मौजूदा दौर में भी प्रासंगिक भारतीय ज्ञान प्रणाली
भारत की आत्मा ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की आशा है भारतीय ज्ञान प्रणाली । यह जीवन के हर पक्ष को समग्र दृष्टि से देखने का मार्ग प्रदान करती है। इसे केवल धरोहर न मानकर, शिक्षा, अनुसंधान और नीति-निर्माण...
भारत की आत्मा ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की आशा है भारतीय ज्ञान प्रणाली । यह जीवन के हर पक्ष को समग्र दृष्टि से देखने का मार्ग प्रदान करती है। इसे केवल धरोहर न मानकर, शिक्षा, अनुसंधान और नीति-निर्माण का अंग बनाया जाना चाहिये। इससे न केवल देश आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि यह विश्व का भी संतुलित, मानवीय और सतत विकास के लिए मार्गदर्शन करेगी।
भारत केवल एक देश व एक राजनीतिक इकाई ही नहीं, बल्कि एक सभ्यता है, एक संस्कृति है, एक जीवन-दृष्टि है और इस जीवन-दृष्टि की आत्मा है—भारतीय ज्ञान प्रणाली। दरअसल, गोंडवाना भूभाग में से भारत केवल एक भौगोलिक इकाई बनकर नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता बनकर दुनिया के सामने आया है, जिसकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी भारतीय ज्ञान प्रणाली यानी इंडियन नॉलेज सिस्टम (आईकेएस) में समाहित हैं। यह ज्ञान प्रणाली जीवन के हर पक्ष—दर्शन, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, कला, संस्कृति और नैतिक मूल्यों—को समग्र दृष्टि से देखने का मार्ग प्रदान करती है। भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल पुस्तकों में लिखा ज्ञान नहीं है। यह वह ज्ञान है, जो वेदों की ऋचाओं में गूंजता है, उपनिषदों के चिंतन में झलकता है, गीता के कर्मयोग में दिशा देता है और रामायण-महाभारत के चरित्रों में जीवन बनकर उतरता है। यह ज्ञान हमें बताता है कि मनुष्य कौन है, उसका उद्देश्य क्या है और उसका कर्तव्य क्या है?
वेद, उपनिषद व पुराण हैं आधार
भारतीय ज्ञान प्रणाली का आधार वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, स्मृतियां, पुराण और दर्शनशास्त्र हैं। ऋग्वेद से लेकर अथर्ववेद तक प्रकृति, मानव जीवन और ब्रह्मांड के बीच गहरे संबंध को समझने का प्रयास दिखाई देता है। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा की एकता का विचार आज भी मानवता को आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। आधुनिक युग में ज्ञान का अर्थ अक्सर केवल डिग्री, नौकरी या तकनीकी कौशल तक सीमित हो गया है, लेकिन भारतीय ज्ञान प्रणाली कहती है ज्ञान वह है, जो मनुष्य को अहंकार से विनम्रता, स्वार्थ से सेवा, और भोग से योग की ओर ले जाए। इसीलिए हमारे शास्त्र कहते हैं— ‘सा विद्या या विमुक्तये’। अर्थात वही विद्या है, जो हमें बंधनों से मुक्त करे।
वैश्विक स्वीकार और प्रासंगिकता
विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत की प्राचीन उपलब्धियां विश्व को आश्चर्यचकित करती हैं। शून्य और दशमलव प्रणाली, आर्यभट्ट द्वारा पृथ्वी के घूर्णन का सिद्धांत, भास्कराचार्य की गणितीय खोजें, तथा सुश्रुत और चरक द्वारा विकसित आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति आज भी प्रासंगिक हैं। संयुक्त राष्ट्र में जब अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है, तो यह केवल एक कार्यक्रम नहीं होता, यह भारत की ज्ञान-परंपरा का वैश्विक स्वीकार होता है। योग और ध्यान न केवल शारीरिक स्वास्थ्य, बल्कि मानसिक संतुलन और आत्मिक शांति के साधन के रूप में वैश्विक पहचान बना चुके हैं।
गुरुकुल प्रणाली में चरित्र निर्माण अहम
भारतीय शिक्षा प्रणाली में गुरुकुल परंपरा ज्ञान के साथ-साथ चरित्र निर्माण पर बल देती थी। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार, नैतिक और संवेदनशील नागरिक का निर्माण था। यह दृष्टिकोण आज की प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा व्यवस्था के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। कला, साहित्य और संस्कृति में भारतीय ज्ञान प्रणाली की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश
संस्कृत, तमिल, पाली और प्राकृत जैसी भाषाओं में रचित ग्रंथों ने न केवल भारत, बल्कि एशिया के कई देशों की सभ्यताओं को प्रभावित किया। नाट्यशास्त्र, संगीत, चित्रकला और स्थापत्य कला में निहित सौंदर्यबोध आज भी हमारी सांस्कृतिक पहचान को सशक्त बनाता है। आज के वैश्विक संदर्भ में, जब दुनिया पर्यावरण संकट, मानसिक तनाव और नैतिक मूल्यों के क्षरण से जूझ रही है, भारतीय ज्ञान प्रणाली ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और सह-अस्तित्व का संदेश देकर समाधान प्रस्तुत करती है।
शिक्षा की जड़ें सभ्यता में तलाशें
मैकॉले की शिक्षा ने हमें केवल नौकरी के योग्य बनाया, लेकिन भारतीय ज्ञान प्रणाली हमें जीवन के योग्य बनाने वाली है। असल में, डिग्रीधारी लेकिन दिशाहीन युवा, अपनी संस्कृति से कटा हुआ समाज, रचनात्मकता की कमी, मानसिक तनाव और प्रतियोगिता का दबाव, आज हर परिवार में चिंता का विषय है और पारिवारिक ढांचा भी चुनौतियों से जूझ रहा है। यदि भारत को आत्मनिर्भर, संवेदनशील और विश्वगुरु बनना है, तो शिक्षा की जड़ें अपनी सभ्यता में ही तलाशनी होंगी।
विज्ञान से सामंजस्य व मानव कल्याण
भारतीय ज्ञान प्रणाली आधुनिक विज्ञान के विरोध में नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य बनाकर मानव कल्याण की दिशा दिखाती है। आज की शिक्षा हमें प्रतियोगी बनाती है, लेकिन भारतीय ज्ञान प्रणाली सहयोगी बनाती है। भारतीय ज्ञान प्रणाली विचारों का शोषण नहीं, संरक्षण सिखाती है। यह प्रतिस्पर्धा नहीं, सह-अस्तित्व सिखाती है। यही कारण है कि यह केवल भारत की आत्मा ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की आशा है। अतः समय की मांग है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को केवल अतीत की धरोहर न मानकर, उसे शिक्षा, अनुसंधान और नीति-निर्माण का अभिन्न अंग बनाया जाए। इससे न केवल भारत आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि विश्व को भी एक संतुलित, मानवीय और सतत विकास का मार्ग प्रदान करेगी।
-लेखक सिरसा स्थित चौधरी देवीलाल विवि के कुलसचिव हैं।

