हमारे खानपान और मानसिक स्वास्थ्य का गहरा संबंध है। वहीं पर्याप्त नींद भी मेंटल हेल्थ से जुड़ी है। शोधों में भी सामने आया है कि संतुलित एवं पोषणकारी खुराक न केवल शरीर बल्कि दिमाग की कार्यक्षमता, मूड और फोकस को भी बेहतर बनाने में मददगार है। वहीं ‘ब्रेन फॉग’ जैसी स्थिति तनाव, नींद की कमी और अस्वास्थ्यकर खानपान जैसे कारकों से जुड़ी हो सकती है। इसलिए हेल्दी फूड और संतुलित जीवनशैली मानसिक तंदुरुस्ती के लिए आवश्यक हैं।
हमारा भोजन केवल हमारा पेट नहीं भरता, वह हमारे मस्तिष्क से संवाद भी करता है। इसलिए जब मन उदास हो, तनाव बढ़े या दिमाग धुंध में डूबा लगे, तो सवाल केवल यह नहीं कि हम क्या सोच रहे हैं- यह भी है कि हम क्या खा रहे हैं, कैसे सो रहे हैं और अपने शरीर के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं?, सुबह उठे, लेकिन शरीर के साथ दिमाग जैसे पूरी तरह से जगा ही नहीं। सामने रखी चीज का नाम याद नहीं आ रहा। काम करने बैठते हैं पर ध्यान भटक जाता है। बातचीत के बीच अचानक शब्द खो जाते हैं। फिर दोपहर होते-होते थकान, चिड़चिड़ापन और तनाव बढ़ता है तथा मन कुछ मीठा, कुछ कुरकुरा व स्वादिष्ट खाने को करने लगता है। यह आज के दौर में ज्यादातर लोगों की समस्या है। हममें से बहुत से लोग इसे कभी थकान, कभी तनाव, कभी उम्र और कभी खराब याद्दाश्त का नाम देकर आगे बढ़ जाते हैं। क्या हमारे मन, मस्तिष्क और भोजन के बीच भी कोई ऐसा रिश्ता है, जिसे हम लंबे समय से नजरअंदाज करते आये हैं? साइकोलॉजी नाउ पत्रिका के हालिया अंक में दो लेख प्रकाशित हुए हैं- हैपी फूड और व्हाट इज ब्रेन फॉग? पहला लेख बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल ‘मन’ का मामला नहीं है; इसमें भोजन और शरीर की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। दूसरा लेख उस अनुभव की पड़ताल करता है, जिसमें व्यक्ति को लगता है कि उसका दिमाग जैसे धुंध से भर गया है। इन दोनों को मिलाकर देखें तो सवाल उभरता है क्या हमारी रसोई और हमारे दिमाग के बीच कोई सीधा रिश्ता है ..और जवाब है- ‘हां’।
खुश रहने का रास्ता
भोजन को अब केवल पेट भरने की चीज मानकर नहीं देखा जा सकता है। सोचने, याद रखने, निर्णय लेने और भावनाओं को समझने की जटिल प्रक्रिया में शरीर और मस्तिष्क के बीच निरंतर संवाद चलता रहता है। ऐसे में भोजन में मौजूद पोषक तत्व शरीर की उन प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, जिनका संबंध हमारे समग्र स्वास्थ्य और मानसिक सलामती से है।
क्या है ब्रेन फॉग?
जब व्यक्ति को ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो, चीजें याद करने में कठिनाई महसूस हो, स्पष्टता न रहे या लगातार थकान महसूस हो, तो वह कह सकता हैं मेरा दिमाग आजकल ठीक से काम नहीं कर रहा। लेकिन साइकोलॉजी नाउ में छपे लेख, ‘व्हाट इज ब्रेन फॉग’ में दिमागी धुंध का सबसे परेशान करने वाला पहलू यह है कि ऐसा व्यक्ति जो इससे जूझ रहा हो, बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता है। वह अपना काम कर रहा होता है, घर संभाल रहा होता है। लेकिन भीतर उसे लगता है कि उसकी मानसिक गति कुंद पड़ गई है। मोबाइल खोलता है, लेकिन भूल जाता है कि आखिर उसने मोबाइल खोला क्यों है? किसी परिचित का नाम याद करने में देर लगती है।
तनाव की थाली और थका हुआ दिमाग
आधुनिक जीवन में तनाव का एक विचित्र चक्र बन जाता है। तनाव बढ़ता है, तो हम जल्दी में खाना खाते हैं। थकान बढ़ती तो हम प्रोसेस्ड फूड खाने में संतुष्टि प्राप्त करते हैं। मगर नींद भी पूरी नहीं होती, तो फिर दिमाग भारी लगता है। अध्ययन में सामने आया है कि मन, शरीर, नींद, तनाव और भोजन को अलग-अलग खांचों में रखकर नहीं समझा जा सकता।
हैपी फूड्स में ये पदार्थ हैं शामिल
हैपी फूड कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों का समूह है, जिन्हें पोषण की दृष्टि से उपयोगी माना गया है। इनमें एवोकाडो, बादाम, बेरीज, डार्क चॉकलेट, मशरूम, ओट्स और सालमन आदि शामिल हैं। नया अध्ययन किसी जादुई भोजन की तलाश नहीं करता। इसके मुताबिक, हैपी फूड वह है जिसे खाने से आपके शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिलें। मसलन, नट्स और एवोकाडो।
सावधानी भी जरूरी
हैपी फूड के नाम पर प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक शुगर वाले विकल्पों के प्रति सावधान रहना चाहिए। साइकोलॉजी नाउ में छपी सुपर फूड की अवधारणा के मुताबिक, हैपी फूड के संदर्भ में असली चुनौती है, तत्काल आनंद की अनुभूति और दीर्घकालीन सलामती के बीच जरूरी संतुलन। ‘ब्रेन फॉग’ का अनुभव कभी न कभी सभी को होता है। लेकिन अगर दिमागी धुंध लगातार बनी रहती है, तो यह उसके रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करती है तो जरा इन चीजों पर ध्यान दें- आपकी नींद कैसी है? लगातार चीजें अच्छी न लग रही हों, अनमने रहते हैं, पर्याप्त आराम नहीं कर पाते, दिनचर्या अनियमित हो गई है। अगर ऐसा है तो जितना जल्दी हो सके अपने खानपान को स्वस्थ और पोषण युक्त बनाइये। -इ.रि.सें.

