गिग प्लेटफार्म के कर्मचारियों की संख्या देश-दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। इससे रोजगार सृजन हो रहा है, लोगों को त्वरित सामान व सेवाएं तथा कंपनियों को कम लागत का कार्यबल मिल रहा है। ज्यादातर गिग वर्कर कैब सेवा, हॉस्पिटेलिटी सेक्टर, मीडिया-मनोरंजन, ई-कॉमर्स कंपनियों में काम करते हैं। खासकर डिलीवरी ऐप व कैब सेवा। ये वर्कर नियोक्ता-कर्मचारी औपचारिक संबंधों के दायरे में नहीं। लेकिन गिग कर्मचारी घटती कमाई,कटौतियों, बढ़ता स्ट्रेस, पेंशन लाभ व सेहत बीमा का अभाव जैसी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।
वर्ष 2026 के आगमन से ठीक पहले जाते हुए साल (2025) ने भारत के नए विकसित हुए कामकाजी क्षेत्र में एक हलचल पैदा कर दी। यह हलचल खास तौर से शहरों में हुई, जहां ऐप-आधारित सेवाओं (डिलीवरी ऐप) की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करने वाले गिग वर्कर्स ने हड़ताल का ऐलान किया। नए साल के जश्न में जुटे लोगों को लगा कि उनकी छुट्टियों का मजा किरकिरा होने वाला है, क्योंकि तेजी से उभरती महानगरीय संस्कृति में खाने-पीने से लेकर हर जरूरत का सामान दस मिनट में मंगाने के ट्रेंड में ये डिलीवरी ऐप और उनसे जुड़े लोग (गिग वर्कर) बड़ा सहारा हैं। हालांकि अपनी मजबूरियों के चलते गिग वर्कर्स हड़ताल में ठीक से भागीदारी नहीं कर सके, लेकिन उनकी समस्याओं का नोटिस बड़े पैमाने पर लिया गया।
गिग वर्कर्स की समस्याएं क्या हैं, इसे हाल के दशकों में सामने आई गिग अर्थव्यवस्था के विकास की जड़ से समझा जा सकता है। दुनिया में कामकाज या रोजगार की जो शैलियां औद्योगिकीकरण के बाद विकसित हुई हैं, उनमें खुद के कारोबार के अलावा मोटे तौर पर पक्की (स्थायी) और ठेके (अनुबंध पर) की जाने वाली नौकरियां ही पेट पालने का साधन रही हैं। इन्हीं के बीच कुछ दशकों से स्वतंत्र रूप से काम (फ्रीलांस) करने का चलन भी स्थापित हुआ। इसमें लोग चुने हुए काम को अपनी सुविधा और समय के साथ करते रहे हैं। इन सबके मध्य रोजगार की एक नई शैली अंग्रेजी के शब्द- गिग के नाम से पुकारी जाने वाली श्रेणी के कामकाज को लेकर पैदा हुई है। इस किस्म के कामकाज या नौकरियों का स्वरूप ऐसा है, जिसमें कहने को तो नियोक्ता किसी को एक कर्मचारी के रूप में काम पर रखते हैं, पर उसमें कर्मचारी को कोई सामाजिक या स्वास्थ्य सुरक्षा जैसी सहूलियतें नियोक्ता की ओर से मिलने की गारंटी नहीं है।
पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के बाहर
गिग इकोनॉमी वाली मुक्त बाजार प्रणाली में नियोक्ता या संगठन कुछ समय के लिए श्रमिक को पारिश्रमिक के बदले काम पर रखते या अनुबंधित करते हैं। इस व्यवस्था में गिग वर्कर एक ऐसा व्यक्ति है जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी औपचारिक संबंधों के बाहर काम करता है या कार्य व्यवस्था में भाग लेता है और ऐसी गतिविधियों से कमाई करता है। हालांकि कुछ राज्यों में और केंद्र सरकार के कुछ प्रयासों से गिग वर्कर्स को चंद सहूलियतें मिलने लगी हैं, लेकिन वे ऐसी नहीं कि ऐसे कर्मचारी बहुत राहत महसूस कर सकें।
गिग वर्कर्स की समस्याएं
