जब दुनिया ने लाइलाज बीमारी एड्स के बारे में जाना तो संक्रमितों में युवाओं की तादाद ज्यादा थी। समाज में पीड़ितों को कलंक माना जाता था। लेकिन अब एड्स पीड़ित समूहों में युवाओं का हिस्सा घटा है व वे अपयश से भी बाहर निकले। इसमें जागरूकता कार्यक्रमों का बड़ा योगदान है।
बीते 1980 के दशक में जब पहली बार दुनिया ने इस रहस्यमयी लाइलाज बीमारी एड्स के बारे में जाना था, तब साथ में यह भी जाना था कि यह कुछ युवाओं की संबंधों के मामले में गैरईमानदारी का नतीजा है। संक्रमित युवाओं को कलंक के रूप में देखा जा रहा था। वास्तव तब 15 से 24 वर्ष की आयु समूह के 95 फीसदी से ज्यादा संक्रमित युवा ही थे। जबकि 2005 में एड्स को लेकर जारी एक तथ्य पत्र अनुसार, एचआईवी संक्रमणों में ऐसे युवाओं की हिस्सेदारी 40 फीसदी तक है। यानी 25 सालों में युवा काफी हद तक इस अपयश से बाहर निकले। पहले माना जाता था कि अगर कोई एचआईवी संक्रमित है, तो वह युवा ही होगा और उसने यौन उच्छृंखलता की होगी।
अब सिर्फ युवाओं का रोग नहीं
लेकिन अब एड्स सिर्फ युवाओं की बीमारी नहीं रह गई। बड़े पैमाने पर नशेड़ी अधेड़ और नवजात भी इससे पीड़ित हैं। अब एड्स महज युवाओं में होने वाला संक्रमण नहीं। लेकिन अभी भी दुनिया में 30 से 40 लाख एचआईवी सक्रिय युवा ही हैं। अब एड्स पीड़ितों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। हालांकि अब हर आयु समूह के संक्रमित इसका हिस्सा हैं। साल 2024 के अंत में करीब 4 करोड़ 80 लाख एड्स संक्रमित थे, जिनमें 3 करोड़ 94 लाख वयस्क थे मगर 15 से 24 साल के युवाओं की संख्या 40 फीसदी से कम थी। एड्स संक्रमितों में युवाओं का प्रतिशत काफी घटा है।
ऐसे टूटा दुष्चक्र
सवाल है आखिर इस कलंक के दुष्चक्र से युवा बाहर कैसे आए? दरअसल पिछले तीन दशकों में युवाओं को सबसे ज्यादा सुरक्षित यौन व्यवहार के लिए ट्रेंड किया गया है। अगर संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन के एड्स से बचाव के विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों को देखा जाए तो लगभग 60 से 70 फीसदी बजट जो कुल 3 दशकों में 4 ट्रिलियन डॉलर तक रहा है। इन संस्थाओं ने विशेषकर अफ्रीका में युवाओं को इससे बचाव हेतु शिक्षित किया है। प्यू रिसर्च के एक आंकड़े में सामने आया कि 90 फीसदी से ज्यादा युवा सुरक्षित यौन व्यवहार का महत्व समझते हैं और कंडोम के इस्तेमाल में उनका प्रतिशत बहुत ज्यादा है।
संक्रमण को लेकर आयी जागरूकता
पहली बार युवा इस मामले में सबसे आगे हैं कि सुरक्षित संबंध डर से मुक्ति की निशानी है। आज एसटीआई टेस्टिंग को लेकर भी उनमें जबर्दस्त जागरुकता है। यह भी सीखा कि एचआईवी महज एक संक्रमण है। जरूरी नहीं कि यह बीमारी यौन संबंधों के चलते ही हो। क्योंकि सबसे ज्यादा एड्स संक्रमण इस्तेमाल की जाने वाली सिरिंजों, रक्त संक्रमण और संक्रमित माता-पिता के बच्चों में होता है। पिछले एक दशक में एड्स पर आधे से ज्यादा नियंत्रण हासिल किया जा सका। भारत में भी एड्स मरीजों में युवाओं की तादाद घटी।
आखिर युवाओं ने क्या सीखा?
80 के दशक में जब एड्स नामक भयानक बीमारी का भंडाफोड़ हुआ, तब से लगातार युवाओं को इसके प्रति सजग बनाने का वैश्विक स्तर पर लक्ष्य रखा गया था, जिससे युवाओं ने कई महत्वपूर्ण बातें सीखी। जैसे- ड्रग यूजर्स के बीच साझी सिरिंज का इस्तेमाल कितना खतरनाक हो सकता है। अब बमुश्किल 2 से 4 फीसदी युवा नशीली दवाओं का उपभोग करते हुए साझी सिरिंज का इस्तेमाल करते हैं। यह भी कि असुरक्षित यौन संबंध एड्स की वजह बनते हैं। अब युवाओं ने सीख लिया है कि उन्हें इससे छुटकारा पाने के लिए परिवार से भावनात्मक समर्थन की जरूरत है। वहीं डिजिटल जागरुकता और ऑनलाइन मिस-इनफॉरमेशन, इस कंट्राडिक्शन को भी युवाओं ने गहरे से आत्मसात किया है। -इ.रि.सें.
Advertisement
Advertisement
×

