मातृत्व की प्रक्रिया में आए बदलावों को देखें सम्मान से
एक बच्चे को दुनिया में लाने का सफर सिर्फ एक नया जीवन ही नहीं गढ़ता, बल्कि उस मां को भी एक नए अहसास से भर देता है। लेकिन, समाज की नजरें अक्सर उसके इस नए अहसास और स्वास्थ्य को दरकिनार...
एक बच्चे को दुनिया में लाने का सफर सिर्फ एक नया जीवन ही नहीं गढ़ता, बल्कि उस मां को भी एक नए अहसास से भर देता है। लेकिन, समाज की नजरें अक्सर उसके इस नए अहसास और स्वास्थ्य को दरकिनार कर केवल उसके बदले हुए शरीर पर जाकर टिक जाती हैं। मातृत्व की इस संवेदनशील यात्रा और उस पर टिके सामाजिक नजरिये को बदलना होगा।
बच्चे के जन्म के बाद एक दिन जब मां आईने के सामने खड़ी होती है, तो उसे अपना चेहरा कुछ जाना-पहचाना और कुछ बदला हुआ लगता है। आंखों के नीचे हल्की सूजन, बिखरे बाल, उनींदी आंखें और शरीर पर गर्भावस्था के कुछ निशान। उसका पेट अब पहले जैसा नहीं रहा और शरीर को अभी उस नौ महीने के कठिन सफर से लौटना बाकी है, जिसमें उसने एक नन्हीं जिंदगी को संभाला था। गोद में बच्चा है, कमरे में उसकी किलकारियां या रोना है और आईने में खड़ी मां शायद कई दिनों बाद अपने लिए कुछ पल निकाल पाई है। उसे इस समय किसी सलाह से ज्यादा एक आत्मीय सवाल की जरूरत है कि ‘तुम कैसी हो?’ लेकिन अमूमन उसके हिस्से में जो सवाल आता है, वह होता है ‘तुम्हारा वजन कितना बढ़ गया?’
वजन को लेकर टोकने की आदत
हाल ही में अभिनेत्री कैटरीना कैफ मां बनने के बाद जब सार्वजनिक रूप से दिखाई दीं, तो उनकी मौजूदगी या सेहत से ज्यादा चर्चा उनके शरीर की हुई। सोशल मीडिया पर उनके पुराने और नए रूप की तुलना की गई और वजन को लेकर टिप्पणियां हुईं। यह सिर्फ किसी एक अभिनेत्री का किस्सा नहीं। फर्क केवल इतना है कि एक मशहूर महिला का शरीर सार्वजनिक समीक्षा का विषय बन जाता है, जबकि आम महिलाओं के साथ यही बातचीत घर में, रिश्तेदारी या पड़ोस में दोहराई जाती है। पहले कितनी पतली थी, अब तो काफी वजन बढ़ गया है, कब तक ऐसे ही रहोगी? ये बेहद सामान्य वाक्य लगते हैं, लेकिन जिस महिला से ये कहे जाते हैं, उसके भीतर यह अपने ही शरीर को लेकर संकोच और हीनभावना भर देते हैं।
जिंदगी की धुरी ही बदल जाना
मां बनने के बाद महिला की जिंदगी की धुरी ही बदल जाती है। उसकी दिनचर्या, प्राथमिकताएं -सब कुछ बदलता है। बच्चे के सोने का समय उसका आराम बन जाता है। अपनी भूख से पहले उसे बच्चे का पोषण याद आता है। रात में आंख खुलते ही उसकी नजरें बच्चे पर जाती हैं। इन मानसिक और व्यावहारिक बदलावों के बीच शरीर भी बदल रहा होता है। लेकिन हमारी नजरें अक्सर इन बदलावों के पीछे छिपी मातृत्व की कहानी तक नहीं पहुंच पातीं। हमें सिर्फ थका चेहरा या बढ़ा पेट दिखाई देता है। यहीं से यह सवाल जन्म लेता है कि क्या मां बनने के बाद बदला हुआ शरीर उस स्त्री को भी बदल देता है? जवाब है, बिलकुल नहीं। वह वही महिला है, बल्कि उसके जीवन में एक नया और अनमोल अनुभव जुड़ा है। उसके शरीर पर आए निशान उसकी मातृत्व की अनकही स्मृतियां हैं।