सवाल है कि काम की आजादी के तर्क से गिग अर्थव्यवस्था से जुड़े देश के करोड़ के करीब गिग वर्कर्स (नीति आयोग के मुताबिक 2020 में इनकी संख्या 77 लाख थी जिसके 2030 तक 2.35 करोड़ पहुंचने के अनुमान हैं) किन समस्याओं से घिरे हैं। उनकी पहली दिक्कत डिलीवरी ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म (जैसे कि ब्लिंकिट, स्विगी, जोमैटो, जेप्टो, फ्लिपकार्ट, मिल्कबास्केट आदि) से होने वाली उनकी कमाई घट गई है। दूसरे, महज दस मिनट में सामान पहुंचाने का दबाव उनके लिए मुसीबत बन गया है। सामाजिक सुरक्षा (स्वास्थ्य व दुर्घटना बीमा) की कमी उनकी अन्य दिक्कतों में शुमार हैं। कुछ सर्वेक्षण बताते हैं कि खास तौर से डिलीवरी ऐप से जुड़े गिग कर्मचारियों की समस्याएं यहीं खत्म नहीं होतीं। पीपल्स एसोसिएशन इन ग्रास रूट्स एक्शन एंड मूवमेंट्स यानी पैमाग की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण ने आंकड़े दिए थे कि इन गिग वर्कर्स को साप्ताहिक अवकाश, प्रतिदिन 500 रुपये से भी कम कमाई और डिजिटल प्लेटफॉर्म की फीस व अन्य कटौतियां आदि दिक्कतों का भी सामना करना पड़ता है।
करोड़ों लोग गिग के लिए तैयार
गिग अर्थव्यवस्था को समझना हो तो ऐपआधारित कैब सेवा- उबर के कामकाजी मॉडल को बतौर उदाहरण देखना चाहिए। ‘उबराइजेशन’, को गिग इकोनॉमी के मामले में मॉडल करार दिया जा सकता है। उबर और ओला टैक्सी सर्विस तथा स्विगी-ज़ोमैटो जैसे ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म जैसा कामकाज श्रमिकों को उपलब्ध कराते हैं, वही गिग इकोनॉमी का सबसे सटीक मॉडल है। हाल के वर्षों में अस्थायी या लचीली प्रकृति की ऐसी नौकरियों की लोकप्रियता काफी बढ़ी है। कंपनियों के लिए यह व्यवस्था काफी किफायती है। वहीं कर्मचारियों को काम करने के मामले में यह काफी लचीलापन और आजादी प्रदान करती है। शायद यही वजह है कि देश के ‘ई-श्रम पोर्टल’ पर 2023 में एक साल के अंदर 28 करोड़ 62 लाख लोगों ने गिगकर्मी बनने की इच्छा के साथ अपना पंजीकरण कराया था। ‘बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के गिग कार्यबल में सॉफ्टवेयर, साझा सेवाओं और पेशेवर सेवाओं जैसे उद्योगों में कार्यरत 1.5 करोड़ कर्मचारी शामिल हैं। फलस्वरूप अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में भारत के कुल कार्यबल का एक उल्लेखनीय हिस्सा ‘गिग सेक्टर’ में बदल सकता है।
गिग इकोनॉमी के विस्तार की वजहें
हाल के वर्षों में गिग वर्कर और इनसे संबंधित गिग इकोनॉमी के चर्चा में आने का प्रमुख कारण महामारी कोविड-19 है। जब हर प्रकार के कामधंधे बंद पड़े थे, उस दौर में इंटरनेट से संचालित सेवाओं से जुड़े गिग कर्मचारियों ने दुनिया को चलाए रखने का अहम जिम्मा उठाया। इसकी मुख्य वजह यह थी कि मजबूरी में ही सही, देश में स्मार्टफोन और हाई स्पीड मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा जिसने कारोबारियों और गिग कर्मचारियों के लिए ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से काम करना आसान कर दिया। इसके अलावा सरकार की आर्थिक उदारीकरण की नीतियों से भी गिग इकोनॉमी को रफ्तार मिली। इस बीच ऐसे युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है तो एक लचीली कार्य व्यवस्था के हिमायती हैं ताकि वे वर्क-लाइफ बैलेंस कर सकें। साथ ही अतिरिक्त आय कमाने की इच्छा ने भी लोगों को गिग वर्कर बनने के लिए प्रेरित किया है। सबसे अहम यह है कि देश में ई-कॉमर्स का जिस तेजी से विकास हुआ है, उसने गिग इकोनॉमी को मानो पंख ही लगा दिए।
