अक्षय खन्ना और बॉबी देओल दोनों ही अपने ज़माने के सफल हीरो के बेटे हैं। अपने पिता की तरह उन्होंने भी हीरो की इमेज को अपनाया। लेकिन, वे अपने पिता की तरह छवि नहीं बना सके। फिर हालात बदले और इन कलाकारों ने अपनी छवि उलट दी। हीरो का मुखौटा उतार खलनायक की भूमिका स्वीकार ली। दोनों नई भूमिकाओं में सफल हो गए। अक्षय ने ‘छावा’ और ‘धुरंधर’ में क्रूरता का जलवा दिखाया तो बॉबी ने ‘आश्रम’ वेब सिरीज के बाद ‘एनीमल’ फिल्म में खलनायक जिंदा कर दिया। इन्होंने निगेटिव किरदारों को नई गरिमा और आकर्षण दिया व अब प्रभावी खलनायकों में शामिल हैं। दोनों ने साबित किया कि आज खलनायक सिर्फ हीरो का विरोधी नहीं, बल्कि कहानी का इंजन व दर्शकों की जिज्ञासा का केंद्र भी है।
हिंदी सिनेमा में आज खलनायक सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट की तरह नैतिक विभाजन नहीं, बल्कि एंटी-हीरो, ग्रे-ज़ोन और क्रिमिनल-सेंट्रिक नैरेटिव का प्रतीक भी बन चुका है। जिसे केजीएफ, पुष्पा, मिर्ज़ापुर, छावा और एनिमल जैसी फिल्मों और ‘आश्रम’ जैसी वेब सीरीज़ ने और मजबूत किया। ट्रेंड यह कि कहानी अक्सर हिंसक, कानून विरोधी या नैतिक रूप से संदिग्ध किरदार के नज़रिए से कही जा रही है। जबकि, बॉक्स ऑफिस के आंकड़े बताते हैं कि दर्शक इस अंधेरी जगह में रोमांच और रिलेटेबिलिटी दोनों खोज रहे हैं। इस परिदृश्य में अक्षय खन्ना और बॉबी देओल जैसे कलाकारों ने ‘स्टार विलेन’ का नया मॉडल भी तैयार किया, जहां निगेटिव रोल कैरियर रिवाइवल का साधन व अभिनय कौशल आज़माने की प्रयोगशाला भी बना। उनकी सफलता संकेत देती है कि आने वाले सालों में खलनायक की परतदार, मानवीय और कभी-कभी ग्लैमराइज्ड छवि ही मुख्यधारा हिंदी सिनेमा की धुरी रहने वाली है। अक्षय खन्ना का अभिनय संवेदनशीलता और ठंडे करिश्मे का संगम है। ‘रेस’, ‘इत्तेफाक’ और ‘धुरंधर’ जैसे किरदारों में उन्होंने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि खलनायक हमेशा हिंसक नहीं होता कभी-कभी वह बौद्धिक रूप से खतरनाक होता है। वह सिनेमा के ‘मॉडर्न विलेन’ हैं स्टाइलिश, विचारवान और रहस्यमय। दूसरी ओर, बॉबी देओल ने ‘मौन के आतंक’ को साकार किया। ‘आश्रम’ में बाबा निराला और ‘एनिमल’ में उनका खामोश खलनायक दर्शकों के भीतर भय और आकर्षण दोनों पैदा करता है। इन किरदारों का विरोधाभास यह है कि वे बुरे हैं, पर मनुष्य भी हैं, टूटी हुई आत्माएं भी हैं, जो हिंसा में अपने अस्तित्व की तलाश करती हैं। फिल्मों में अक्षय खन्ना का सफर ‘हमराज़’, ‘रेस’ से शुरू होकर ‘छावा’ के औरंगजेब और ‘धुरंधर’ के रहमान डकैत तक पहुंच गया, जहां वे निगेटिव स्पेस को अपनी जगह बना चुके हैं। उनके भारी और नियंत्रित संवाद, धीमी लेकिन भय पैदा करने वाली बॉडी लैंग्वेज और आंखों में ठंडापन उन्हें 70-80 के विलेन से अलग, मनोवैज्ञानिक खलनायक बनाता हैं। ‘धुरंधर’ में रहमान डकैत के रूप में चर्चा हीरो से ज्यादा उनके किरदार की हो रही। उनकी हॉलीवुड के प्रतिष्ठित विलेन कैरेक्टरों से तुलना होने लगी। ‘छावा’ में औरंगजेब की भूमिका के साथ उन्होंने इतिहास आधारित निगेटिव किरदार में भी परतें जोड़ते हुए दिखाया कि दर्शक खलनायक में भी वैचारिक और भावनात्मक जटिलता देखना चाहता है।
बॉबी देओल: खामोश, भयावह चेहरा
रोमांटिक हीरो बॉबी देओल का ‘विलेन युग’ वेब सीरीज ‘आश्रम’ के बाबा निराला से शुरू होकर फिल्म ‘एनिमल’ के मूक, लेकिन हिंसक अबरार हक तक आता है। इस किरदार ने उन्हें फिर से मुख्यधारा चर्चा में ला खड़ा किया। ‘आश्रम’ में उन्होंने तथाकथित धर्मगुरु के रूप में जिस तरह सत्ता, शोषण और करिश्मे का मेल दिखाया, उसने यह साबित किया कि निगेटिव रोल, स्टार की खोई हुई चमक फिर लौटा सकते हैं। ‘एनिमल’ में अबरार जैसे लगभग बिना संवाद वाले किरदार में सिर्फ शरीर, आंखों और हिंसा की कोरियोग्राफी के जरिए प्रभाव छोड़ना, आधुनिक एक्शन-सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र के अनुरूप एक नया तरह का खलनायक गढ़ता है, जो स्टाइल और क्रूरता दोनों से याद रहता है। इसके बाद उन्हें रेस-3, लव हॉस्टल और आगामी बड़े प्रोजेक्ट्स में कास्ट किया जाना दिखाता है कि इंडस्ट्री उन्हें नए दौर के विलेन के रूप में देख रही है।