हर उम्र में सुंदरता की शर्त
महिला के शरीर पर टिप्पणी करने की आदत हमारे समाज में बहुत है। बचपन में रंग, किशोरावस्था में वजन, विवाह के समय कद और त्वचा का रूप, और फिर शादी व गर्भावस्था के बाद शरीर का आकार। महिला के जीवन का शायद ही कोई ऐसा पड़ाव हो, जहां उसके शरीर को दूसरों की नजरों से मुक्त रहने दिया जाता हो। समाज उसकी हर भूमिका के साथ सुंदरता की एक अदृश्य शर्त भी जोड़ देता है सुंदर बेटी, सुंदर दुल्हन, सुंदर पत्नी और फिर सुंदर मां। सवाल है कि एक थकी हुई, नवजात को संभालती मां के लिए हमारी सुंदरता की परिभाषा कहां गुम हो जाती है? गर्भावस्था के बाद शरीर में बदलाव आना स्वाभाविक प्रक्रिया है। त्वचा पर खिंचाव के निशान, वजन बढ़ना किसी महिला के शरीर की गलती नहीं। फिर भी, प्रसव के तुरंत बाद उम्मीद यह कि वह तुरंत पुराने आकार में लौट आए। सोशल मीडिया ने स्थिति को और जटिल बना दिया। ब्यूटी फिल्टर और एडिटिंग से तैयार काल्पनिक फोटो जब पैमाना बनती हैं, तो महिलाओं के लिए खुद को स्वीकारना मुश्किल हो जाता है।
वजन का पैमाना और सेहत की बात
गर्भस्थ महिला के वजन पर जितनी जल्दी चर्चा होती है, उसके स्वास्थ्य पर वो गंभीरता नहीं दिखाई जाती। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 15 से 49 वर्ष की 57 फीसदी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं, जबकि इसी आयु वर्ग की 24 फीसदी महिलाएं मोटापे की श्रेणी में आती हैं। यानी केवल देखकर ही किसी महिला के स्वास्थ्य का आकलन नहीं किया जा सकता। बातचीत का केंद्र यह नहीं होना चाहिए कि वजन कितना है, बल्कि यह हो कि क्या नई मां को पर्याप्त आराम, पौष्टिक आहार और मानसिक संबल मिल रहा है? बच्चे के जन्म लेते ही पूरा परिवार नवजात की देखभाल में जुट जाता है लेकिन मां अक्सर अनदेखी रह जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रसवोत्तर देखभाल में मां की शारीरिक और मानसिक सेहत को अहम मानता है। शोध दर्शाते हैं कि लगभग 19 फीसदी महिलाएं प्रसवोत्तर अवसाद का सामना करती हैं।
रात-रात भर बच्चे को संभालने वाली मां को अपनों के साथ और सहानुभूति की जरूरत होती है।
बदलाव की शुरुआत यहीं से होनी चाहिए। महिलाओं को सिर्फ अपने शरीर से प्यार करने की सलाह देना काफी नहीं है, बल्कि समाज को यह सीखना होगा कि हर शरीर पर टिप्पणी करना बंद करे। विवाह या मातृत्व को किसी शारीरिक कसौटी पर न कसा जाए। महिला का शरीर सिर्फ किसी की नजरों को सुंदर दिखने के लिए नहीं बना है। इसी शरीर ने पहली बार एक नई धड़कन को महसूस किया था, प्रसव की असीम पीड़ा सही थी और एक नई जिंदगी को दुनिया में लाया था। अब समय आ गया है कि जब हम किसी नई मां से मिलें, तो उसे पूरे सम्मान से पूछें –‘अब कैसी हो तुम!’

