Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

वैज्ञानिक सोच की शोध-संस्कृति पूरा करेगी विकसित भारत का सपना

विकसित भारत का सपना साकार करने के लिए देश में वैज्ञानिक रिसर्च की संस्कृति का विकास जरूरी है। उपभोक्ता सुविधाओं से लेकर उन्नत इनफ्रास्ट्रक्चर, डीपटेक की राह गुणवत्तापूर्ण शोध से प्रशस्त होती है। आरएंडडी का बजट बढ़ाना अहम है। यह...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

विकसित भारत का सपना साकार करने के लिए देश में वैज्ञानिक रिसर्च की संस्कृति का विकास जरूरी है। उपभोक्ता सुविधाओं से लेकर उन्नत इनफ्रास्ट्रक्चर, डीपटेक की राह गुणवत्तापूर्ण शोध से प्रशस्त होती है। आरएंडडी का बजट बढ़ाना अहम है। यह लक्ष्य जीडीपी का 3 फीसदी हो। वहीं नयी पीढ़ी में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा जरूरी है। स्कूल स्तर पर प्रयोगशालाएं हों। यह भी कि शोध का मकसद महज डिग्री से आगे बढ़कर जिंदगी में बदलाव लाना हो।

साल 2047 तक भारत विकसित देश का लक्ष्य लेकर चल रहा है और इस साल यानी 2026 के लिए राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की थीम है- विकसित भारत के लिए विज्ञान और नवाचार। इसका मतलब यह है कि अगर भारत को विकसित देश बनना है, तो उसमें विज्ञान की बड़ी अहम भूमिका होगी और यह भूमिका तभी निर्णायक साबित होगी, जब हम साल 2047 के पहले ही जरूरी विकास के वैज्ञानिक शोधों को अपनी कार्यसंस्कृति बना लें। बिना वैज्ञानिक रिसर्च कोई देश इस दौर में महान या विकसित राष्ट्र बनने के सपने नहीं देख सकता। क्योंकि आर्थिक समृद्धि, विकसित ढांचा, डिजिटल क्रांति और आधुनिक जीवन की आधारभूत जरूरतें तभी सहजता से पूरी होंगी, जब देश में वैज्ञानिक रिसर्च की बाकायदा जीवंत संस्कृति होगी। इसलिए यह मूल बात है कि अब विकसित देश होने के लिए अपनी विभिन्न योजनाओं और उन पर निवेश के लिए हम वैज्ञानिक अनुसंधान की संस्कृति विकसित करें, यह बहुत जरूरी है।

Advertisement

वैज्ञानिक रिसर्च के नक्शे में हम

Advertisement

दुनिया के विकसित देश जहां अनुसंधान और विकास यानी आरएंडडी में अपने कुल जीडीपी का 2 से 4 फीसदी खर्च कर रहे हैं, वहीं हमारा अभी यह खर्च अभी 1 फीसदी भी नहीं हैं। हम अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 से 0.8 फीसदी ही वैज्ञानिक अनुसंधानों में खर्च कर रहे हैं। इसलिए हमें तुरंत इसे लेकर अपनी रणनीति बदलनी होगी और इस खर्च का 2 से 3 फीसदी तक 18-19 सालों में बढ़ाना होगा। लेकिन बात सिर्फ पैसे की ही नहीं है। अगर हम विकसित देश बनना चाहते हैं, तो जरूरी है कि हमारे देश का मानसिक मिजाज भी वैज्ञानिक सोच वाला हो। इसके लिए हमें न सिर्फ अपने बच्चों को प्रगतिशील सोच का बनाना होगा बल्कि उन्हें हर तरह के सवाल पूछने के लिए भी प्रोत्साहित करना होगा। वास्तव में स्कूलों में प्रयोगों को रटने से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि हमारे बच्चे प्रयोगशालाओं में प्रयोग करें और अपनी गलतियों से सीखें। लेकिन यह सिर्फ सोचनेभर से नहीं होगा। इसके लिए हमें देश के स्कूलों में प्रयोगशालाओं का एक जाल बिछाना होगा। जब तक छोटे और मझोले स्कूलों में प्रयोगशालाएं नहीं होंगी, तब तक बच्चे विज्ञान की तरफ आकर्षित नहीं होंगे। यहां इस बात को भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि रिसर्च का मतलब केवल पीएचडी कर लेना नहीं है बल्कि रिसर्च का मतलब रोजमर्रा की जिंदगी को आरामदेह बनाने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है, इस पर ज्यादा से ज्यादा जोर देना है।

इसरो जैसे कई संगठनों की जरूरत

भारत में आज विज्ञान और वैज्ञानिक प्रगति का पर्याय है इसरो। इसरो यानी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन। भारत के कुछ गिने-चुने ऐसे संस्थान हैं जिन्होंने अपनी प्रगति और कामयाबी से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इसरो इसमें सबसे आगे है। लेकिन भारत को विकसित राष्ट्र बनने के लिए एक अकेली इसरो या आईआईटी से काम नहीं चलने वाला। भारत को अगर विकसित राष्ट्र बनना है तो हमें शहर-शहर, स्कूल-स्कूल, यहां तक कि देहात के स्कूलों में भी बुनियादी स्तर की विज्ञान प्रयोगशालाएं जरूरी होंगी। इसलिए अटल टिंकरिंग लैब हर जिले में स्थापित करने की योजना बनायी गयी है। यही नहीं देश के व्यापक उद्योग जगत को अपने काम और लक्ष्य के अनुरूप वैज्ञानिक अध्ययन संस्थानों से गठजोड़ करके अनुसंधान का सिलसिला शुरू करना होगा। अगर शिक्षा और उद्योग क्षेत्र में यह साझेदारी विकसित हो जाती है तो भारत को जल्द से जल्द विकसित राष्ट्र बनने से कोई नहीं रोक सकता। अमेरिका आज अगर वैश्विक तकनीक का हब है तो उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां उद्योग जगत और शैक्षिक संस्थानों में गठजोड़ है। उद्योग जगत से शैक्षिक संस्थानों को भरपूर फंड मुहैया कराते हैं और ये शैक्षिक संस्थान नई से नई तकनीक खोजने में अपना फोकस रखते हैं। इस तरह अमेरिका आधुनिक औद्योगिक क्रांति का अगुवा बना हुआ है। भारत में पिछले कुछ सालों में बड़े पैमाने पर स्टार्टअप शुरू हुए हैं। हालांकि हमारे यहां स्टार्टअप की सफलता की दर अमेरिका या चीन के मुकाबले काफी कम है, लेकिन कम सफलता या ज्यादा असफलता से डरना नहीं चाहिए। वास्तव में प्रयोग के क्षेत्र में असफलताएं भी सफलताओं के लिए रास्ता बनाती हैं।

