वंदे मातरम् एक नारे के तौर देश के स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा था यानी अंग्रेजी राज के विरुद्ध राष्ट्रभक्तों के उत्साह का प्रतीक। करीब 150 साल पूर्व यह प्रकाशित हुआ व बाद में बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किया। संविधान में इसे बतौर राष्ट्रगीत शामिल किया गया जो आज भी देशभक्ति का प्रेरक है।
* वंदे मातरम् गीत की रचना किसने की थी? - बंकिमचंद्र चटर्जी
*राष्ट्रगीत वंदे मातरम् किस उपन्यास का हिस्सा है? - आनंदमठ
* वंदे मातरम् गीत मूलरूप से किस भाषा में लिखा गया था? - बांग्ला
* वंदे मातरम्् गीत पहली बार सार्वजनिक कब और कहां गाया गया। - 1896 में, कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में
* वंदे मातरम्् भारत का राष्ट्रगीत कब घोषित किया गया? - 1947 में
* वंदे मातरम् के पहले दो पद किस भाषा में हैं? - संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में
*वंदे मातरम् गीत का संगीत किसने तैयार किया?-रवींद्रनाथ ठाकुर ने
* स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् का मुख्य उपयोग किस रूप में हुआ? - बतौर नारे और प्रेरणा गीत
* वंदे मातरम् में मातरम् का संकेत किसकी ओर है? - भारत माता
* संविधान में वंदे मातरम् के संबंध में क्या उल्लेख है?
- राष्ट्रगीत का दर्जा है।
रेकी के जनक डॉ. मिकाओ उसुई
रेकी जापानी शब्द है। उसका मतलब है ब्रह्मांड की ऊर्जा। दो हजार साल पहले यीशु इसी तरह की किसी ऊर्जा से लोगों को हील कर रहे थे। लोग कहते थे कि कोई शक्ति है या कोई शफा है। लेकिन ठीक-ठीक नहीं पहचान पाते थे। उसे बहुत बाद में मिकाओ उसुई ने फिर से खोजा। मिकाओ उसुई पेशे से डॉक्टर थे। जापान के क्योटो शहर में 1801 में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता बौद्ध और मां ईसाई थीं। वह क्योटो के एक कॉलेज में डीन हो गये थे। कॉलेज में आध्यात्मिक सेशन होते रहते थे। एक दिन ऐसे ही किसी सेशन में डॉ. उसुई से किसी छात्र ने पूछा, ‘सर, हज छूने, बोलने या आशीर्वाद देने से ही लोगों की गंभीर बीमारियां ठीक हो सकती हैं। क्या ये हकीकत है या महज कहानियां?’ डॉ. मिकाओ उसुई ने कहा, ‘ये हकीकत है।’
तब छात्रों ने कहा, ‘सर, हमें वह सिखाओ।’ डॉ. मिकाओ उसुई बोले, ‘ तुमने बहुत अच्छी बात की है। लेकिन मैं खुद उसके बारे में नहीं जानता। ...और भी महान लोग हुए हैं, जिन्होंने इस अंदाज में हील किया है। यीशु से पहले बुद्ध ने इस तरह का करिश्मा किया था।’ डॉ. उसुई तब बौद्ध मठ गये। लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। वह लौटे और कॉलेज से इस्तीफा दे दिया। उसुई अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़े। दुनियाभर में वह घूमते रहे। वह हिंदुस्तान आये और सोचा, यह बुद्ध का देश है। बौद्धों की तमाम पवित्र और गुप्त विद्याओं का देश। क्यों नहीं मैं यहां कुछ खोज करूं। उन्होंने संस्कृत सीखी, तिब्बत भी गये व लोटस सूत्र पढ़ा। फिर लौटकर आये। फिर यहां उन्हें अथर्ववेद पढ़ते हुए दो मंत्र मिले। इन्हीं मंत्रों से उनकी यात्रा आगे बढ़ी। इन रहस्यमय सूत्रों को लेकर वह जापान लौट गये। अब सूत्र उनके पास थे, लेकिन उन्हें कैसे इस्तेमाल करना है, यह समस्या थी।
अंतरात्मा की आवाज पर वह कुरियामा पर्वत की ओर चल दिये। वहां गुफा में 21 दिन साधना की। उनकी चेतना एक अलग स्तर पर चली गयी थी। कुछ अलग किस्म का अनुभव हो रहा था। उस समय वह अपने भीतर अद्भुत प्रकाश महसूस कर रहे थे। इन्हीं क्षणों में उन श्लोकों का अर्थ खुलने लगा। ‘भूलो मत, याद रखो।’ ये शब्द उनके कानों में गूंजने लगे। वह सुबह जगे तो देखा कि सूरज बहुत ऊपर है। हालांकि हर तरफ बर्फ ही बर्फ थी। वह बेहद गरम महसूस कर रहे थे। वह दौड़े-दौड़े कुरियामा पर्वत पहुंचे। भागते हुए उनके पैर का नाखून टूट गया था। उससे खून बह रहा था। उन्होंने उस पर हाथ लगाया। वह नाखून खट से जुड़ गया। यह पहला हीलिंग अनुभव था। डॉ. मिकाओ उसुई रेकी की ओर बढ़ गये थे। -इ.रि.सें.

