अभिनेता धर्मेंद्र ने अपने कार्यकाल में सैकड़ों फिल्मों में अभिनय किया व विविध भूमिकाएं की। 1960 में एक्टिंग की शुरुआत दिल भी तेरा हम भी तेरे फिल्म से की। ‘बंदिनी’ से लेकर ‘अनुपमा’, ‘सत्यकाम’, ‘चुपके-चुपके’, ‘नीला आकाश’, ‘आई मिलन की बेला’ व ‘शोले’ जैसी कई यादगार फिल्में की।
अभी एक साल पहले भी उनसे यानी अभिनेता धर्मेंद्र से एक संक्षिप्त बातचीत हुई थी,उन दिनों भी वे थोड़ा अस्वस्थ चल रहे थे। वैसे पत्रकारिता के इन वर्षों में अक्सर उनसे मिलना हो जाता था। उनकी व्यवहार कुशलता के बारे में अब नये सिरे से कुछ बताना बेमानी होगा। उनकी सहृदयता सर्वविदित थी। पेश हैं उनसे जुड़ी कुछ यादें उन्हीं की जुबानी...
इस सफर की ढेरों यादें हैं...
देखते-देखते 60 साल से ज्यादा हो गए फिल्म जगत में आए। इन 55 साल में बहुत सारी खूबसूरत यादें जुड़ी। बुरी यादों का जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। पर हां, फुर्सत में कुछ घटनाएं याद करना अच्छा लगता है। सामने वाला यदि कुछ गलत बोल भी गया,तो मैंने धैर्य क्यों नहीं रखा। खैर, इस दौरान कितने उम्दा निर्देशकों के साथ काम किया है। बिमल राय, हृषिकेश मुखर्जी, असित सेन, राजेंद्र भाटिया, सत्येन बोस, जे.ओमप्रकाश, ओपी रल्हन, अर्जुन हिंगोरानी, रामानंद सागर, राज खोसला, बीआर चोपड़ा, राजेंद्र सिंह बेदी, मोहन सहगल, रमेश सिप्पी, विजय आनंद, जेपी दत्ता, अनिल शर्मा आदि किन-किन निर्देशकों के नाम बताऊं। फिल्में भी लगभग ढाई सौ हो चुकी होंगी। ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ मेरी पहली फिल्म थी। बिमल दा की ‘बंदिनी’ ने पहली बार संतुष्टि दी फिर तो सफर सिर्फ आगे बढ़ता रहा। कभी डॉक्टर बना तो कभी मवाली का रोल। कभी कवि तो कभी सत्यवादी आम आदमी। अनगिनत किरदार, ढेरों चेहरे। सब इन निर्देशकों की मेहरबानी थी। ‘बंदिनी’, ‘अनुपमा’, ‘सत्यकाम’, ‘चुपके-चुपके’, ‘फूल और पत्थर’, ‘काजल’, ‘मझली दीदी’, ‘नीला आकाश’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘आंखें’, ‘चरस’, ‘मेरा गांव मेरा देश’, ‘कर्तव्य’, ‘शोले’, ‘चुपके-चुपके’, ‘हुकूमत’ आदि कितनी फिल्में गिनाऊं। मुझे तो वे निर्देशक याद हैं,जिन्होंने धरम सिंह देओल को आपका धर्मेंद्र बनाया।
बिमल दा, माछेर झोल और भात
ऐसे में सबसे पहले बिमल दा बिमल राय का नाम जेहन में आता है। यह शायद 1963 की बात है। तब तक मेरी चार-पांच फिल्में रिलीज हो चुकी थी। बिमल दा ने मुझे अपनी फिल्म ‘बंदिनी’ के लिए याद किया। छोटे-से स्क्रीन टेस्ट के बाद उन्होंने मुझे साइन कर लिया। फिर वह बोले- माछेर झोल और भात खाओ। पर कांटे होने की वजह से मछली से मैं दूर भागता था। मैं संकोच महसूस कर रहा था। पर तभी मेरी नजर गुलजार पर पड़ी जो पास ही बैठे माछेर झोल और भात का आनंद ले रहे थे। मुझे लगा यह तो मेरी तरफ का बंदा है। यह इतने आराम से मछली-चावल खा सकता है, तो भला मैं क्यों नहीं। मैंने उस दिन मछली चावल का आनंद का लिया। लेकिन बिमल दा से मैंने सिर्फ माछेर झोल और भात ही खाना नहीं सीखा। वह पहले ऐसे फिल्मकार थे, जिन्होंने मेरे अंदर के एक्टर को बहुत कुछ सिखाया, जो भविष्य में मेरे बहुत काम आई।
हेड मास्टर हृषि दा
हृषि दा के साथ मैंने कई फिल्में की। अपनी इन सारी फिल्मों पर मुझे गर्व है। इन फिल्मों में दर्शकों ने एक नए धर्मेन्द्र को देखा। अनुपमा, सत्यकाम, चुपके-चुपके, मझली दीदी, गुड्डी...हृषि दा के साथ की अपनी किन-किन फिल्मों के नाम बताऊं। मुझे तो उनके साथ की अपनी सारी फिल्में पसंद हैं पर इनमें ‘सत्यकाम’ मेरे दिल के बहुत करीब है। यह फिल्म आज के संदर्भों में प्रासंगिक है। हृषि दा हम जैसे ज्यादा एक्टर्स के लिए हेड मास्टर की तरह थे। उनके सेट पर सब सिर्फ अच्छी कोशिश करते थे, इसके बाद किसी को कुछ कहने का साहस नहीं होता था। हम उनसे सवाल कम ही पूछते थे। एक बार शॉट होने के बाद दोबारा कोई शॉट लेने का ख्याल हमारे जेहन में आता भी था, तो वह बस इतना कहते थे-धरम मैंने अपने ढंग से शॉट ओके कर दिया है। अब यदि तुम इससे संतुष्ट नहीं हो, तो अपने ढंग से इसे ले सकते हो। मैं तो फिर भी शॉट के बारे में कुछ पूछ लेता था, अमित तो हमेशा संकोच करता रहता था। पर हृषि दा जैसे दिल के अच्छे आदमी मैंने बहुत कम देखे हैं।
मेरा दोस्त मनोज
यूं तो अर्जुन हिंगोरानी, ओपी रल्हन, राजकुमार कोहली आदि कई निर्देशक मेरे अच्छे दोस्त थे। पर एक्टर और उम्दा निर्देशक मनोज कुमार मेरे स्ट्रगल पीरियड का दोस्त था। असल में हमारी दोस्ती तब की है, जब दोनों ही भयंकर स्ट्रगल के दौर से गुजर रहे थे। इस स्ट्रगल में एक दौर ऐसा भी आया, जब मैं हताश होकर अपने घर लौट जाने का मन बना चुका था। तब मनोज ने मुझे बहुत अच्छी तरह से संभाला। क्योंकि वह उस समय थोड़ा-बहुत कमाने लगा था। उसी आर्थिक ताकत के बलबूते उसने न सिर्फ मुझे घर लौटने नहीं दिया, बल्कि मेरे घर में कुछ पैसे बराबर भेजता रहा। बताइए, ऐसे दोस्त को कौन भूलता है। हमारी दोस्ती के ऐसे ढेरों किस्से हैं।
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