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यादों में फिल्मकार शक्ति सामंत

जन्मशती वर्ष/ एक राय : मौसमी चटर्जी

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फिल्मकार शक्ति सामंत में एक पढ़े-लिखे इंसान का एटीट्यूड था। वे बेहद प्रोफेशनल थे। फिल्म की कहानी व स्क्रिप्ट से समझौता नहीं करते थे। एकदम स्टाइलिश फिल्मकार थे। बता दें कि अभिनेत्री मौसमी चटर्जी ने हिन्दी फिल्मों में उनकी सुपरहिट फिल्म ‘अनुराग’ से शुरुआत की।

मशहूर फिल्मकार शक्ति सामंत का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। अभिनेत्री मौसमी चटर्जी ने हिन्दी फिल्मों में उनकी सुपरहिट फिल्म ‘अनुराग’ से शुरुआत की थी। शक्ति दा के साथ काम के अनुभव और उनकी शख्सियत के विभिन्न पहलुओं को लेकर उनसे बातचीत हुई।

मौसमी चटर्जी के मुताबिक, शक्ति सामंत साहब से मेरे ससुर हेमंत कुमार मुखर्जी का गहरा नाता था। हेमंत कुमार जी बड़े संगीतकार और गायक थे। हमारा घर कोलकाता के टॉलीगंज के पास ही था। टॉलीगंज बांग्ला फिल्मों के निर्माण का प्रमुख केंद्र है। तो वहां बांग्ला फिल्मों के निर्माता-निर्देशकों और अभिनेता-अभिनेत्रियों का आना-जाना लगा रहता था। वहीं बांग्ला में मेरी ‘बालिका वधू’ फिल्म भी हिट हो चुकी थी।

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रोल का ऑफर दिया शक्ति दा ने

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तो एक दिन शक्ति दा घर पर आए। उन्होंने मेरे फादर को बोला कि मेरे पास मौसमी के लिए एक अच्छी स्क्रिप्ट है। तब मेरी हेमंत दा के बेटे जयंत मुखर्जी के साथ सगाई हो चुकी थी। उन्होंने मुझसे बोला कि मेरी फिल्म में तुम्हारे लिए रोल बहुत अच्छा है। फिल्म का नाम था ‘अनुराग’। इस बीच मेरी शादी हो गई। उन्होंने कहानी सुनाते वक्त कहा था कि तुम्हारा एक नेत्रहीन लड़की का रोल है। फिल्म में राजेश यानी विनोद मेहरा मेरे प्रेमी की भूमिका में थे। राजेश खन्ना भी एक छोटी पर महत्वपूर्ण भूमिका में थे। दादा मुनि यानी अशोक कुमार तो थे ही।

ब्लाइंडनेस के रोल पर सुलझायी उलझन

बाद में यह सुनते ही मुझे कुछ उलझन सी हुई। क्योंकि मेरा ब्लाइंडनेस का जरा भी अनुभव नहीं था। शक्ति दा मेरी उलझन भांप गए। उन्होंने कहा घबराने की कोई जरूरत नहीं है। मैं तुम्हें ब्लाइंड स्कूल लेकर जाऊंगा। वहां उन लोगों की चाल-ढाल, व्यवहार बारीकी से देख लेना। फिर एक दिन अचानक उनका फोन आया और उन्होंने कहा कि तुम मुंबई आ जाओ। तुम पर मुहूर्त शॉट लेना है।

बड़े-बड़े स्टार थे सेट पर

खैर, मैं मुंबई आ गई। यह बात होगी 1972 की। स्टूडियो पहुंची तो देखा तो सारे बड़े-बड़े स्टार वहां मौजूद थे। सुपर स्टार अशोक कुमार, राजेश खन्ना, नूतन, शर्मिला टैगोर, मदन पुरी, विनोद मेहरा। अनुराग से मेरी हिन्दी फिल्मों में एंट्री हो रही थी। अलग तरह का अनुभव था मेरे लिए। मैंने बगैर नर्वस हुए शॉट दिया और पहले ही टेक में ओके हो गया।

पढ़े-लिखे इंसान का पेशेवराना एटीट्यूड

शक्ति दा बहुत खुश हुए और कहा कि तुम एकदम परफेक्ट एक्ट्रेस हो। शक्ति दा मुझसे बहुत स्नेह करते थे। डांटते भी बहुत थे मेरे भले के लिए। एक पढ़े-लिखे इंसान का एटीट्यूड उनमें था। बेहद प्रोफेशनल थे। फिल्म की कहानी व स्क्रिप्ट से समझौता नहीं करते थे। एकदम स्टाइलिश फिल्मकार थे।

अनुशासन की सीख

देखिए, कहां वह एक स्कूल टीचर थे। पर उनकी किस्मत में था कि वे फिल्मकार बने तो बन गए। शक्ति दा अनुशासन के एकदम पक्के थे। एक बार उन्हें फिल्म में सन राइजिंग का दृश्य लेना था। मैं एक-डेढ़ घंटा लेट हो गई। जैसे ही सेट पर पहुंची तो शक्ति दा ने जोर की डांट लगाई। उनसे जो सीख मिली वह ताउम्र मेरे काम आई।

आनंद आश्रम’ समेत कई हिट फिल्में

मैंने ‘अनुराग’ के अलावा उनकी ‘आनंद आश्रम’ फिल्म में भी काम किया। दोनों फिल्में सुपर हिट रहीं। फिर तो दर्जनों हिट फिल्मों में काम करती चली गई। शायद ही कोई ऐसा स्टार रहा हो जिसके साथ मैंने काम नहीं किया। आपने पूछा अंधी लड़की का रोल करने की दिक्कत के बारे में तो मैं कहना चाहती हूं कि कलाकार को गॉड ब्लेसिंग होती है। तभी बगैर किसी अनुभव और प्रशिक्षण के मैंने अंधी लड़की की भूमिका निभाई।

ससुर और पति का मिला सहयोग

मौसमी बताती हैं-अगर मेरे ससुर और पति ने मेरा साथ नहीं दिया होता तो मैं कभी हिन्दी फिल्मों में नहीं आ पाती। मेरे माता-पिता मेरे हिन्दी फिल्मों में काम करने के एकदम खिलाफ थे। लेकिन मुझे हिन्दी फिल्मों की हीरोइन बनना था बन गई और शानदार काम किया। शक्ति दा का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। अब कहां मिलते हैं ऐसे लोग जिनके साथ काम करते हुए लगता था कि अपने परिवार में ही काम कर रहे हैं। वही मुझे हिन्दी फिल्मों में लेकर आये। उनके जन्म शताब्दी वर्ष पर मैं उन्हें सलाम करती हूं।

नेत्रदान को प्रेरित करने वाली फिल्म

अभिनेत्री मौसमी चटर्जी बताती हैं-अनुराग फिल्म में उन्हें एक अंधी लड़की शिवानी का किरदार निभाना था जो एक आश्रम में रहती है। वहीं पास में रह रहे एक कैंसर पीड़ित चंदन यानी मास्टर सत्यजीत से उसकी दोस्ती हो जाती है। मरने से पहले वह अपनी आंखें शिवानी को दान करने की इच्छा जाहिर करता है और उसकी मृत्यु के बाद उसकी आंखों की बदौलत शिवानी की जिन्दगी में रोशनी लौट आती है। यह समाज को नेत्रदान के लिए प्रेरित करने वाली फिल्म थी शक्ति दा की।

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