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कैंसर की घातकता से राहत की उम्मीद जगाती नयी तकनीकें

विश्व कैंसर दिवस

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जानलेवा बीमारी कैंसर का फैलाव बहुत तेजी से हो रहा है। दुनिया में हर साल करीब एक करोड़ लोग कैंसर के कारण जान गंवाते हैं । भारत में भी लाखों रोगी हैं। युवा आबादी भी इससे अछूती नहीं। हालांकि यह बात उम्मीद जगाती है कि कैंसर के उपचार और प्रबंधन में चिकित्सा विज्ञान लगातार प्रगति कर रहा है। पारंपरिक कीमो और रेडिएशन थैरेपी से आगे बढ़कर अब इम्यूनोथैरेपी, जीन आधारित उपचार, रोबोटिक सर्जरी, सेल थैरेपी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे समाधान सामने आये हैं।

कैंसर 21वीं सदी की सबसे बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बन चुका है। यह केवल एक बीमारी नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संकट का ऐसा रूप है, जिसने विकसित और विकासशील, दोनों ही तरह के देशों को समान रूप से प्रभावित किया है। कैंसर के खिलाफ जागरूकता, रोकथाम, समय पर निदान और समग्र उपचार के लिए ही हर वर्ष 4 फरवरी को ‘विश्व कैंसर दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य मानवता को यह स्मरण कराना है कि विज्ञान, नीति, समाज और संवेदनशीलता, इन सभी के संयुक्त प्रयास से ही कैंसर के खिलाफ निर्णायक लड़ाई संभव है। कैंसर आज दुनियाभर में असमय मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में हर वर्ष लगभग एक करोड़ लोग कैंसर के कारण जान गंवाते हैं और करोड़ों लोग इससे पीड़ित हैं। मौजूदा प्रवृत्तियां जारी रही तो 2050 तक कैंसर के नए मामलों की संख्या 3.5 करोड़ से अधिक हो सकती है, जो 2022 की तुलना में लगभग 77 प्रतिशत अधिक होगी।

देश में कैंसर पीड़ितों की बड़ी तादाद

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भारत की स्थिति भी चिंताजनक है, जहां कैंसर असमय मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण बन चुका है। वर्ष 2024 में देश में लगभग 15.33 लाख नए कैंसर रोगी सामने आए। पिछले दस वर्षों में कैंसर रोगियों की संख्या में करीब 36 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है और औसतन प्रति एक लाख आबादी पर 100 कैंसर पीड़ित सामने आ रहे हैं। वहीं देश में लगभग 70 प्रतिशत कैंसर मरीज ग्रामीण इलाकों से आते हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं की सीमित उपलब्धता, देर से निदान और जागरूकता की कमी समस्या को और जटिल बना देती है।

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युवा आबादी भी चपेट में

हर वर्ष लगभग 1.43 लाख नए ओरल कैंसर के मामले सामने आते हैं, जो तंबाकू और गुटखा सेवन जैसी आदतों से सीधे जुड़े हैं। वहीं फेफड़ों के कैंसर के करीब 80 हजार नए मरीज प्रतिवर्ष सामने आते हैं। ज्यादा चिंताजनक यह कि लगभग 48 प्रतिशत ब्रेस्ट कैंसर पीड़ित महिलाएं 50 वर्ष से कम आयु की होती हैं। यह संकेत है कि कैंसर अब केवल वृद्धावस्था की बीमारी नहीं बल्कि युवाओं और कामकाजी आयु वर्ग को भी तेजी से प्रभावित कर रहा है।

उपचार और प्रबंधन की नयी तकनीकें

इन भयावह तथ्यों के बीच आशा की किरण यह है कि कैंसर के उपचार और प्रबंधन में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान अभूतपूर्व प्रगति कर रहा है। पारंपरिक कीमो और रेडिएशन थैरेपी जहां कैंसर उपचार की रीढ़ रही हैं, वहीं इनके गंभीर दुष्प्रभावों ने वैकल्पिक और अधिक सटीक तकनीकों की आवश्यकता को जन्म दिया। आज इम्यूनोथैरेपी, जीन आधारित उपचार, रोबोटिक सर्जरी, सेल थैरेपी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चिकित्सा समाधान कैंसर के खिलाफ लड़ाई को एक नई दिशा दे रहे हैं। इम्यूनोथैरेपी को आधुनिक कैंसर चिकित्सा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। इस पद्धति में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को ही कैंसर के खिलाफ हथियार बनाया जाता है। विशेष दवाएं कैंसर कोशिकाओं को ‘हाइलाइट’ कर देती हैं, जिससे इम्यून सिस्टम उन्हें पहचानकर नष्ट कर सके। यह अपेक्षाकृत कम दुष्प्रभाव उत्पन्न करता है। इसी क्रम में सीएआर टी-सेल जैसी तकनीकें रक्त कैंसर के उपचार में क्रांतिकारी साबित हो रही हैं।

