बच्चों को स्क्रीन की व्यस्तता से दूर रखने के लिए नियम बनाए जा रहे हैं। वहीं उम्रदराज लोगों को भी स्क्रीन स्क्रॉलिंग की लत लग रही है। बुजुर्ग फोन आदि पर लंबा समय बिता रहे हैं। जहां उनके साथ अपराध बढ़ने व सेहत बिगड़ने जैसी चिंताएं पैदा हो रही हैं। वे निष्क्रिय जीवनशैली और असामाजिकता के घेरे में हैं। अब आस-पड़ोस के बड़े-बुजुर्ग साथ बैठकर समय नहीं बिताते। लेकिन वर्चुअल संसार का जुड़ाव मुसीबत में काम नहीं आता। वहीं परिवार में संवाद कम हुआ है जिसका असर नयी पीढ़ी पर हो रहा है।
आमतौर पर यह माना जाता है कि स्मार्ट गैजेट्स के घेरे में बच्चे ही आ रहे हैं। टीनेजर्स और युवा आभासी मंचों पर अपना अधिक समय बिता रहे हैं। विचारणीय है कि उम्रदराज लोग भी स्क्रीन स्क्रॉलिंग की लत के कारण व्याधियों का शिकार बन रहे हैं। हाल ही में एक बुजुर्ग का सेवानिवृत्ति के बाद मोबाइल की लत के कारण व्याधियों के घेरे में आने का समाचार वाकई चिंतनीय है। इस मामले में बुजुर्ग के साथ ऐसी स्थिति आ गई कि परिवार को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। ऐसे ही एक दूसरे मामले में एक प्रौढ़ व्यक्ति को मोबाइल फोन में गुम रहने के कारण गार्ड की नौकरी तक से हटा दिया गया। बेरोजगार होने पर भी उनकी फोन की आदत नहीं छूटी। दिन-रात फोन ही देखते रहने के कारण उनकी भी रीढ़ की हड्डी में घाव हो गए। करीब 55 वर्षीय इस मरीज के परिजनों के मुताबिक गार्ड की ड्यूटी पर रहते हुए अधिक5ांश समय फोन देखने के चलते सुरक्षा एजेंसी ने नौकरी से हटा दिया। घर पर रहने लगे तो नौकरी जाने के पश्चाताप और चिंता के बजाए फोन देखने की आदत और बढ़ गई। ज़्यादातर समय लेटे हुए या कुर्सी पर घंटों बैठे रहने के चलते रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से में जख्म तक हो गए।
वर्चुअल व्यस्तता के घेरे में बुजुर्ग
दुनिया भर में बच्चों को स्क्रीन की व्यस्तता से दूर रखने के लिए कई नियम बनाए जा रहे हैं। समय नियत करने के लिए अभिभावक, टीचर्स और घर के बड़े-बुजुर्ग भी समझाइश देते रहते हैं। वहीं स्मार्ट फोन पर बीत रहे बुजुर्गों के लंबे समय की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। स्वयं वरिष्ठजन भी इसके नुकसान नहीं समझ रहे हैं। जबकि मनोभाव बिगड़ने से लेकर शारीरिक समस्याओं तक, स्मार्ट फोन के इस्तेमाल की अति से जुड़ी परेशानियों के मामले उम्रदराज लोगों में भी सामने आने लगे हैं। तकलीफदेह यह है कि जिन बुजुर्गों पर घर के छोटे सदस्यों को सही और गलत समझाने की जिम्मेदारी होती है, वे ही वर्चुअल दुनिया में व्यस्त हैं। सहज जीवन की गतिविधियों के बजाय स्क्रॉलिंग को अधिक समय दे रहे हैं। इंटरनेट मीडिया के मकड़जाल में फंसकर अजनबी दुनिया में लंबा समय बिता रहे हैं। सहज रूप से देखें तो जीवन की जिम्मेदारियों के मुक्त होने के बाद यूं समय देना गलत नहीं लगता पर वर्चुअल व्यस्तता की अति साइबर संसार में बुजुर्गों के साथ हो रह अपराधों के आंकड़े बढ़ाने से लेकर सेहत के बिगाड़ने तक, बहुत सी चिंताएं पैदा कर रही हैं।
शारीरिक-मानसिक समस्याओं का घेरा
