आज भी आम आदमियों के घरों में प्राचीन विरासती माल असबाब, कलाकृतियां, ज़ेवरात आदि मिल जायेंगे। इस धरोहर को कैसे सुरक्षित व संरक्षित रखा जाये? वेबसाइटस, म्यूजियम्स, मेमोरी प्रोजेक्ट्स व कॉफ़ी टेबल बुक्स ने इस संदर्भ में मदद की है। मई, 2025 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने ‘हर घर म्यूजियम’ की पहल की, ताकि देशभर के घरों में जो कलाकृतियां संरक्षित हैं और कलेक्टर्स ने बड़ी मशक्कत से जो खज़ाना एकत्र किया है उसे डॉक्यूमेंट किया जा सके। इस कार्यक्रम को कोलकाता में नेशनल काउंसिल ऑफ़ साइंस म्यूजियम्स के ज़रिये रोल आउट किया गया, जिसने प्रस्तुत किये गये सैकड़ों फोटोग्राफ, वीडियोज और प्रामाणिकता के दस्तावेजों को स्कैन किया है। इस योजना के साथ कि देशभर के अन्य स्थानीय म्यूजियमों को इस मुहिम में शामिल कर लिया जाये। अब तक जो 154 कलाकृति व व्यक्तिगत कलेक्शंस सबमिट किये गये हैं उनमें से 18 के सोशल मीडिया कंटेंट इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स व यू-ट्यूब पर पोस्ट कर दिये गये हैं। जिन संग्रहकर्ताओं को सूची में शामिल किया गया है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं :-
कोलकाता के 61-वर्षीय रिटायर्ड व्यापारी सौविक रॉय बुनियादी तौर पर फिलाटेलिस्ट हैं यानी वह डाक टिकट संग्रह करते हैं। उनके संग्रह में स्टाम्प, सिक्के ओलियोग्राफ, लिथोग्राफ और पेंसिल हैं। उनके पास 6,500 पेंसिल हैं उनमें से कुछ तो 100 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। एक 1935 के कलकत्ता की पेंसिल इतनी मोटी है कि उस पर कैलेंडर लिपटा हुआ है। एक चीनी मार्किंग पेंसिल है, जिसका कोर ग्रीज़ या मोम का है ताकि ग्लास या मेटल पर उसे प्रयोग किया जा सके। फिर देवदार की लकड़ी से बनी मोटी पेंसिलें हैं जो संभवतः 100 वर्षों से भी अधिक पुरानी हैं और कुछ विंटेज पेंसिल हैं जो सिगरेट व टूथपेस्ट के लिए विज्ञापनों में लिपटी हुई हैं। शार्पनर्स भी हैं, 1920 के दशक के। इनमें से एक धातु से साइकिल-रिक्शा की तरह बना हुआ है।
उत्तर कोलकाता की एक गली में दिवंगत साउंड-इंजीनियर सुशील कुमार चटर्जी का तीन मंज़िला मकान है। इसके पहले माले पर कीमती कलेक्शन है, जिसमें मौजूद हैं पहले विश्व युद्ध का स्पाई कैमरा, विनाइल रिकॉर्ड जिसमें कैद है रबींद्रनाथ टैगोर की आवाज़, 1912 का पॉकेट माइक्रोस्कोप, पहले विश्व युद्ध के दौरान ऑस्ट्रेलिया की नौसेना द्वारा इस्तेमाल किया गया सनडायल, 18वीं शताब्दी की इंडिगो प्लांटेशन घंटी जिसमें कट-ग्लास लगे हुए हैं और जिसके मालिक ब्रिटिश थे। चटर्जी के 2021 में निधन के बाद इस संग्रह की देखभाल उनके 58-वर्षीय पुत्र गौतम चटर्जी कर रहे हैं। गौतम अक्सर यहां आकर ख़ामोशी में बैठ जाते हैं और सोचते हैं कि जो आवाजें उन्हें सुनाई देती हैं वह उनके पिता सहित उन लोगों की हैं जो कभी इन चीज़ों के मालिक थे और अब अपने ख़ज़ाने को चेक करने के लिए आते हैं।
वलसाड़, गुजरात में 44-वर्षीय समीर कुमार आर्य ने हज़ारों माचिस एकत्र की हुई हैं, जिनमें से कुछ सौ साल से भी पुरानी हैं। वह इसे अपना ‘जेब में म्यूजियम’ कहते हैं। आर्य ने थीम के अनुसार माचिसों को लगाया हुआ है। शुरुआती माचिसों पर हिन्दू देवी-देवताओं व पौराणिक हस्तियों की तस्वीरें बनी हुई हैं, जो अधिकतर राजा रवि वर्मा की कला से प्रेरित हैं। देवी देवताओं की तस्वीरें इसलिए थीं ताकि उन्हें तेल, साबुन व लोशन के छोटे छोटे विज्ञापनों के साथ सुरक्षित रखा जा सके, कोई उन्हें फेंके नहीं। इसके बाद शाही पोट्रेट, आज़ादी के नारों व प्रतीकों और स्वदेशी आंदोलन के लेबल वाली माचिसें आयीं। इनका आर्य के कलेक्शन में एक अलग सेक्शन है।
ग्वालियर, मध्य प्रदेश के 20-वर्षीय कॉलेज छात्र शिवांश अरोड़ा के पास अब तक सबमिट की गईं सबसे पुरानी कलाकृतियां हैं। उनके पास जो 70 देशों के सिक्के, स्टाम्प व करेंसी नोट्स हैं, उनमें कॉपर के सिक्के भी हैं जो तीसरी से चौथी शताब्दी में पद्मावती के नागा द्वारा जारी किये गये थे। साथ ही उनके पास लगभग 300 साल पुराने चांदी के पंच-मार्का वाले सिक्के भी हैं, ग्वालियर के सिंधिया वंश के।
पुणे के 39-वर्षीय ऑटोमोटिव डिज़ाइनर महेश लोणकर ने 1200 से अधिक फ्लैश लाइट्स एकत्र की हुई हैं, जिनमें से कुछ को पहले विश्व युद्ध के दौरान सैनिकों ने प्रयोग किया था, कुछ बोर्ड सबमरीन में इस्तेमाल हुई थीं और कुछ नॉवेल्टी फ्लैश लाइट्स भी हैं, जैसे बंदूक की शेप में। उनका यह कलेक्शन पुणे के उनके दो-बैडरूम फ्लैट में है, जो वीकेंड पर विज़िटर्स के लिए खुला रहता है। उनका सपना है कि वह एक दिन भारत का पहला फ्लैशलाइट म्यूजियम स्थापित करें। इ.रि.सें.

