बांग्ला फिल्मों के दिग्गज फिल्मकार ऋत्विक घटक अपने समकालीन फिल्मकारों सत्यजीत रे और मृणाल सेन से भी कई अर्थों में भिन्न थे। बल्कि कई मायनों में वे अपने समकालीन फिल्मकारों पर भारी पड़ते हैं। उनकी फिल्मों-‘मेघे ढाका तारा’, ‘कोमल गांधार’ और ‘सुबर्ण रेखा’ में भारत विभाजन, विस्थापन और अपनी जमीन से कट जाने का बड़ा गहरा दर्द है, जिसे उन्होंने अपनी इन तीनों फिल्मों में मार्मिक रूप में व्यक्त किया है।
फिल्मकार ऋत्विक घटक को अकसर फिल्म निर्माता-निर्देशक, पटकथा लेखक के रूप में जाना जाता है। जबकि उनके व्यक्तित्व के कई पहलुओं से देखा जाये तो पश्चिम बंगाल में ऋत्विक घटक के समान बहुमुखी प्रतिभा संपन्न फिल्मकार शायद ही कोई हुआ हो। हालांकि उनकी जड़ें पूर्वी बंगाल में थीं और वहां के नदी-मैदान-हरियाली और जनजीवन को वे अपनी आखिरी सांस तक भुला नहीं पाए। बता दें कि ऋत्विक घटक का जन्म चार नवंबर 1925 को अविभाजित भारत के बंगाल के ढाका शहर में सौ साल पहले हुआ था। महज 50 वर्ष की आयु में 6 फरवरी 1976 को उनका कोलकाता में निधन हो गया।
बंटवारे का दर्द उतरा पर्दे पर
भारत विभाजन के साथ ही बंगाल भी विभाजित हो गया इसलिए ऋत्विक घटक को अपने मूल घर पूर्वी बंगाल को छोड़कर कलकत्ता (अब कोलकाता) में शरण लेनी पड़ी। यही वजह थी कि उन्होंने अपने जीवन काल में जितनी भी फिल्में बनाईं उनमें विभाजन और विस्थापन का दर्द बड़े गहरे रूप में उभरता रहा। उनकी तीन फिल्में मेघे ढाका तारा, कोमल गांधार और सुबर्ण रेखा इसका ज्वलंत प्रमाण हैं। उन्होंने अपने जीवन काल में सिर्फ आठ फिल्मों का निर्माण किया। ‘नागरिक’ उनकी पहली फिल्म थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 1977 में रिलीज हुई।
नाटक लेखन, निर्देशन से अभिनय तक
ऋत्विक घटक का व्यक्तित्व बहुत विराट था। वे कहानीकार थे तो कवि भी। वे नाटक लिखते थे और इनका निर्देशन करने के साथ ही उनमें अभिनय भी करते थे। उन्होंने ज्वाला, दलिल, सांको, कालो सायार और भांगा बंदर जैसे चर्चित नाटक लिखे, उनका निर्देशन किया और उनमें अभिनय भी किया। यही नहीं वे डॉक्यूमेंट्री मेकर भी थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई डॉक्यूमेंट्रीज का निर्माण किया। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि उनकी एक लघु फिल्म ‘दुर्वार गति पदमा’ (अशांत पद्मा 1971) में महान अभिनेत्री नरगिस ने भी काम किया था। इसके बाद नरगिस ने फिल्मों में काम करना बंद कर दिया था। घटक रेखांकन के भी उस्ताद थे। वे फिल्में बनाते थे और उनमें अभिनय भी
करते थे।
आमजन की पीड़ा पर आक्रोश का जरिया
ऋत्विक घटक मार्क्सवाद के प्रति आजीवन समर्पित रहे। वे खुद कहते थे- ‘मेरे लिए सिनेमा और कुछ नहीं सिर्फ एक अभिव्यक्ति है। ये मेरे लिए अपने लोगों के कष्टों और दु:खों को लेकर अपना गुस्सा जाहिर करने का माध्यम है। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का एक बंगाली होते हुए मैंने आजादी के नाम पर अपने लोगों पर बेतहाशा क्रूरतापूर्ण जुल्म होते देखे हैं। यह आजादी शर्मनाक है। अपनी फिल्मों में मैंने इसे लेकर हिंसक प्रतिक्रियाएं दी हैं।’ महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने घटक के बारे में कहा है कि विभाजन की त्रासदी ने ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकार को जन्म दिया।
ऋत्विक का बचपन
ऋत्विक की जुड़वां बहन प्रतीति देवी ने अपने एक संस्मरण में कहा है कि ‘ऋत्विक बांसुरी बजाने में पारंगत था। राग-संगीत में उसकी दिलचस्पी देखने लायक होती। रेखांकन करने में भी वह निपुण था। राजशाही इलाके में पद्मा नदी के किनारे घूमने में ऋत्विक को खूब आनंद आता। शाम ढलते ही साइकिल निकालता और चल पड़ता। साइकिल के पीछे मैं बैठती। ऋत्विक की खूबी यह थी कि वह रेत पर साइकिल चलाता था। श्रमजीवी लोगों को ऋत्विक बहुत चाहता था। राजशाही इलाके में रहते-रहते वामपंथी आदर्शों में उसकी दिलचस्पी ऐसी जगी कि वह वामपंथ की तरफ झुकता चला गया।’
एफटीआईआई में अध्यापन
ऋत्विक घटक ने पुणे स्थित एफटीआईआई में अध्यापन कार्य भी किया। वे वहां उप प्राचार्य के पद पर रहे। सिनेमा पढ़ाते हुए उन्होंने तब मणि कौल, कुमार शाहनी, सुभाष घई, अडूर गोपालकृष्णन, सईद अख्तर मिर्जा, जैसे अपने शिष्यों की प्रतिभा को कुछ इस तरह निखारा-संवारा कि बाद में भारतीय फिल्मोद्योग में इन सभी लोगों ने बड़ा नाम किया और तमाम अर्थपूर्ण फिल्मों का निर्माण किया।