नकारात्मक पहलू
गिग इकोनॉमी में सब कुछ अच्छा ही हो- ऐसा नहीं है। इसके कई नकारात्मक पहलू हैं। इसमें स्थायी नौकरी जैसी सुरक्षा और साथ मिलने वाले स्वास्थ्य की देखभाल जैसे कई लाभ तकरीबन नदारद हैं। राजस्थान और कर्नाटक सरकारों की चुनींदा पहलकदमियों को छोड़ दें, तो आज भी देश के ज्यादातर हिस्से में तमाम क्षेत्रों के गिग कर्मचारी किसी तरह के श्रम कानूनों के तहत नहीं आते। ऐसे में पेंशन लाभ और सेहत बीमा जैसी सहूलियतों पर उनका कोई अधिकार नहीं होता। गिग वर्करों को किसी बीमारी या दुर्घटना आदि में स्थायी कर्मचारियों के समान नियोक्ता की ओर से कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं होती। कुछ राज्यों की सरकारें इस मामले में अपवाद हैं, लेकिन पूरे देश में ऐसी नीतियां अपनाए जाने तक गिग वर्करों के हित और लाभ काफी सीमित हैं। इसका दूसरा बड़ा संकट यह है कि जो लोग तकनीक और इंटरनेट से ज्यादा परिचित नहीं हैं या जिनकी इन चीजों तक पहुंच नहीं है, वे गिग वर्कर के रूप में आय अर्जन का अवसर भी नहीं हासिल कर पाते हैं। कंपनियों द्वारा गिग कर्मचारियों के शोषण जैसी सूचनाएं भी इस श्रेणी के कामकाज की नकारात्मकता दर्शाते हैं।
गिग कर्मियों और अवसरों की ग्रोथ
बेशक, पेशे के रूप में फ्रीलांसिंग और गिग वर्किंग काफी अरसे से दुनिया को लुभाती रही है। गिग प्लेटफार्म या गिग इकोनॉमी के कर्मचारियों की संख्या और कामकाज के अवसर देश-दुनिया में तेजी से बढ़ रहे हैं। आज से आठ साल पहले 2017 में एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा था कि भारत में गिग इकोनॉमी का जिस तेजी से विस्तार हो रहा है, उसके मद्देनजर इसकी काफी ज्यादा संभावना है कि 2030 में करोड़ों गिग वर्कर काम कर रहे होंगे। हालांकि अभी गिग इकोनॉमी के तहत लोगों को स्वतंत्र रूप से काम सौंपने वाली कंपनियों की गिनती शीर्ष पांच में नहीं होती है। फिलहाल जिन क्षेत्रों में ऐसे काम लोगों को मिल रहे हैं, उनमें पहले नंबर पर हॉस्पिटैलिटी (होटल, रेस्टोरेंट आदि) सेक्टर है। शैक्षिक सेवाएं और मीडिया-मनोरंजन दूसरे और तीसरे क्रम पर आते हैं। चौथा स्थान ई-कॉमर्स कंपनियों और पांचवां स्टार्टअप कंपनियों का है। इधर दो-एक वर्षों से आईटी कंपनियां भी तेजी से गिग वर्करों पर फोकस बढ़ाने लगी हैं। आईटी कंपनियों में नियुक्त मानव संसाधन अधिकारी मानते हैं कि जिस तरह के काम अब कंपनियों के पास आ रहे हैं, उन्हें स्थायी कर्मचारियों के आधार पर तुरंत पूरा करना संभव नहीं होता है। नियोक्ता ऐसे काम अपने रेगुलर स्टाफ की बजाय ऑन-डिमांड उपलब्ध होने वाले पेशेवरों को सौंपने लगे हैं।
आईटी क्षेत्र में गिग कर्मचारियों को शायद ज्यादा समस्या न हो, लेकिन डिलीवरी ऐप से जुड़े कर्मचारियों को हर वक्त दुर्घटना का ही खतरा बना रहता है। दस मिनट में सामान पहुंचाने का दबाव उन्हें सड़क पर कब घायल कर दे- कहा नहीं जा सकता। ऐसे में सड़क दुर्घटना और स्वास्थ्य बीमा जैसी बुनियादी सहूलियतें उनका हक हैं। इसी तरह छुट्टियों के मामले में भी उन्हें रियायत मिलनी चाहिए। कुछ साल पहले, एक पहल के तहत ब्रिटेन में वहां की सर्वोच्च अदालत ने एपबेस्ड कैब यानी उबर ड्राइवरों को न्यूनतम वेतन और सवेतन (भुगतान वाली) छुट्टियों के अधिकार वाले श्रमिकों