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रहस्यों का आलिंगन करती अघोरियों की दुनिया

अधिकांश लोग नहीं जानते कि ये साधु अघोरी बनने के लिए कठिन साधना करते हैं। उनका उद्देश्य मानवता को लाभ पहुंचाना और जनकल्याण करना होता है। मोह-माया से दूर इनकी अपनी दुनिया है। जहां पर जीवन खत्म होता है,...

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प्रतीकात्मक चित्र
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अधिकांश लोग नहीं जानते कि ये साधु अघोरी बनने के लिए कठिन साधना करते हैं। उनका उद्देश्य मानवता को लाभ पहुंचाना और जनकल्याण करना होता है। मोह-माया से दूर इनकी अपनी दुनिया है। जहां पर जीवन खत्म होता है, वहां से ही इनकी दुनिया शुरू होती है।

अघोरी साधु, यह नाम सुनते ही आंखों के सामने राख से लिपटे असामान्य से, डरावने व्यक्ति की छवि घूम जाती है। जिसके हाथ में मानव खोपड़ी है और जो शमशान घाट में बैठा तंत्र साधना कर रहा है। ऐसा जो कापालिक क्रिया करता है, जो अपने शरीर पर मुर्दे की भस्म लगाए रहता है, नरमुंडों की माला पहनता है और अजीब तरह के तंत्र-मंत्र करने में संलग्न रहता है। लेकिन अधिकांश लोग नहीं जानते कि ये साधु अघोरी बनने के लिए कठिन साधना करते हैं। उनका उद्देश्य मानवता को लाभ पहुंचाना और जनकल्याण करना होता है। मोह-माया से दूर इनकी अपनी दुनिया है। जहां पर जीवन खत्म होता है, वहां से ही इनकी दुनिया शुरू होती है।

अघोर यानी ‘उजाले की ओर’

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अघोरी शब्द संस्कृत के अघोर से आया है, जिसका अर्थ है ‘उजाले की ओर’। जो सरल हो, जो किसी तरह का भेदभाव नहीं करता, जिसके लिए कुछ भी बुरा न हो। लेकिन अघोरी सिर्फ उनका नाम नहीं, एक जीवन शैली है। अघोरी साधु मानते हैं कि शिव का हर रूप, चाहे वह कितना ही असामान्य क्यों न हो, पवित्र है।

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आदियोगी से शुरुआत

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव इस ब्रह्मांड में अघोरी का जीवन जीने वाले पहले व्यक्ति थे। उनके अघोर जीवन का महत्व विभिन्न महाकाव्यों में पाया जाता है जिसमें भगवान शिव के जीवन और उनके जीवन की प्रकृति का वर्णन किया गया है। उन्होंने अपने शरीर को ढकने के लिए श्मशान की राख का भी इस्तेमाल किया, वे घने जंगल में भी रहते थे और वे गहन ध्यान की कला का प्रदर्शन करते थे। जिसके कारण उन्हें आदियोगी भी कहा जाता है। जब भगवान शिव आदिशक्ति, जिन्हें माता पार्वती या माता सती के नाम से भी जाना जाता है, के साथ एक हो गए तो उन्हें माता पार्वती से विवाह करने के लिए अपने अघोरी स्वभाव का त्याग करना पड़ा। अघोरी साधुओं को शिव का रूप कहा जाता है। शिवजी के पांच रूपों में से अघोर एक रूप है।

सोच और कल्पना से परे

अघोरी साधुओं की दुनिया सामान्य व्यक्ति की सोच और कल्पना से परे है। यहां सब कुछ असामान्य है। यहां समाज के हर नियम को तोड़ा जाता है और ये शिव और शक्ति के अद्वितीय भक्ति मार्ग की साधना होती है। अघोर दर्शन का सिद्धांत है कि आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करने के लिए ईश्वर की प्राप्ति करने के लिए तो शुद्धता के नियमों से दूर जाना पड़ेगा। अघोरी अच्छाई और बुराई के सामान्य नियमों को खारिज करते हैं। उनका अध्यात्म का तरीका थोड़ा अलग है। अघोरियों का मानना है कि वे दूसरों की ओर से त्यागी गई चीजों का सेवन कर परम चेतना को प्राप्त करते हैं। एक ऐसी परंपरा हैं जो मृत्यु, अंधकार और रहस्यों को आलिंगन करती है। अघोरी परंपरा केवल तांत्रिक क्रियाओं का मिश्रण नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है। इस यात्रा का उद्देश्य है जीवन और मृत्यु के भेद को मिटाकर मोक्ष की प्राप्ति करना।

सृष्टि की हर वस्तु में समान भाव

अघोरी बनने की पहली शर्त है संसार में जो कुछ है, उसे समान भाव से देखना व अपने मन से घृणा और भय को निकालना। अघोर साधना व क्रिया व्यक्ति को सहज और सरल बनाती है। जो शमशान जैसी भयावह जगह पर सहजता से रह सके, वही अघोरी कहलाता है। शिव के इस अघोर रूप की साधना करने वाले साधु समाज की परंपराओं और नियमों से पूरी तरह अलग जीवन जीते हैं। अघोरी साधु का जीवन समाज की धारणाओं के ठीक विपरीत होता है, वे आम लोगों की तरह भोजन नहीं करते, बल्कि मानव वर्जित खाद्य खाते हैं। वे मानव खोपड़ी जिसे कपाल कहा जाता है, उसमें भोजन करते हैं। यह देखकर सभ्य समाज के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके लिए कोई चीज अपवित्र नहीं होती। को सभी चीजों में सुंदरता और चमक दिखाई देती है इसीलिए, जो उनके अनुयायी हैं, उन्हें उनसे डर नहीं लगता।

जहां सब बराबर हैं...

