फिल्म ‘बरसात’ के बाद बॉलीवुड के ग्रेट शोमैन राज कपूर ने आरके स्टूडियो में होली मनाना शुरू किया था जो यादगार बन गयी। उस आयोजन में फिल्म जगत की लगभग सभी प्रमुख हस्तियां शामिल होतीं। रंग के टैंक में डुबकी, मिठाई-ठंडाई, नाच-गाना और चुहलबाजी - होली मनाने का वो आत्मीयता भरा अंदाज एकदम जुदा था।
बॉलीवुड के ग्रेट शोमैन राज कपूर ने साल 1948 में मुंबई में आरके स्टूडियो की स्थापना की थी , जो हिंदी फिल्म उद्योग का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। लेकिन इन दिनों वह भव्य आरके स्टूडियो धूल में मिल चुका है। बिल्डरों के हाथों बिक चुकी चेंबूर स्थित इस भव्य इमारत ने अपने अंदर ढेरों सुखद यादें समेट रखी हैं। उनमें से ही एक है आरके की चर्चित होली। कभी एक मुलाकात के दौरान बुजुर्ग हो चुके राज साहब के बड़े बेटे रणधीर कपूर ने उन्हीं यादों को शेयर किया था। पेश हैं होली के खास मौके पर उसी के कुछ अंश उन्हीं की जुबानी-
जेहन में हैं अमिट यादें
इस 2 जून को पापा को गए हुए 34 साल से ज्यादा हो जाएंगे। पर उनकी यादें मेरे जेहन में अमिट हैं। मैं उनका सर्वाधिक दुलारा बेटा था, एकमात्र ऐसा बच्चा, जो उनकी चीजों का इस्तेमाल कर सकता था। कोई भी त्योहार आते ही उनकी यादें बहुत कचोटती हैं।
होली मनाने का अंदाज था जुदा
होली, दीवाली, गणपति उत्सव — हर त्योहार को वह भव्य ढंग से मनाते थे, ईद, क्रिसमस जैसे पर्व भी। लेकिन होली मनाने का उनका अंदाज एकदम जुदा था। उस दौर के मेरे कई मित्र आज भी आरके की होली को शिद्दत से याद करते हैं।
आरके में शुरुआत हुई ‘बरसात’ के बाद
मेरी उम्र तब शायद तीन या चार साल रही होगी, जब उन्होंने फिल्म ‘बरसात’ की शानदार सफलता के बाद आरके में होली मनाने का रिवाज शुरू किया था। पहले इस होली में फैमिली फ्रेंड और करीबी दोस्त शामिल होते, मगर बाद में पापा जी ने इंडस्ट्री के कई परिचित लोगों को बुलाना शुरू कर दिया था। अमूमन उनकी होली सुबह 11 बजे से शाम चार बजे तक चलती थी। महिलाओं के साथ सिर्फ सूखे रंग से शालीनता के साथ होली खेली जाती थी। उन सबके ख्याल रखने की जिम्मेदारी मम्मी पर थी। हम बच्चों की भी टोली होती थी, अमूमन शम्मी चाचू हमारा ख्याल रखते थे। तब होली मनाने में जो जोश था, वह अब न के बराबर मिलता है। कभी यहां की होली में छोटा-बड़ा कलाकार शरीक होता था।
वो मस्ती, हुड़दंग शायद ही वापस आए
पापा जी की मृत्यु के दो साल पहले तक आरके में होली की रौनक बदस्तूर कायम थी। मुझे याद है, पापा जी अस्थमा से पीड़ित थे, फिर भी वह हमेशा पूरी तरह से रंग में डूबे रहते थे। बाद में जब उन्हें बहुत तकलीफ होने लगी, तो हमने आयोजन बंद कर दिया। अब वह मस्ती, वह हुड़दंग हमारी होली में शायद ही वापस आ पाए।
रंग के टैंक में डुबकी, मिठाई और नृत्य-संगीत
आरके की होली में रंगों से भरा एक बड़ा टैंक होता था। यहां आकर ज्यादातर मेहमान इसमें डुबकी लगाते थे। पापा जी, शंकर, जयकिशन, मुकेश, शैलेंद्र और हसरत जयपुरी मस्ती में इसमें बैठे रहते थे। पापा जी तरन्नुम में होने के बावजूद हर छोटे-बड़े मेहमान से गले मिलते थे। नमकीन और मिठाइयां परोसी जाती थीं। खास ठंडाई होती थी। चुहल-बाजी, नृत्य-संगीत का दौर भी चलता रहता था। शास्त्रीय नृत्यांगना सितारा देवी पापा जी की होली का एक बड़ा आकर्षण होती थीं।
रूठे दोस्तों को मनाने का इंतजार...
तब हम होली का इंतजार करते थे, ताकि उस दिन अपने कुछ रूठे हुए दोस्तों को मना सकें। हमारे सीनियर भी इसी बात का इंतजार करते थे। एक बार किसी फिल्म के सेट पर प्राण जी की शम्मी चाचू से कुछ कहा-सुनी हो गई थी। दोनों की बातचीत बंद थी। पापा जी ने शम्मी चाचू को समझाया। बस, होली के मौके पर शम्मी चाचू ने प्राण अंकल को रंग लगाकर गिले-शिकवे दूर किये।