जीन थैरेपी और पर्सनलाइज्ड मेडिसिन

जीन विज्ञान के क्षेत्र में बेस एडिटिंग जैसी तकनीकें कैंसर उपचार की परिभाषा बदल रही हैं। इस प्रक्रिया में स्वस्थ डोनर टी-सेल्स से कुछ विशिष्ट जीन मार्कर हटाकर उन्हें ऐसे संशोधित किया जाता है कि वे मरीज की प्रतिरक्षा प्रणाली या कीमोथैरेपी से प्रभावित न हों। आने वाले समय में जीन थैरेपी और पर्सनलाइज्ड मेडिसिन कैंसर के इलाज को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। वैक्सीन आधारित उपचार भी कैंसर के खिलाफ उम्मीद जगाने वाला क्षेत्र है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से ट्यूमर की जेनेटिक प्रोफाइलिंग कर कम समय में कस्टम वैक्सीन विकसित करने की संभावनाएं सामने आई हैं।

रोबोटिक तकनीक

सर्जरी के क्षेत्र में रोबोटिक तकनीक ने कैंसर उपचार को नई ऊंचाई दी है। रोबोटिक सर्जरी के माध्यम से ऐसे जटिल अंगों तक भी सटीक पहुंच संभव हुई है, जहां पारंपरिक सर्जरी जोखिमपूर्ण मानी जाती थी। इससे अत्यंत सूक्ष्म और सटीक ऑपरेशन संभव है। इसके परिणामस्वरूप रक्तस्राव कम होता है, अंगों की सुरक्षा बढ़ती है और मरीज जल्दी स्वस्थ होता है।

उम्मीद जगाते नये शोध

कैंसर अनुसंधान में ‘मॉलीक्यूलर जैकहैमर’ जैसी अवधारणाएं विज्ञान की सीमाओं को आगे बढ़ा रही हैं। इसी प्रकार, ‘डोस्टारलिमैब’ जैसी दवाओं ने चिकित्सा जगत को चौंका दिया है। द न्यू इंग्लैंड जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, इस दवा के सीमित परीक्षणों में बिना कीमोथैरेपी और रेडिएशन के कैंसर के पूर्णतः समाप्त होने के उदाहरण सामने आए हैं। हालांकि इसकी लागत अभी बहुत अधिक है। स्टेम सेल थैरेपी भी कैंसर उपचार की संभावनाओं को विस्तृत कर रही है। वहीं चीन सहित कई देशों में रेडियोथैरेपी से होने वाले दुष्प्रभावों को कम करने के लिए गैर-आक्रमणशील तकनीकों पर काम हो रहा है । भारत में भी कैंसर अनुसंधान और उपचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हो रही है। आईआईटी मद्रास, कैंसर इंस्टीट्यूट चेन्नई और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस जैसे संस्थानों के वैज्ञानिकों ने जीभ के कैंसर से जुड़े ‘एमआईआर-155’ माइक्रो आरएनए की पहचान कर नई चिकित्सीय संभावनाओं के द्वार खोले हैं।

उन्मूलन के राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रयास

सरकारी स्तर पर भी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। देश में 287 से अधिक राष्ट्रीय कैंसर ग्रिड, 19 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट और 20 टर्शियरी केयर कैंसर सेंटर सक्रिय हैं। कैंसर की 36 आवश्यक दवाओं को ड्यूटी फ्री किया गया है और मरीजों को 5 से 15 लाख रुपये तक की सरकारी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। वर्ष 2028 तक हर जिले में डे-केयर कैंसर सेंटर स्थापित करने का लक्ष्य है। वैश्विक सहयोग भी कैंसर के खिलाफ लड़ाई को मजबूत कर रहा है। वर्ष 2024 में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया द्वारा शुरू की गई क्वाड कैंसर मूनशॉट पहल का उद्देश्य सर्वाइकल कैंसर का उन्मूलन है।

आशा की किरण

इतिहास पर नजर डालें तो 1891 में इम्यूनोथेरेपी की अवधारणा से लेकर 1940 में कीमोथैरेपी, 1960 में टैमोक्सिफेन, 1990 में पहला कैंसर टीका, 1997 में एंटीबॉडी थैरेपी, 2000 में रोबोटिक सर्जरी और 2017 में सीएआर टी-सेल तकनीक तक, कैंसर उपचार की तकनीकें लगातार विकसित होती रही हैं। हर दशक कैंसर के खिलाफ नई उम्मीद लेकर आया। कैंसर के खिलाफ यह लड़ाई केवल प्रयोगशालाओं और अस्पतालों तक सीमित नहीं। इसमें जागरूकता, स्वस्थ जीवनशैली, समय पर जांच, सामाजिक समर्थन और सशक्त स्वास्थ्य नीतियों की समान भूमिका है। यदि चिकित्सा विज्ञान की यह गति बनी रही और उपचार की उपलब्धता व किफायतीपन सुनिश्चित किया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब कैंसर को घातक महामारी के बजाय नियंत्रित और उपचार योग्य रोग के रूप में देखा जाएगा। विश्व कैंसर दिवस हमें यही संदेश देता है कि चेतावनी के आंकड़ों के बीच भी उम्मीद जीवित है और यही उम्मीद मानवता की सबसे बड़ी ताकत है।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ।

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