अघोरी अकसर श्मशान में रहते हैं। वे मानते हैं कि श्मशान एक ऐसा स्थान है जहां अच्छा, बुरा सब बराबर हो जाता है। चाहे राजा हो या रंक, चोर हो या भिखारी, सभी एक समान और एक ही अग्नि के बीच शरीर का आत्मा से विच्छेदन करते हैं। इसीलिए हमेशा अपने शरीर पर श्मशान की राख लगाते हैं।

गुरु से सीख

अघोरी बनने के लिए, संप्रदाय के प्रत्येक सदस्य को कम से कम 12 साल तक किसी निजी गुरु से सीखना पड़ता है। इस प्रक्रिया में श्मशान घाट में कई सालों की कड़ी साधना करनी पड़ती है। पहला चरण सामाजिक संबंधों का त्याग होता है जिसमें अपने परिवार, समाज या रिश्तेदारों से सभी संबंध तोड़ने होते हैं। वे शवों के बीच मंत्रों का जाप और गहन ध्यान का भी अभ्यास करते हैं। उनका मानना है कि प्रत्येक मानव जन्मजात रूप से अघोर अर्थात सहज होता है। अपने माता-पिता और समाज के कहने पर ही उनमें अंतर करना शुरू करता है।

वैमनस्य का त्याग

अघोरियों के शब्दकोश में अपवित्र, उत्तेजक या शत्रुता फैलाने वाले शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं है। वे किसी को भी वैमनस्य फैलाते हुए देखना पसंद नहीं करते। उनका मार्ग मैत्री, करुणा, एक-दूसरे के भीतर प्रेम देखना है। अघोरी अपने शरीर और मन को शुद्ध करने और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक आम आदमी की तरह योग करते हैं। अघोरी हठ योग और कुंडलिनी योग सहित योग के विभिन्न रूपों का भी अभ्यास करते हैं। उनका जीवन किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं होता, क्योंकि संसार के नहीं तो अपने नियमों का तो उन्हें पालन करना ही होता है। बहुत तप और अनुष्ठान करने के बाद ही वे उच्च सिद्धियां और एक-एक कर तीन अवस्थाएं प्राप्त करते हैं। पहली अवस्था जब साधक दीक्षा लेता है तो वह औघड़ कहलाता है। दूसरी अवस्था जब साधना में सभी सिद्धियों को पा लेता है तो अघोरी बन जाता है और अंतिम व तीसरी अवस्था जब साधक सिद्धियों से आगे निकलकर शिव को पा लेता है तो वह परमहंस कहलाता है।

सत्य के ‘प्रतीक’ की पवित्रता में विश्वास

अघोरियों को खोपड़ी बहुत प्रिय होती है, क्योंकि उनका तप खोपड़ी से ही पूरा होता है। इंसानी खोपड़ी सत्य का प्रतीक है। अघोरियों के द्वारा खोपड़ी धारण करने के पीछे भगवान शिव से जुड़ी हुई एक प्रचलित कथा भी है। अघोरी खोपड़ी को एक प्रतीक मानते हैं जो उन्हें संसार की नश्वरता और मृत्यु का स्मरण कराता है। इसे खाने, पीने और अनुष्ठान अभ्यास के लिए एक कटोरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसे एक अनुस्मारक के रूप में देखा जाता है कि सब कुछ सुंदर और शुद्ध है, क्योंकि शिव, विनाश के हिंदू देवता, हर चीज में मौजूद हैं। अघोरी के लिए मानव खोपड़ी एक बहुत ही पवित्र वस्तु है। आमतौर पर, साधना के लिए इस्तेमाल की जाने वाली खोपड़ी या मुंड को साधक और उसके शिष्यों के अलावा किसी और को नहीं छूना चाहिए। इसे अपने पुराने रूप और ऊर्जाओं से मुक्त करने और अपने व्यक्तिगत भिक्षा पात्र के रूप में पुनर्जीवित करने के लिए कपाल मोक्ष साधना अनुष्ठान किया जाता है।

हिमालय के प्राकृतिक परिवेश, उसकी नदियां, पहाड़ और जंगल भी अघोरियों की आध्यात्मिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो ध्यान के स्रोत और अनुष्ठान करने के लिए एक स्थान दोनों के रूप में कार्य करते हैं। - लेखिका ‘श्मशानवासी अघोरी’ नामक पुस्तक की रचयिता हैं।

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