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अकेले बुजुर्गों में अब खुद के बूते जीने का जज्बा

सोलो एजिंग की अवधारणा

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बच्चों के जॉब के लिए विदेश या दूसरे शहरों में जाने के बाद अकेले रह रहे बुजुर्ग खुद की देखभाल खुद करने यानी सोलो एजिंग की राह चुन रहे हैं। एक हालिया स्टडी के मुताबिक, अकेले रहकर वे सक्रिय रहते हैं व खुश भी। वे इस जीवनशैली को एडजस्टमेंट मानते हैं जिसमें आत्मनिर्भरता का भाव भी जुड़ा है। नयी तकनीक इसमें खास मददगार है।

बुजुर्गों से जुड़े एक ताज़ा अध्ययन में सामने आया है कि उम्रदराज लोग अब शिकायतों के बजाय खुद को संभालने की राह चुन रहे हैं। स्टडी में शामिल अधिकतर वरिष्ठजनों ने बताया कि वे पांच साल से ज्यादा समय से अकेले रह रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर ज़िंदगी को मैनेज करने में आने वाली परेशानियों को भूलकर उन्होंने अकेले रहना चुना है। सोलो एजिंग के इस सफर में अपने जीवन से खुश रहने वाले बुजुर्गों का आंकड़ा ज्यादा है। एजवेल फाउंडेशन की इस रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में सोलो एजिंग का चलन तेजी से बढ़ रहा है। अकेले रहने वाले बुजुर्गों में 46.9 फीसदी सोलो एजर्स अपनी जिंदगी से खुश हैं, जबकि जबकि 41.5 प्रतिशत असंतुष्ट हैं। बता दें कि 10,000 बुजुर्गों को लेकर की गई यह स्टडी उम्रदराज लोगों के मन और जीवन का बदलता खाका हमारे सामने रखती है।

शिकायत नहीं, एडजस्टमेंट की सोच

बच्चों के कैरियर के लिए विदेश या दूसरे शहरों में जाने बाद अकेले रह रहे बुजुर्ग दोषारोपण के बजाय खुद की देखभाल खुद करने की राह चुन रहे हैं। यह सच है कि संयुक्त परिवारों के टूटने से घर के बड़े सदस्यों में अकेलापन बढ़ा हैं पर वे अपने आप को व्यस्त रखना भी सीख रहे हैं। दूर रहने वाले बच्चों से जुड़े रहने के लिए टैक्निकल गैजेट्स को यूज करना सीख रहे हैं। बुजुर्ग यह समझते हैं कि बच्चे चाहकर भी हर समय उनके साथ नहीं रह सकते। यही वजह है कि इन हालातों में तनाव में घिरने के बजाय वे खुशी-खुशी जीवन से जूझने के रास्ते पर चलने लगे हैं। सोलो एजिंग का यह ट्रेंड बड़े-बुजुर्गों की बदलती लाइफस्टाइल से जुड़े इसी पहलू की तसदीक करता है।

सक्रियता को प्राथमिकता

सुखद यह है कि सोलो एजिंग का ट्रेंड कोई थोपे जाने वाला चलन नहीं है। अकेले रहने वाले बुजुर्ग बहुत सी परेशानियों के जूझने के खुद को सक्रिय रखने के फ्रंट पर जी-जान जुटे रहते हैं। थकते कदमों के बावजूद अपनी जिम्मेदारियों को बोझ नहीं बल्कि सक्रिय रहने का बहाना मानते हैं। अकेले सब कुछ मैनेज करने के दबाव को एक्टिव और सधी हुई जीवनशैली के रूप में देख रहे हैं। इस उम्र में सेहत और सामाजिक जीवन से जुड़ी बहुत सी उलझनों के बीच भी अपने मन को संभालने का जतन कर रहे हैं। किसी भी तरह की कसरत, वॉक, योग आदि के लिए समय निकालते हैं। एक्टिव एजिंग का अंदाज़ उनको स्वस्थ रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन के मुताबिक एक्टिव एजिंग बुढ़ापे को एक प्रोडक्टिव और खुशनुमा अनुभव बनाने की स्ट्रेटैजी है, न कि इसे अंत मानने की। मौजूदा दौर में बुजुर्ग इस खुशनुमा ट्रांसफॉरमेशन के लिए तकनीक की मदद भी ले रहे हैं। ऑनलाइन सुविधाओं से लेकर अपने बच्चों और रिशतेदारों से जुड़े रहने तक, बुजुर्गों ने तकनीक के नए रंगों को सहजता से अपनाया है।

आज़ादी का अहसास

असल में सोलो एजिंग के चलन से आत्मनिर्भर बनने का भाव भी जुड़ा है। अपनी ज़िंदगी को अपने अंदाज़ में जीने से आज़ादी का गहरा अहसास भी जुड़ा है। यही वजह है कि अकेलेपन और हेल्थ से जुड़ी बहुत सी चुनौतियों के बावजूद बुजुर्गों का एक बड़ा वर्ग यानि 46.9 प्रतिशत बुजुर्ग इन हालातों को स्वतंत्र रूप से अपना जीवन जीने के तौर पर भी देख रहा है। इसी पॉज़िटिव सोच के चलते उम्रदराज लोग अकेले रहकर भी अपने जीवन से खुश हैं । इस स्टडी के मुताबिक 31 फीसदी के ज्यादा बुजुर्गों ने फाइनेंशियल और सोशल स्वतंत्रता के लिए अकेले रहने का विकल्प चुना है। वहीं 26.7 फीसदी का कहना है कि परिवार के युवा मेम्बर्स के बाहर जाने से वे अकेले रह रहे हैं। नयी पीढ़ी के दूर जाने को लेकर कोई शिकायत करने के बजाय बुजुर्ग इसे इंडिपेंडेट रहने के अवसर की तरह देखने लगे हैं। शारीरिक रूप से नहीं भावनात्मक फ्रंट पर भी बुजुर्ग अब दूसरों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। उम्रदराज लोगों के लिए यह स्वतन्त्रता उनके सुकून से भी जुड़ी है।

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