गहराई ‘बुराई’ में
हिंदी सिनेमा के कथानक में ‘नायक’ हमेशा केंद्र में रहा है। वह पात्र जो अच्छाई, त्याग और नैतिकता का प्रतीक होता है। लेकिन नायक की रोशनी तभी चमकती है, जब उसके सामने एक दमदार खलनायक हो। हर दौर में कुछ ऐसे कलाकार हुए, जिन्होंने यह साबित किया कि अभिनय की असली गहराई ‘बुराई’ को विश्वसनीय और करिश्माई बनाने में है। उनके किरदारों ने यह दिखाया कि दर्शक नफ़रत करते हुए भी ऐसे पात्रों को भूल नहीं पाते। 1930 और 40 के दशक का हिंदी सिनेमा अच्छाई-बुराई की सीधी लड़ाइयों पर आधारित था। बाद में कुछ अभिनेताओं ने खलनायकी का चेहरा बदलना शुरू किया। इसकी शुरुआत केएन सिंह ने की। जब निगेटिव किरदार बल या हिंसा आधारित थे, तब उन्होंने सोचने-वाले अपराधी की छवि रची। केएन सिंह ने ‘क़ैदी’, ‘जीवन नैया’ और ‘हवस’ जैसी फिल्मों में संतुलित, ठंडा और परिष्कृत अंदाज़ दर्शाया।
इसके बाद आया प्राण का दौर, जिन्होंने 1940 और 50 के दशक में खलनायक की परिभाषा ही बदल दी। ‘परख’, ‘जहां आरा’ और ‘बड़ी बहन’ जैसी फिल्मों में उनका अभिनय डरावना और सम्मोहक दोनों था। वे बुरे अवश्य थे, पर करिश्माई ढंग से। उनके अंदाज़, आवाज और चाल-ढाल में एक खास चमक थी, जिसने खलनायकी को एक नई प्रतिष्ठा दी। प्राण जितना नफरत का पात्र बने, उतने ही दर्शकों के मन में गहराई से बस गए और यही सिनेमा का विरोधाभास है। अजीत ने इस धारा को और स्टाइलिश बनाया। 1950-60 के दशक में उनकी छवि एक ऐसे ‘गैंगस्टर जेंटलमैन’ की बन गई, जिसकी बोली और चाल से ही डर बैठ जाए। उनके संवाद और रौबदार उपस्थिति ने साबित किया कि खलनायक भी ‘क्लास’ रख सकता है। अजीत की खलनायकी में ग्लैमर था। लेकिन, प्रेम चोपड़ा, रंजीत और गुलशन ग्रोवर की आंखों से अय्याशी टपकती थी, जो उनकी खलनायकी पहचान बनी।
1970 का खलनायक, यथार्थ की कठोरता
इसी दौर में 1975 में ‘शोले’ आई और गब्बर सिंह ने यह साबित किया कि खलनायक भी नायक बन सकता है। अमजद खान का किरदार गब्बर बहुत प्रभावशाली था। उसकी खासियत थी ‘संवाद में आतंक’ पैदा करना। गब्बर सिंह बने अमजद खान ने बाद में कई सकारात्मक भूमिकाएं निभाईं। हालांकि ‘लावारिस’, ‘योगी’ और ‘धर्म कांटा’ जैसी फिल्मों में वे खलनायक थे, लेकिन दर्शक उन्हें गब्बर के रूप में याद करते हैं। इस परंपरा को अमरीश पुरी ने भी खासी ऊंचाई दी। ‘मिस्टर इंडिया’ के मोगैंबो से लेकर ‘परदेस’ या ‘नायक’ तक, उनके किरदार ताकत और भय का प्रतीक बने। उनकी गूंजती आवाज़ और सख़्त उपस्थिति ने खलनायक को ऑरा दिया। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में उन्होंने वही रौब एक बदले हुए भाव में दिखाया, जहां बुराई के पीछे मानवीय भावनाएं थीं।
बदलता अर्थ
हर युग का खलनायक उस समय के समाज का भावात्मक आईना होता है। ‘50-60 में वह सत्ता और संपत्ति के भ्रष्ट प्रतीक थे। ‘70–80 में वह व्यवस्था-विरोधी आम आदमी का गुस्सा बन गया। 2000 के बाद उसने मानवीय अंतर्विरोधों का चेहरा धारण कर लिया। अभिनेता के लिए यह किरदार सबसे कठिन काम है। यही खलनायकी की कसौटी भी है। केएन सिंह की बौद्धिकता, प्राण की अदाओं का आतंक, अजीत की ठसक, अमजद ख़ान की संवाद अवधारणा, अमरीश पुरी का रौब, अक्षय खन्ना की बुद्धिमत्ता और बॉबी देओल की भावनात्मक ठंडक ये सब मिलकर दिखाते हैं कि हिंदी सिनेमा की सबसे गहरी यादें खलनायकों की बदौलत ही बनीं। आज जब सिनेमा ‘यथार्थ’ की ओर लौट रहा है, तब भी दर्शक खलनायक की तलाश करता है। वह कहानी को गहराई देता है। केएन सिंह से लेकर बॉबी देओल और अक्षय खन्ना तक, इन कलाकारों ने दिखाया कि अभिनय की असली ऊंचाई नायकत्व में नहीं, बल्कि खलनायकी की परतों में छिपी होती है जहां नफ़रत और करुणा, दोनों का स्वर एक साथ गूंजता है।
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