उम्र के साथ दस्तक देतीं बहुत सी परेशानियों का यह पड़ाव असल में खुद को शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय रखने की छोटी-छोटी कोशिशों को दिया जाना चाहिए। जीवन की आपाधापी से दूर वास्तविक दुनिया में संवाद का दायरा बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए। तकलीफदेह है कि स्थितियां बिलकुल विपरीत हैं। स्मार्ट स्क्रीन की व्यस्तता ने बड़ों को भी निष्क्रिय जीवनशैली और असामाजिकता के घेरे में ला दिया है। ग्लोबल वेब इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक 65 साल से ज्यादा के बुजुर्ग अपना 50 फीसदी समय डिजिटल डिवाइस के साथ बिता रहे हैं। टीवी, स्मार्ट फोन, आई पैड आदि डिवाइसेज पर मनोरंजन के साथ-साथ सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग, बैंकिंग और गेमिंग जैसी एक्टिविटीज़ को समय दे रहे हैं। बुजुर्गों का यूं स्मार्ट स्क्रीन में खोए रहना मनःस्थिति से लेकर रिश्तों तक, बहुत से पहलुओं पर दुष्प्रभाव डाल रहा है। नींद की कमी, व्यग्रता, शारीरिक निष्क्रियता, अकेलापन, अवसाद और आंखों की रोशनी कम होने जैसी समस्याएं उन्हें घेर रही हैं। वहीं आम जीवन से दूर होना एक असहजता भी ला रहा है। वर्चुअल संसार का जुड़ाव मुसीबत के मौके पर काम नहीं आता। अकेले रह रहे बुजुर्गों को कोई परेशानी आने पर आस-पड़ोस से ही मदद मिलती है। स्क्रीन में झांकते रहने की आदत के कारण वरिष्ठजन भी अपने परिवेश से कट रहे हैं। उम्रदराज लोगों को अब अपनी उम्र के लोगों की भी खबर नहीं रहती है। पहले आस-पड़ोस के बड़े-बुजुर्ग साथ बैठकर काफी समय बिताया करते थे। यह साथ संवाद अकेलेपन और डिप्रेशन को दूर रखने वाली गतिविधि हुआ करता था। अब बहुत से वर्चुअल साथियों के बीच असल दुनिया में तो अकेलापन ही उनका साथी है।
बुजुर्गों के साथ बढ़े साइबर अपराध
बुजुर्ग अपनी ऑनलाइन गतिविधियों को लेकर अधिक सजग नहीं होते। बहुत से उम्रदराज लोगों को सही सेटिंग्स की जानकारी नहीं होती। कई बुजुर्ग आभासी संसार में जुड़े लोगों पर सहजता से विश्वास कर लेते हैं। नकारात्मक सोच रखने वाले लोग उनके मनोविज्ञान को समझकर जालसाजी का खेल खेलते हैं। उनके बैंक खातों से पैसे उड़ा लेने के मामले तो हर दिन सामने आते हैं। बुजुर्गों के साथ ऑनलाइन ठगी और साइबर क्राइम के आंकड़े अब डराने वाले हो चले हैं। असल में डिजिटल डिवाइस बैक अकाउंट से जुड़े हैं। जिसके ऑनलाइन ठगी और फ्रॉड का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे में डिजिटल डिवाइसेस की अति व्यस्तता और स्क्रीन स्क्रॉलिंग से बुजुर्गों का बचना आवशयक है।
नई पीढ़ी पर नकारात्मक असर
किसी पार्क में देखिये या घर के आंगन में। दादा-दादी बच्चों से बात करने के बजाय स्क्रीन में ताकते दिखते हैं। रात को नई पीढ़ी को कहानी सुनाने की जगह एक के बाद एक रील्स स्क्रॉल कर रहे होते हैं। यहां तक कि बुजुर्ग आपस में भी बोलना-बतियाना भी भूल रहे हैं। ऐसे में समाज और परिवार में संवाद की कड़ियां ही टूट रही हैं। बड़ों का डिजिटल जाल में फंसना बच्चों पर भी नकारात्मक असर डालने वाला साबित हो रहा है। कामकाजी अभिभावकों की बढ़ती संख्या के बीच दादा-दादी, नाना-नानी का बच्चों के आसपास होते हुए भी स्क्रीन के संसार में खोये रहना नई पीढ़ी और अकेला कर रहा है। इन हालातों में बच्चों को भी स्मार्ट गैजेट्स ही अपने हर सवाल का जवाब देने वाले साथी लगने लगे हैं। ऐसे में बड़ों का स्क्रीन से संजाल से बचना कहीं ना कहीं नई पीढ़ी को भी डिजिटल दुनिया के सधे इस्तेमाल की राह दिखा सकता है।

