हाल ही में परीक्षाओं को लेकर विवाद सामने आये जिनमें नीट पेपर लीक जैसे मुद्दे शामिल हैं। परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। ऐसे में परीक्षा सुधारों पर चर्चा स्वाभाविक है। विशेषज्ञों के मुताबिक, परीक्षा सुधार को विद्यार्थियों के असल ज्ञान और सीखने के आकलन से जुड़े शैक्षणिक मुद्दे के रूप में भी देखा जाए।
नीट परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होने और यूजीसी नेट से जुड़े विवादों ने परीक्षा सुधार के मुद्दे को मुख्यधारा की चर्चा में ला दिया है और स्वाभाविक ही है कि व्यवस्था के भीतर भी इस विषय पर गंभीर मंथन हो। विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक उच्चाधिकार प्राप्त टास्क फोर्स का गठन किया गया है, जिसे परीक्षा व्यवस्था की समीक्षा कर सुधारात्मक उपाय सुझाने का दायित्व दिया गया है। परीक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण सुधार उन लोगों के अनुभव को टास्क फोर्स में मौजूद विविध तजुर्बे के साथ जोड़कर किया जा सकता है, जो प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षाएं आयोजित करने, आंसरशीट के मूल्यांकन और विद्यार्थियों से जमीनी स्तर पर जुड़े रहे हैं।
परीक्षा सुधार एक शैक्षणिक मुद्दा
परीक्षा सुधार के मुद्दे को मुख्यतः लॉजिस्टिक, तकनीकी और सुरक्षा से जुड़ा विषय माना जा रहा है। हालांकि, इसे एक शैक्षणिक मामले के रूप में भी देखा जा सकता है। दरअसल ऐसी परीक्षा व्यवस्था चाहिए जो विद्यार्थियों के वास्तविक ज्ञान को प्रभावी ढंग से परख सके। पुराने दौर में इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश 10+2 में प्राप्त अंकों के आधार पर होता था। उस समय कोचिंग क्लास का कोई विशेष चलन नहीं था। बेशक विद्यार्थी पाठ्यक्रम पूरा करने और कक्षा में पढ़ाई गई सामग्री के साथ किसी ट्यूशन लेते थे। शिक्षक सितंबर तक पाठ्यक्रम पूरा कर लेते थे और उसके बाद लगातार परीक्षाएं लेते थे, ताकि फाइनल परीक्षा का वातावरण बनाया जा सके। प्रश्नपत्रों में विभिन्न प्रकार के प्रश्न होते थे, ताकि सीखने और समझ के अलग-अलग स्तरों वाले विद्यार्थियों में अंतर किया जा सके।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न और कोचिंग का दौर
पढ़ाई और तैयारी को लेकर समय के साथ चीजें बदल गईं। पारंपरिक परीक्षाओं में लगने वाले अधिक प्रयास और संसाधनों के कारण धीरे-धीरे वे वस्तुनिष्ठ प्रश्नों वाली परीक्षाओं में बदलने लगीं। वैचारिक और गहन सीखने का दौर मॉड्यूलर लर्निंग यानी टुकड़ों में सीखने की ओर बढ़ा और यही कोचिंग उद्योग के विस्तार का आधार भी बना।
दुनिया में बदलते परीक्षा के ढंग
दुनिया के विभिन्न देशों में परीक्षा के क्षेत्र में कई प्रयोग किए गए हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई हिस्सों में निगरानी के तहत होने वाली पारंपरिक कागज-कलम परीक्षाओं के स्थान पर या उनके साथ असाइनमेंट, प्रस्तुतियां, प्रोजेक्ट, मौखिक परीक्षाएं आदि को अपनाया गया है। विशेष रूप से ऑनलाइन माध्यमों से परीक्षा ने नई चुनौतियां पैदा की हैं। सीखने के आकलन का स्वरूप बदल रहा है और भारत में भी ऐसे सुधारों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
दो-स्तरीय परीक्षा व्यवस्था
पिछले कुछ दशकों में देश में दो-स्तरीय परीक्षा व्यवस्था विकसित हुई है—एक, विद्यालयों और महाविद्यालयों में योग्यता अथवा उत्तीर्णता निर्धारित करने वाली परीक्षाएं और दूसरी, आगे की पढ़ाई में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं। परीक्षाओं के अंकों के महत्व को लगभग पूरी तरह दूसरी व्यवस्था ने पीछे छोड़ दिया है।
कोचिंग का बढ़ता दायरा
विद्यार्थी कक्षाओं से दूर होकर कोचिंग संस्थानों की ओर जाने लगे हैं। पहले यह प्रवृत्ति इंजीनियरिंग और मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों तक सीमित थी। अब यह सभी क्षेत्रों में पहुंच गई है, क्योंकि स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में प्रवेश से लेकर सरकारी नौकरियों में चयन तक के लिए वस्तुनिष्ठ प्रवेश परीक्षाओं पर निर्भरता बढ़ गई है। प्रश्नपत्र तैयार करने, छपाई, परिवहन, परीक्षा आयोजन, उत्तर पुस्तिकाओं का संग्रह, मूल्यांकन और परिणाम घोषित करने तक की पूरी प्रक्रिया काफी जटिल है और इसमें अनेक संस्थाओं तथा व्यक्तियों की भूमिका होती है।
सीबीटी को लेकर चुनौती
के. राधाकृष्णन समिति ने भी परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए सुरक्षा, पारदर्शिता, अभ्यर्थी प्रमाणीकरण और परीक्षा संचालन से जुड़े कई सुझाव दिए हैं। ये सुझाव व्यापक विमर्श के लिए उपयोगी आधार देते हैं। लेकिन कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) की ओर बढ़ने से एक अलग प्रकार की चुनौती भी सामने आती है। वहीं आईइएलटीएस की तर्ज पर प्रश्न बैंक के माध्यम से अनेक परीक्षाएं आयोजित करने में मानकीकरण की अपनी चुनौतियां होंगी। दरअसल परीक्षा सुधार कोई तकनीकी प्रयोग नहीं बल्कि एक व्यवस्थागत पुनर्गठन है, जिसमें तकनीक केवल प्रक्रिया को सुगम बनाने का माध्यम है। देशभर में परीक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे, कनेक्टिविटी और तकनीक को अपनाने की क्षमता में विविधता को ध्यान में रखना होगा। पहले पर्याप्त परीक्षण किए जाने चाहिए। वहीं प्रवेश परीक्षाओं के संचालन के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने के साथ-साथ बोर्ड और विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाओं को मजबूत करने के विकल्प पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं और कुछ परीक्षाओं में प्रश्नपत्र तैयार करने से जुड़ी समस्याओं को छोड़ दें, जो हाल में चर्चा में रही हैं, तो हमारे पास सीएटी, जेईई और यूपीएससी जैसी कई ऐसी परीक्षाओं के उदाहरण हैं जो मजबूत और प्रभावी ढंग से संचालित होती रही हैं। यानी हमारे पास आवश्यक मानक संचालन प्रक्रियाएं मौजूद हैं। समस्या इनके वास्तविक भावना के अनुरूप क्रियान्वयन की है।

