Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

मानवता के लिए जीवनदायी बहता खून रोकने की तकनीकें

चोट से जख्मी लोगों, युद्ध में घायल सैनिकों व बीमारी आदि में रक्तस्राव के रोगियों की खून बहकर मौत होना हजारों साल तक मृत्यु का प्रमुख कारण रहा। वजह थी बहते हुए रक्त को रोकने की प्रभावी तकनीक नहीं होना।...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

चोट से जख्मी लोगों, युद्ध में घायल सैनिकों व बीमारी आदि में रक्तस्राव के रोगियों की खून बहकर मौत होना हजारों साल तक मृत्यु का प्रमुख कारण रहा। वजह थी बहते हुए रक्त को रोकने की प्रभावी तकनीक नहीं होना। यदि खून को बहने से रोक लिया जाए तो जटिल सर्जरी में जोखिम कम हो जाता है। जान बचने की संभावना बढ़ जाती है। पिछले 200 सालों में खून बहने की 100 से ज्यादा तकनीकें विकसित की गई हैं जो क्रांतिकारी उपलब्धि है।

बहते हुए खून को रोक पाना मेडिकल साइंस की एक ऐसी उपलब्धि थी, जिसने न सिर्फ इलाज की तकनीक बदली बल्कि मानव सभ्यता की सर्जरी, युद्ध-चिकित्सा, प्रसव-चिकित्सा और आपातकालीन चिकित्सा- सबको नई उम्र दे दी। अगर इसे ‘कितनी बड़ी उपलब्धि’ के रूप में आंकें, तो यह एंटीबायोटिक की खोज और एनेस्थीसिया (बेहोशी की दवा) के साथ मेडिकल इतिहास की टॉप-3 गेमचेंजर उपलब्धियों में गिनी जा सकती है। वजह खून बहकर मौत होना हजारों साल तक मानव मृत्यु का सबसे तेज़ और सबसे बड़ा कारण रहा।

बहता खून रोकने की क्रांतिकारी तकनीक

Advertisement

आज हमें लगता है कि कट लग गया तो पट्टी,टांका या दवा हो जाएगी। लेकिन इतिहास में लंबे समय तक मामूली घाव भी घातक रक्तस्राव बन जाता था। सदियों तक प्रसव में रक्तस्राव महिलाओं की मौत का प्रमुख कारण था। युद्ध में घायल सैनिक ज्यादातर खून बह जाने के कारण मरते थे। क्योंकि खून रोकने की क्षमता कमजोर थी। खून रोक पाने का मतलब था, मौत के मुंह से मरीज को वापस लाना। इसीलिए यह उपलब्धि क्रांतिकारी थी? क्योंकि रक्तस्राव रुकते ही जटिल सर्जरी भी संभव हो गयी जबकि जब तक खून रोकने की विश्वसनीय तकनीक नहीं थी, तब तक पेट, छाती, हड्डी, नसों की सर्जरी बहुत जोखिम भरी थी।

Advertisement

युद्ध के मैदान में चिकित्सा सुविधाएं

यूरोप में 14वीं और 15वीं शताब्दी में औसत उम्र 30 साल होती थी, आज करीब 85 साल है। एशिया के जिस देश ने सबसे खूंखार और बर्बर युद्ध लड़े उस जापान में आज औसत उम्र 90 से ज्यादा है। प्राचीनकाल में युद्धों में 90 से 95 फीसदी तक मौतें युद्ध के मैदान में ही हो जाती थीं और उसका कारण यह होता था कि घायल होने के बाद उन सैनिकों का खून बहुत तेजी से बह जाता था। यूरोप में 15वीं, 16वीं शताब्दी में ज्यादातर सैनिक तलवार घोंपने से मारे जाते थे और तलवार घोंपने और मरने के बीच का अंतराल औसत महज 3 घंटे होता था। आज घायल सैनिक 10-10 दिन तक जिंदगी और मौत से लड़ सकते हैं। क्योंकि आज युद्ध के मैदानों में भी इतनी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं कि युद्ध लड़ते हुए भी सैनिक अकाल मौत न मरें।

चिकित्सा में तामझाम की उपयोगिता

जैसा कि हम सब जानते हैं आज की तारीख में चिकित्सा एक बड़े तामझाम वाली प्रक्रिया बन गई है और यह किसी दिखावट का हिस्सा नहीं है, यह जरूरत है। चिकित्सा में तामझाम बढ़ने का मतलब है अधिक से अधिक जीवन की सुनिश्चितता प्रदान करने वाली तकनीकों को एक साथ इस्तेमाल करना। लेकिन युद्ध के मैदान में आज भी वो तमाम चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकतीं, जो किसी मल्टीस्पेशलिस्ट हॉस्पिटल में उपलब्ध होती हैं या कि ट्रॉमा सेंटर में। युद्ध के मैदान में आज भी देसी अंदाज में कहा जाए तो ‘जुगाड़ से काम चलता है’। लेकिन आज उस तरह जुगाड़ इस्तेमाल नहीं होते, जैसे कुछ शताब्दियों पहले होते थे, शायद इसीलिए आविष्कारों के नजरिये से चिकित्सा, उतनी उर्वर नहीं है, जितनी पहले हुआ करती थी। बहरहाल यह एक लंबी गाथा है। इसलिए बहते खून का रुक जाना एक तरह से बड़ा जीवनदान बन गया है।

हादसे में तुरंत रक्तस्राव रोकना महत्वपूर्ण

ये सिर्फ युद्धों की बात नहीं है। आज भी दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं में जितनी मौतें होती हैं, उनमें से 50 फीसदी से ज्यादा के पीछे ज्यादा खून का बह जाना ही कारण होता है। चिकित्सा विज्ञान को 300 साल पहले ही यह पता चल गया था कि जीवन बचाने के लिए बहते खून को न सिर्फ रोकना बहुत जरूरी है बल्कि जितना जल्दी इसे रोका जाए, उतना अच्छा है। शायद इसीलिए डॉक्टर दुर्घटना में घायलों के लिए उनके पहले घंटे को गोल्डन ऑवर कहते हैं।

बैंडेज जैसी कई उन्नत तकनीकें

यदि दुर्घटना में चोट लगने पर पहले घंटे के दौरान फर्स्ट एड के जरिये खून को बहने से रोक लिया जाए तो जान बचने की संभावना 70 फीसदी हो जाती है। पिछले 200 सालों में खून बहने की 100 से ज्यादा तकनीकें विकसित की गई हैं। उन्हीं का नतीजा है कि आज भारत जैसे देश में खून बहने से रोकने की एक ऐसी तकनीक है, जो महज 30 सेकेंड में यह कारनामा करके दिखाती है। बहते खून को आज भारत में विकसित हुई एक बैंडेज तकनीक के जरिये महज आधे घंटे में रोका जा सकता है।

बैंडेज तकनीक के अलावा भी दुनिया में आज बहते खून को रोक देने की चिकित्सा विज्ञान के पास दर्जनों कामयाब तकनीकें हैं, जिससे 5 मिनट से लेकर 15 मिनट तक में बड़ा से बड़ा रक्तस्राव रुक जाता है। इससे घायल व्यक्ति का बचना आसान हो जाता है। लेकिन यह तकनीक इंसान को शायद कभी न मिलती, अगर उसने खून खराबे का लंबा जीवन न जिया होता। - इ.रि.सें.

Advertisement
×