होटल में खराब गुणवत्ता का या नुकसानदेह भोजन परोसना खाद्य उद्योग में देखभाल के कर्तव्य का कानूनन उल्लंघन माना जाता है। ऐसे ही एक मामले में उपभोक्ता द्वारा मुंबई जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत की गयी तो होटल को सेवा में कमी के लिए उत्तरदायी ठहराया व मुआवजा लगाया। ऐसा ही उल्लंघन बुकिंग के मुताबिक सुविधा न देने का भी है।
जब होटल द्वारा दी गई सेवाओं में घोर लापरवाही बरती जाए और उपभोक्ता को परेशानी का सामना करना पड़े तो पीड़ित उपभोक्ता न्याय के लिए उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, मुंबई ने एक होटल कम्पनी को उपभोक्ता को पत्थर युक्त भोजन परोसने के लिए दोषी ठहराया है। उपभोक्ता अपने दोस्त के साथ 28 सितंबर साल 2022 को लंच के लिए मुंबई के एक होटल गया था। उपभोक्ता के अनुसार, उन्होंने जो भोजन ऑर्डर किया था, उसमें एक पत्थर का कण था जिसे खाने से पत्थर का टुकड़ा दांत के नीचे आ जाने पर दांत में तेज दर्द हुआ और उसका क्राउन टूट गया। उपभोक्ता ने होटल के प्रबंधक से शिकायत की जिसपर उन्होंने माफी मांगी। उपभोक्ता ने अपने दांत का इलाज कराया जिसमें लगभग 16 हजार रुपये खर्च हो गए।
उपभोक्ता आयोग ने माना सेवा में कमी
पीड़ित उपभोक्ता ने होटल प्रबंधन से नुकसान की भरपाई की मांग की, लेकिन होटल ने इससे इनकार कर दिया। इसलिए, शिकायतकर्ता द्वारा मुंबई जिला उपभोक्ता आयोग के समक्ष शिकायत दायर की गई जिसमें मुआवजे की प्रार्थना की गई। सभी संबंधित दस्तावेज जैसे भोजन का बिल और दंत चिकित्सक का प्रमाण पत्र शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया। जबकि होटल प्रबंधन 45 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने में विफल रहा हालांकि लिखित दलील दी कि उपभोक्ता आयोग का इस शिकायत पर फैसला करने का अधिकार क्षेत्र नहीं व शिकायत में सच्चाई नहीं है। आयोग ने पेश दस्तावेजों का संज्ञान लिया कि भोजन में पत्थर जैसा कठोर टुकड़ा होने की पुष्टि होती है। खाद्य उद्योग में यह सुनिश्चित करना देखभाल के कर्तव्य के तहत है कि जो परोसा गया भोजन हानिकारक पदार्थों से मुक्त हो। निर्णय में के. दामोदरन बनाम होटल सरस्वती (2007) में कर्नाटक राज्य उपभोक्ता आयोग के फैसले का उल्लेख किया गया ,जहां ऐसे ही अन्य मामले में सेवा में लापरवाही के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। इस प्रकार, होटल को सेवा में कमी के लिए उत्तरदायी ठहराया गया। आयोग ने पीड़ित उपभोक्ता को दांत उपचार खर्च 16,000 रुपये , 10,000 रुपये मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न मुआवजा और 5,000 रुपये कानूनी खर्च देने का आदेश दिया।
बुकिंग के बावजूद रूम न देने पर मुआवजा
ऐसे ही एक अन्य मामले में एर्नाकुलम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने ऑनलाइन बुकिंग एप्लिकेशन के माध्यम से पहले से बुक किए गए कमरे उपलब्ध कराने में विफल रहने के लिए रूम्स मुहैया कराने वाली एक प्रसिद्ध शृंखला को 1.10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। उपभोक्ता आयोग का यह फैसला रूम्स चेन के सीईओ व मैनेजर तथा कोल्लम के एक होटल के मालिक और मैनेजर के खिलाफ दायर शिकायत के आधार पर आया है। शिकायत के अनुसार, अरुण ने 6 से 7 अक्तूबर, 2019 की रात के लिए अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता सहित दस सदस्यीय ग्रुप के लिए कोल्लम के चादयामंगलम स्थित होटल में कमरे बुक करने के लिए 2,933 रुपये का भुगतान किया था। निर्धारित समय रात करीब 10 बजे होटल पहुंचने पर, होटल मालिक ने कमरे देने से इनकार कर दिया और प्रति कमरा 2,500 रुपये का अतिरिक्त शुल्क मांगा, जो मूल बुकिंग समझौते के विपरीत था। उन्हें रात भर यात्रा करके दूसरे होटल की तलाश करनी पड़ी। अनुचित व्यापार प्रथाओं, मानसिक पीड़ा और शारीरिक कष्ट के लिए मुआवजे की मांग करते हुए, शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता आयोग में शिकायत की थी।
वायदे पर कमरा नहीं देना पड़ा महंगा
वायदे के अनुसार होटल में कमरा नहीं देने और खराब रूम सर्विस के एक ऐसे ही मामले में जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग-2 ने एक ट्रेवल कंपनी और मनाली के एक होटल को निर्देश दिया है कि वे शिकायतकर्ता को 10,302 रुपये लौटाएं। इस राशि पर नौ प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी अदा करना होगा। साथ ही दस हजार रुपये मुआवजा और सात हजार रुपये मुकदमा खर्च के भी अदा करने होंगे। चंडीगढ़ वासी एक शिकायतकर्ता ने शिमला की उक्त ट्रेवल कंपनी के मालिक और होटल के खिलाफ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग चंडीगढ़ में शिकायत दर्ज कराई थी।
-लेखक उपभोक्ता मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।
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