के रूप में वर्गीकृत किया था। यह एक उदाहरण है कि कैसे गिगकर्मियों के हित सुनिश्चित किए जा सकते हैं। हालांकि भारत में भी कुछ कंपनियां अपने गिग कर्मचारियों को कार्यस्थल पर दुर्घटना बीमा प्रदान करती हैं, लेकिन ऐसा करने वाली कंपनियां काफी कम हैं। कायदे से दुर्घटना बीमा का हक प्रत्येक गिगकर्मी को मिलना चाहिए। इसी तरह थर्ड पार्टी बीमे के रूप में गिग वर्करों को स्वास्थ्य बीमा देने वाली कंपनियां भी गिनी-चुनी हैं। इन सबसे ऊपर गिग कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति या किसी आपदा का शिकार होने पर नियमित बचत वाला फंड शायद ही कोई कंपनी देती हो। भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) जैसी सहूलियत से गिग कर्मी तकरीबन बाहर ही हैं। भविष्य निधि के मामले में एक मॉडल इस तरह बनाया जा सकता है कि प्रत्येक सफल ऑर्डर या बुकिंग पर कंपनियां न्यूनतम स्वैच्छिक योगदान के माध्यम से एक फंड तैयार कर सकती हैं। ये फंड कर्मचारी भविष्य निधि संभालने वाले व्यावसायिक ट्रस्टों की तरह एक कार्पस फंड में स्थानांतरित किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर यह फंड गिग कर्मियों के काम आ सकता है। हालांकि गिग इकोनॉमी के इस मॉडल में कंपनियों के दायित्वों की सीमा तय करना मुश्किल काम है। लेकिन गिग श्रमिकों के हितों पर विचार करते हुए और उनकी आवश्यकताओं का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करते हुए एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था सरकार और कंपनियां मिलकर बना सकती हैं, जिसका लाभ दोनों पक्षों यानी नियोक्ता और गिग कर्मचारी को हो।
भारत से बाहर गिग अर्थव्यवस्था
अस्थायी, फ्रीलांस या प्लेटफॉर्म-आधारित कामकाज का चलन पूरी दुनिया में फैल रहा है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के अनुसार, विकसित और विकासशील, दोनों तरह के देशों में गिग अर्थव्यवस्था रोजगार सृजन का महत्वपूर्ण जरिया बन रही है। हालांकि इसमें असमानता और शोषण की समस्याएं भी चौतरफा हैं। अमेरिका, यूरोप, चीन, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में ही गिग अर्थव्यवस्था की काफी वकालत की जाती रही है, लेकिन वहां भी इसके कुछ नुकसान, जैसे कि आय में अस्थिरता के मामले साफ दिखे हैं।
अमेरिका का मामला
अमेरिका गिग इकोनॉमी का सबसे बड़ा केंद्र है। वहां उबर, लिफ्ट और डोरडैश जैसे प्लेटफॉर्म कामकाजी लोगों को रोजगार का जरिया और ग्राहकों को सहूलियत उपलब्ध कराते हैं। भारत समेत दुनिया के कई देशों में संचालित हो रही ऐप आधारित टैक्सी सेवा- उबर की स्थापना अमेरिका में ही 2009 में हुई थी। आज यह राइड-शेयरिंग का सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है। इसी तरह खाना डिलीवरी करने में अमेरिका की डोरडैश अग्रणी रही है। वर्ष 2023 तक, अमेरिका में लगभग 36 फीसदी कार्यबल गिग कार्यों में शामिल था। इसमें ड्राइविंग, फूड और अन्य सामानों की डिलीवरी और फ्रीलांसिंग कामकाज शामिल हैं।
यूरोप में गिग इकोनॉमी
