर खाली रहती है। घरेलू कामकाज, बुजुर्गों की देखभाल और पारिवारिक जिम्मेदारियां। इन सबका सबसे बड़ा भार उसी पर आता है। कई अध्ययनों में सामने आया है कि संयुक्त परिवारों में लगभग 67 प्रतिशत महिलाएं अत्यधिक घरेलू श्रम से प्रभावित हैं। पुरुषों के लिए यह जिम्मेदारी साझा होती है, लेकिन महिलाओं के लिए यह अनकही अपेक्षा बन जाती है। शहरों में यह असंतोष और स्पष्ट दिखाई देता है। पुणे में हुए एक सर्वे में 72 प्रतिशत महिलाओं ने न्यूक्लियर परिवार को अपनी प्राथमिकता बताया। पुरुषों में यह आंकड़ा लगभग आधा रह गया है। एक अन्य अध्ययन बताता है कि संयुक्त परिवार में रहने वाली 60 प्रतिशत महिलाएं अवसर मिलने पर अलग रहना चाहेंगी। वजह साफ है निजी स्वतंत्रता और निर्णय की आज़ादी।

टकराव, हस्तक्षेप और निर्णय की कमी

संयुक्त परिवार में रहने वाली केवल 28 प्रतिशत महिलाओं को ही संतोषजनक व्यक्तिगत आज़ादी मिल पाती है। बाकी महिलाओं के लिए हर निर्णय से पहले परिवार की सहमति ज़रूरी हो जाती है, फिर चाहे वह नौकरी का सवाल हो, संतान की योजना हो या अपने समय का उपयोग। सास-बहू के रिश्ते में तनाव, प्रजनन अधिकारों में हस्तक्षेप, बेटे की अपेक्षा और संपत्ति में सीमित अधिकार - ये सब कारक मिलकर किसी भी महिला के मन में अलग रहने की चाह को जन्म देने के लिए काफी हैं। दरअसल, कामकाजी महिलाओं के लिए यह टकराव और गहरा हो जाता है। दफ्तर और घर के बीच संतुलन साधना आसान नहीं होता। ऐसे में न्यूक्लियर परिवार उन्हें सांस लेने की जगह देता है। वह जगह, जहां वे सिर्फ बहू या पत्नी नहीं, एक स्वतंत्र व्यक्ति भी हो सकती हैं। आर्थिक स्वतंत्रता ने इस बदलाव को और तेज़ किया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी एनएफएचएस-5 के अनुसार 43 प्रतिशत महिलाएं अब किसी न किसी संपत्ति की मालिक हैं। इससे उनकी निर्णय क्षमता बढ़ी है। वे अब अपने जीवन की शर्तें स्वयं तय करना चाहती हैं। ऐसे में संयुक्त परिवार से अलग होने का फैसला केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी बन जाता है।

संयुक्त परिवार में सुकून या समझौता

यह सच है कि संयुक्त परिवार में भावनात्मक सुरक्षा होती है। जिम्मेदारियां बंटती हैं। बच्चे बुजुर्गों के सान्निध्य में पलते हैं। लेकिन यह सुकून तभी संभव है, जब महिला को बराबरी का सम्मान मिले। जब हर सवाल को ‘जिद’ और हर असहमति को ‘दखल’ न कहा जाए। आज महिलाएं आज़ादी और समानता को प्राथमिकता दे रही हैं। यह समाज के बदलते चेहरे का संकेत है। इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ रहा है। बच्चे दादा-दादी के स्नेह से दूर हो रहे हैं। पारिवारिक संवाद सीमित होता जा रहा है।

कोरोना काल में संयुक्त परिवार की अहमियत एक बार फिर समझ में आई थी। लेकिन सीख स्थायी नहीं रही। शायद अब समय आ गया है कि संयुक्त परिवार की परिभाषा बदली जाए। जहां परंपरा के साथ सम्मान और अनुशासन के साथ स्वतंत्रता भी हो। क्योंकि बिना महिला की सहमति और संतोष के कोई भी परिवार, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो, टिक नहीं सकता।

व्यक्तिगत आजादी और कैरियर

इंदौर स्थित महिला एवं बाल विकास मामलों की विशेषज्ञ सीनियर एडवोकेट के मुताबिक, ये समाज के बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है। महिलाएं अपनी व्यक्तिगत आजादी और कैरियर को सबसे ज्यादा महत्व देने लगी हैं। कई बार ये उनकी मजबूरी होती है, पर हर बार नहीं। लेकिन, इससे समाज में टूटन होने लगी जिसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। बच्चे दादा-दादी के स्नेह से वंचित होकर एकाकी हो गए जिससे उनका स्वाभाविक विकास भी प्रभावित हो रहा है। लेकिन, ज्यादातर महिलाएं इस सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं और तात्कालिक आजादी से खुश होती हैं। कोरोनाकाल में इस पर कुछ हद तक अंतर आया था, पर अब फिर वही स्थिति है। समाज भी इस परिस्थिति में खुद को ढाल रहा है।

 

Advertisement
×