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फूड नॉइज़ यानी दिमाग में हर वक्त की भूख

भोजन के बारे में विचार लगातार दिमाग में चलते हैं तो यह स्थिति फूड नॉइज़ कहलाती है। यह स्थिति अक्सर परेशानी की वजह बन जाती है। यह केवल ‘भूख’ लगने जैसा नहीं है। सोच की ये शृंखला आपको हर...

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भोजन के बारे में विचार लगातार दिमाग में चलते हैं तो यह स्थिति फूड नॉइज़ कहलाती है। यह स्थिति अक्सर परेशानी की वजह बन जाती है। यह केवल ‘भूख’ लगने जैसा नहीं है। सोच की ये शृंखला आपको हर समय खाने या विशिष्ट खाद्य पदार्थों की लालसा के बारे में बताती रहती है। माइंडफुल ईटिंग यानी खाते समय भोजन पर व उसके स्वाद पर ही ध्यान देना इस पर काबू पाने में सहायक है।

 

‘फूड नॉइज़’ चिकित्सा और पोषण जगत का एक नया शब्द है जो हाल ही में चर्चा का विषय बना है। विशेषकर यह ओजेंपिक या वेगोवी जैसी वजन घटाने वाली दवाओं के उदय के बाद पॉपुलर हुआ है।

फूड नॉइज़ क्या है?

जब आपके दिमाग में बार-बार लगातार सिर्फ भोजन की बातें गूंजने लगती हैं या कभी व्हाट्सएप, कभी यूट्यूब या कभी इंस्टाग्राम अथवा फेसबुक के माध्यम से अच्छे-बुरे फूड, नए-पुराने फूड या पौष्टिक-जंक फूड की चर्चा आपके जेहन में पहुंचाई जाती हैं तो यह सिचुएशन फूड नॉइज़ कहलाती है। फूड नॉइज़ का अर्थ है भोजन के बारे में लगातार, घुसपैठ करने वाले और अक्सर परेशान करने वाले विचार। यह केवल ‘भूख’ लगने जैसा नहीं है। यह मन में चलने वाली एक ऐसी रेडियो फ्रीक्वेंसी की तरह है जो आपको हर समय खाने, अगले भोजन की योजना बनाने या विशिष्ट खाद्य पदार्थों की लालसा के बारे में बताती रहती है।

फूड नॉइज़ के मुख्य लक्षण

फूड नॉइज़ के कुछ प्रमुख लक्षण ये हैं : पेट भरा होने के बावजूद भोजन के बारे में सोचना। हर वक्त भोजन की योजना बनाना, जैसे रात के खाने में क्या होगा? या कल दोपहर क्या खाएंगे? इस तरह के विचारों का बार-बार आना। खाने पर नियंत्रण की कमी। खाने की इच्छा को नजरअंदाज करना लगभग असंभव लगना। खाने से भावनात्मक संबंध होना। तनाव या बोरियत होने पर तुरंत खाने के बारे में सोचना।

सामान्य भूख से ऐसे है अलग

जैविक भूख तो शरीर की जरूरत है। पेट में गुड़गुड़ाहट होना, ऊर्जा कम महसूस होना और खाना खाने के बाद यह शांत हो जाना, यह सब सामान्य है। लेकिन फूड नॉइज़ एक मानसिक समस्या है। खाना खाने के तुरंत बाद भी व्यक्ति यह सोच सकता है कि फ्रिज में रखी मिठाई कब खानी है।

फूड नॉइज़ की वजहें

डोपामाइन और मस्तिष्क : मस्तिष्क का रिवॉर्ड सिस्टम इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। जब हम भोजन देखते हैं या उसके बारे में सोचते हैं, तो मस्तिष्क डोपामाइन रिलीज करता है। जिन लोगों में फूड नॉइज़ अधिक होता है, उनका मस्तिष्क भोजन के संकेतों (जैसे विज्ञापन या गंध) के प्रति अधिक संवेदनशील होता है।

हार्मोनल असंतुलन

हमारे शरीर हार्मोन का असंतुलन भी इसकी एक वजह है। शरीर के कुछ हार्मोन भूख और तृप्ति को नियंत्रित करते हैं। जैसे लेप्टिन मस्तिष्क को बताता है कि पेट भर गया है। जबकि घ्रेलिन यह भूख लगने का संकेत देता है। फूड नॉइज़ से जूझ रहे लोगों में इन हार्मोन्स का संचार ठीक से नहीं होता, जिससे मस्तिष्क को कभी ‘फुल’ होने का संकेत नहीं मिलता।

मनोवैज्ञानिक कारण

तनाव और चिंता इसकी बड़ी वजह है। तनावपूर्ण स्थितियों में मस्तिष्क ‘सर्वाइवल मोड’ में चला जाता है और कैलोरी-युक्त भोजन की मांग करता है। प्रतिबंधित डाइटिंग भी इसकी भी वजह हो सकती है। जब हम किसी चीज को खाने से खुद को सख्ती से रोकते हैं, तो मस्तिष्क उस चीज के प्रति अधिक ‘शोर’ पैदा करता है।

नई तरह की दवाओं का असर

हाल ही में ओजेंपिक जैसी दवाओं ने फूड नॉइज़ शब्द को लोकप्रिय बनाया है। ये दवाएं मस्तिष्क में जी एक पी 1रिसेप्टर्स पर काम करती हैं, जो न केवल पाचन को धीमा करती हैं बल्कि मस्तिष्क में इस ‘शोर’ को भी शांत कर देती हैं। कई लोग इन दवाओं को लेने के बाद पहली बार महसूस करते हैं कि बिना भोजन के विचार के जीना कैसा होता है।

फूड नॉइज़ का जीवन पर प्रभाव

मानसिक थकान : हर समय भोजन के बारे में सोचना मानसिक रूप से थका देने वाला होता है। अपराधबोध : बार-बार खाने के विचारों के कारण व्यक्ति खुद को कमज़ोर इच्छाशक्ति वाला मानने लगता है। एकाग्रता में कमी: काम या पढ़ाई के दौरान भी ध्यान भोजन पर ही रहता है।

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ऐसे पाएं काबू

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माइंडफुल ईटिंग : खाते समय पूरी तरह से भोजन पर ध्यान देना और उसके स्वाद को महसूस करना। पर्याप्त प्रोटीन और फाइबर : ये लंबे समय तक पेट भरा होने का एहसास कराते हैं, जिससे मानसिक लालसा कम हो सकती है। नींद: नींद की कमी भूख बढ़ाने वाले हार्मोन्स को सक्रिय कर देती है। प्रोफेशनल मदद: यदि यह ईटिंग डिसऑर्डर का रूप ले ले, तो मनोवैज्ञानिक या डाइटिशियन से सलाह लेना आवश्यक है।

- डायटिशियन पिंकी गोयल से बातचीत पर आधारित।

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