यूरोप में, विशेष रूप से ब्रिटेन और फ्रांस में, उबर, डेलिवरू और बोल्ट जैसे प्लेटफॉर्म प्रमुख गिग प्लेटफॉर्म हैं। ब्रिटेन में गिग अर्थव्यवस्था में करीब 47 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है। फ्रांस में भी डिलीवरी और राइड शेयरिंग जैसे काम गिग अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे रहे हैं। ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत ने एक फैसले में उबर ड्राइवरों को कर्मचारी माना था, इससे उन्हें छुट्टियां और न्यूनतम वेतन मिलता है। यूरोपियन आयोग में वर्ष 2021 में इस मामले में ठोस दिशा-निर्देश (प्लेटफॉर्म वर्क डायरेक्टिव) पेश किए थे, जिससे गिग कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन और बीमे जैसी सहूलियतें अधिकार के तहत मिली हुई हैं। इससे वहां प्रवासियों और युवाओं के लिए रोजगार तेजी से बढ़े हैं।
चीन की दीदी और मीतुआन
चीन में दीदी चुक्सिंग (राइड-शेयरिंग) और मीतुआन (फूड डिलीवरी) गिग अर्थव्यवस्था के प्रमुख उदाहरण हैं। साल 2025 तक, चीन में 74.8 लाख कैब-ड्राइवर दीदी चुक्सिंग से जुड़े हैं। जबकि वहां गिग कर्मचारियों की कुल संख्या दो करोड़ के पार है।
लैटिन अमेरिका और अफ्रीका
लैटिन अमेरिकी देशों में मुख्य तौर पर में ब्राजील का उदाहरण प्रमुख है, जहां रैपी और उबर जैसी सेवाएं प्रवासियों के लिए जीवनरेखा है। हालांकि कम वेतन, सेवानिवृत्ति के बाद कोई लाभ नहीं मिलने और कामकाज की खराब स्थितियों के चलते वहां भी गिग अर्थव्यवस्था आलोचनाओं के केंद्र में है। यही कारण है कि वर्ष 2020 में ब्राजील में डिलीवरी कर्मचारियों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए थे। उधर, अफ्रीकी देशों में मुख्यतः नाइजीरिया का उदाहरण है, जहां गिग अर्थव्यवस्था ने युवा बेरोजगारी का समाधान पेश किया है। वहां जुमिया ने ई-कॉमर्स के जरिए नौकरियां पैदा कीं, जबकि बोल्ट टैक्सी सर्विस ने सफर आसान बनाया। यूं तो वैश्विक स्तर पर गिग अर्थव्यवस्था ने रोजगार अवसर बढ़ाए हैं। एक अध्ययन में देखा गया है कि उबर जैसे प्लेटफॉर्मों से जुड़ने वाले कर्मचारी विकसित देशों में श्रमिक बेरोजगारी लाभ के लिए कम आवेदन करते हैं और कर्ज पर कम निर्भर रहते हैं। लचीलापन एक बड़ा लाभ है जो ऐसी अर्थव्यवस्था में मिलता है। कंपनियों को इसमें फायदा यह कि लागत में कमी आती है। वे अपने पूर्णकालिक कर्मचारियों की तुलना में कम खर्च करती हैं। उपभोक्ताओं को सस्ती और तेज सेवाएं मिलती हैं, जैसे 10 मिनट में घरेलू सामान और 30 मिनट में भोजन। इसके अलावा, यह अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाती है, मसलन, ग्रिडवाइज जैसे ऐप जो गिग कर्मचारियों को अपनी आमदनी ट्रैक करने में मदद करते हैं। हालांकि इस अर्थव्यवस्था की चुनौतियां गंभीर किस्म की हैं। बिजनेस पत्रिका फोर्ब्स की रिपोर्ट के अनुसार, 25 फीसदी से ज्यादा गिग कर्मचारी सरकारी नौकरियों में दिए जाने वाले न्यूनतम वेतन से भी कम कमाई कर पाते हैं, जिस कारण आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं। पक्की नौकरी वाले लाभ, जैसे स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और सालाना छुट्टियों से भी उन्हें वंचित होना पड़ सकता है। गिग कर्मचारियों की आय भी अस्थिर है। न्यूयॉर्क में एक सर्वे से पता चला कि कई श्रमिक स्थिर घंटों वाली नौकरियां नहीं मिलने के कारण ही गिग काम चुनते हैं, लेकिन यह शोषण का रूप ले लेता है।
- लेखक मीडिया यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
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