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रोगों से सुरक्षा की प्रभावी पहलकदमी

राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस : 16 मार्च

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भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान के तहत बच्चों के अतिरिक्त गर्भवती महिलाओं तथा गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को भी टीके लगाये जाते हैं। इनमें टीबी, डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, पोलियो, खसरा, रूबेला, हेपेटाइटिस बी, निमोनिया और रोटा वायरस संक्रमण के टीके प्रमुख हैं। इनकी शुरुआत पल्स पोलियो से हुई जो बेहद व्यापक, सफल और लोकप्रिय पहल है।

भारत जैसे 140 करोड़ जनसंख्या वाले देश में सब लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं को पहुंचाना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है। लेकिन भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से है, जिसकी कुछ ‘पहलें’ राष्ट्रीय स्वास्थ्य के इतिहास में मील का पत्थर हैं। इनमें से ही एक पहल हर साल 16 मार्च को मनाया जाने वाला राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस है। इसकी औपचारिक शुरुआत इसी दिन 1995 में हुई थी, जब भारत ने देशव्यापी पल्स पोलियो अभियान शुरू किया था। उस समय पोलियो एक गंभीर स्वास्थ्य संकट था और हर साल हजारों बच्चे पोलियो के कारण स्थायी अपंग हो जाते थे। बता दें कि 1980 से 1990 के दशक में भारत दुनिया के उन देशों में शामिल था, जहां पोलियो के मामले सर्वाधिक थे। इससे निपटने को सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से एक बड़े अभियान की शुरुआत की, जिसका मकसद देश में पांच साल तक के हर बच्चे को पोलियो की दो बूंद पिलाना था। यह अभियान इतना व्यापक और लोकप्रिय हो गया कि इस दिन को राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस की गरिमा से नवाजा गया।

व्यापकता और जनभागीदारी

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राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस की सबसे बड़ी विशेषता, इसकी व्यापकता और इसकी जनभागीदारी है। टीकाकरण अभियान से हर साल देश के 2.6 करोड़ बच्चे लाभान्वित होते हैं और गर्भवती महिलाओं को इसके चलते जो टीके लगाये जाते हैं, उससे करीब 3 करोड़ महिलाओं को हर साल टीके लगते हैं।

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इस दिन देशभर में हजारों टीकाकरण शिविर लगाये जाते हैं और स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर टीके लगाने का काम करते हैं। इस अभियान की कुछ खासियतों हैं- स्वास्थ्यकर्मियों का दूरदराज के गांवों, झुग्गी बस्तियों और दुर्गम भौगोलिक स्थितियों तक पहुंचना। स्कूलों, पंचायतों, स्वयंसेवी संस्थाओं और अनेक धार्मिक संगठनों की भागीदारी के कारण यह स्वास्थ्य कार्यक्रम की बजाय एक राष्ट्रीय अभियान जैसा नजर आता है। इस अभियान में बच्चों को लगाये जाने वाले सब टीके मुफ्त होते हैं। सरकार द्वारा स्वास्थ्यकर्मियों को ये मुफ्त टीके उपलब्ध कराये जाते हैं। पल्स पोलियो वैक्सीनेशन कार्यक्रम की इतनी माइक्रो प्लानिंग होती है कि दुनिया के सबसे बड़े आबादी वाले देश की सबसे बड़ी आबादी वाले बच्चों में से एक भी नहीं छूट पाता। यही नहीं टीकाकरण के बाद भी इन विशेष रोगों की लगातार निगरानी होती है और डेटा एकत्र किये जाते हैं।

विविध प्रकार का टीकाकरण

भारत का राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान आज दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक है। बच्चों के अतिरिक्त गर्भवती महिलाओं तथा गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को भी टीके लगाये जाते हैं। इस अभियान के चलते जो टीके विशेष तौरपर लगाये जाते हैं उनमें हैं- टीबी, डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनेस, पोलियो, खसरा, रूबेला, हेपेटाइटिस बी, निमोनिया और रोटा वायरस संक्रमण के टीके लगाये जाते हैं। इस कार्यक्रम के कारण भारत में बच्चों की मृत्यु दर रोकने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है और यह इस टीकाकरण अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि है कि भारत आज सौ फीसदी पोलियो संक्रमण से रहित देश है।

बड़ी उपलब्धि ‘पोलियो मुक्त’ देश

1990 के दशक में हर साल जहां हजारों पोलियो के केस सामने आते थे, वहीं साल 2011 में भारत में पोलियो का आखिरी मामला दर्ज हुआ था। इसी कारण साल 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को ‘पोलियो मुक्त’ देश घोषित किया था। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की जनसंख्या, भौगोलिक विविधता और स्वास्थ्य ढांचे की चुनौतियों को देखते हुए, इसे दुनिया के सबसे कठिन अभियानों में से एक माना गया था।

हेल्थ सिस्टम की मजबूती में योगदान

राष्ट्रीय टीकाकरण अभियान से देश के स्वास्थ्य परिदृश्य को बहुत फायदा हुआ है। इसी के चलते देश में बाल मृत्यु दर में कमी आयी है, आम लोगों के हर साल स्वास्थ्य पर खर्च होने वाले हजारों रुपये बचे हैं। सामाजिक और आर्थिक उत्पादकता में इसके कारण वृद्धि हुई है वहीं इस अभियान के कारण देश में स्वास्थ्य तंत्र मजबूत हुआ है। टीकाकरण अभियानों ने भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा, सही मायनों में खड़ा किया है। देशभर में कोल्ड चेन नेटवर्क, डेटा निगरानी प्रणाली और स्वास्थ्यकर्मियों का एक दल नेटवर्क, इस टीकाकरण अभियान के चलते विकसित हो सका है।

कुछ चुनौतियां भी बरकरार

हालांकि इस टीकाकरण अभियान से हजारों, लाखों लोगों का फायदा हुआ है, लेकिन अभी इस अभियान में सफलता की राह में कुछ चुनौतियां भी बरकरार हैं। इसके अलावा, कई जगहों पर कुछ समुदायों के लोगों ने टीकाकरण अभियान पर शक जताया है और कई लोग इसलिए टीकाकरण का विरोध करते हैं और अपने बच्चों को इस सुरक्षा कवच से बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हकीकत यही है कि राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस संकल्प की एक दृढ़ गाथा है। -इ.रि.सें.

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