जरूरी है ‘साइंटिफिक टेम्परामेंट’

सिर्फ तकनीक का विकास कर लेना या नये से नया आविष्कार कर लेना ही वैज्ञानिक प्रगति और विकसित राष्ट्र का आधार नहीं होता। उसके लिए साइंटिफिक टेम्परामेंट यानी वैज्ञानिक सोच वाले समाज की भी दरकार होती है और जब समाज वैज्ञानिक सोच वाला बन जाता है, तो फिर वैज्ञानिक प्रगति की रफ्तार दिन दुनी रात चौगुनी हो जाती है। इसलिए भारत को केवल विकसित राष्ट्र भर नहीं बनना बल्कि एक बौद्धिक राष्ट्र के रूप में भी अपनी पहचान बनानी है। क्योंकि जब तक कोई समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण या साइंटिफिक टेम्परामेंट वाला नहीं होता, तब तक उस समाज द्वारा तर्क, प्रमाण और परीक्षण के लिए अनुकूल वातावरण नहीं बनता। अगर समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला न हो तो सम्पन्नता का भी कोई मतलब नहीं होता। हम आये दिन पढ़ते और सुनते हैं कि कई करोड़पति, अरब पति लोग अंधविश्वास के चलते क्या-क्या नहीं करते रहते। देश में अफवाहों और अंधविश्वासों का अंत होता ही तभी है, जब समाज वैज्ञानिक सोच और दृष्टिकोण वाला बनता है और इसके लिए समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मजबूत होना जरूरी है। समाज अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला होता है, तो सार्वजनिक स्वास्थ्य, जलवायु और पर्यावरण तथा डिजिटल असुरक्षा जैसी परेशानियां अपने आप थमने लगती हैं।

बनना होगा डीप-टेक का हब

भारत में उपभोक्ता संस्कृति का भरपूर वातावरण है। लेकिन अगर हमें विकसित राष्ट्र बनना है तो इससे आगे यानी डीप-टेक के लिए अनुकूल तकनीकी संस्कृति को विकसित करना होगा ताकि सेमीकंडक्टर, बायोटेक, क्वांटम कंप्यूटिंग, और हरित ऊर्जा के मामले में भी हम न सिर्फ नये-नये अनुसंधान कर सकें बल्कि पहले से मौजूद तकनीक को अपने अनुभव और दुनिया की जरूरत के हिसाब से उन्नत बना सकें। हालांकि यह इकोसिस्टम रातोंरात नहीं बनता। लेकिन भारत में इस तरह के इकोसिस्टम का आधार मौजूद है और हम चाहें तो तेजी से इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। हमारे विश्वविद्यालय इसके लिए एक निर्णायक भूमिका निभाने को तैयार हैं। इनके जरिये हम वैश्विक स्तर पर अपनी खोजी गई तकनीकों और महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए पैटेंट हासिल कर सकते हैं तथा देश में विज्ञान के छात्रों के लिए गहन इंटर्नशिप का जरूरी इकोसिस्टम विकसित कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें यह समझना होगा कि कोई देश अकेले सरकार या अकेले उद्योग जगत अथवा सिर्फ समाज के बदौलत विकसित राष्ट्र में नहीं बदलता। इसके लिए जरूरी है कि सभी क्षेत्र एक साथ मिलकर आगे आएं और विकसित राष्ट्र बनने के साझे लक्ष्य में आगे बढ़ें।

ऐसे बनेगा भारत विकसित राष्ट्र

* सरकार को विज्ञान अनुसंधान क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद के 3 फीसदी तक निवेश का वातावरण तैयार करना होगा।

* इसके लिए जरूरी है कि देश के हर जिले में एक नवाचार केंद्र स्थापित हो तथा शहरों, छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के स्कूलों तक बुनियादी प्रयोगशालाओं का जाल बुना जाए।

* स्कूलों में अनिवार्य प्रयोग आधारित शिक्षा शुरू की जाए तथा विफल स्टार्टअप के लिए भी पुनः अवसर प्रदान करने की योजना बनायी जाए।

* विश्वविद्यालय और उद्योग जगत मिलकर एक-दूसरे की जरूरत पूरा करें और दुनिया के लिए आदर्श उपस्थित करें।

* भारत को अगर वैज्ञानिक प्रयोगों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला देश बनना है तो भारतीय भाषाओं को भी महत्व देना होगा। जब तक भारतीय भाषाओं में जरूरी अनुसंधान का इकोसिस्टम नहीं तैयार होगा, तब तक देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का वातावरण नहीं बनेगा। इसलिए वैज्ञानिक सोच और ईमानदारी से संवैधानिक कर्तव्यों को पूरा करने का माहौल भी बनाना होगा।      -इ.रि.सें.

Advertisement
×