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सपने दिखते हैं तो सुहाने मगर लगते हैं क्यों बेगाने

बजट घोषणाएं

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निस्संदेह, सालाना बजट के लक्ष्य दूरगामी और निरंतरता के विकास हेतु होते हैं। हर साल फरवरी में बजट को एक आर्थिक उत्सव के रूप में दर्शाया जाता है। लेकिन आम आदमी क्या इससे जुड़ाव महसूस करता है? क्या उसे भरोसा होता है कि सुनहरे भविष्य का दावा करने वाली योजनाओं का लाभ उसे प्रत्यक्ष-परोक्ष तौर पर मिलेगा? क्या लाभ किंतु-परंतुओं के बीच उसकी पहुंच में होंगे? या चतुर-सुजानों का ही भला होगा?

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पंचतंत्र कथा : वनराज (सरकार) ने घोषणा की कि जंगल अब ‘विकसित वन’ बनेगा। इसके लिए उन्होंने सात नए ‘हाई-स्पीड रनवे’ बनाने का ऐलान किया ताकि सब तेज़ी से भाग सकें। खरगोश(मिडिल क्लास) बहुत खुश हुई, उसे लगा कि अब उसे भागने में आसानी होगी।

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लेकिन जब सियार ने पूछा, ‘हुज़ूर, मेरे खाने के लिए क्या?’ तो वनराज ने दहाड़कर कहा, ‘मूर्ख! तूने दानवीर कर्ण का नाम नहीं सुना? राष्ट्र निर्माण के लिए अपनी भूख का ‘कवच’ त्याग दे। टैक्स स्लैब वही रहेगा, ताकि तेरा ‘धैर्य’ बना रहे। हर साल तू सोचता है कि कुछ कर राहत मिलेगी। पर नहीं तेरे नसीब में धैर्य है। धैर्य धर, सिर्फ देने पर विचार कर। दानी बन, दानी कर्ण बन। आज का ‘बजट-तंत्र’ सिखाता है कि ‘अगर सरकार तुम्हारी जेब से कुछ निकाल रही है, तो समझो वो तुम्हें ‘दानवीर कर्ण’ बनाने का मौका दे रही है।’

कहानी से शिक्षा : मध्यम वर्ग वह खरगोश है, जो शेर की दहाड़ सुनकर ही पेट भर लेता है, क्योंकि असली शिकार तो ‘कॉर्पोरेट’ बाघ ले जाते हैं।

कछुआ,खरगोश व ‘हाई-स्पीड’ रेल काॅरिडोर

पंचतंत्र कथा : जंगल में एक नया ‘गांडीव मार्ग’ (रेल कॉरिडोर) बनने की घोषणा हुई। भालू वर्ग (अमीर वर्ग) बहुत उत्साहित था, उसने अपनी चमचमाती स्पोर्ट्स कार निकाली और सोचा कि अब वह दिल्ली से वाराणसी पलक झपकते ही पहुंच जाएगा। वहीं कछुआ (लोकल ट्रेन का यात्री) अभी भी प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर अपनी पुरानी ‘छुक-छुक’ का इंतज़ार कर रहा था।

कछुए ने वन मंत्री से पूछा, ‘महाराज, ये बुलेट ट्रेन मेरे लिए भी है क्या?’ मंत्री जी ने कछुए की पीठ थपथपाई और कहा, ‘वत्स, तुम ‘धैर्य’ के प्रतीक हो। भालू को तेज़ जाने दो ताकि देश का नाम हो। तुम बस इस बात पर गर्व करो कि तुम्हारी बगल से जो ट्रेन गुजरी है, उसकी हवा से तुम्हारा चश्मा उड़ गया! इसे ही ‘गरुड़ की गति’ कहते हैं।’

शिक्षा : हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर परफ्यूम की तरह है, जिसे पूरा मोहल्ला सूंघ तो सकता है, लेकिन लगा सिर्फ वो सकता है जिसकी जेब में नोटों की गड्डी हो।

‘भारत-विस्तार’ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के हल

पंचतंत्र कथा : एक किसान परेशान था कि उसकी फसल पर कीड़े लग रहे हैं। वह जंगल के विद्वान ‘एआई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंट -तोते’ (भारत-विस्तार टूल) के पास गया। तोते ने 18 भाषाओं में जवाब दिया, ‘वत्स, उपग्रह के आंकड़ों के अनुसार तुम्हारे खेत में मिट्टी कम और समस्या ज्यादा है। तुम ‘डिजिटल फार्मिंग’ अपनाओ।’ किसान ने पूछा, ‘वो कैसे?’ तोते ने कहा, ‘मोबाइल पर मेरी ऐप डाउनलोड करो, उसमें तुम्हें खेती के 5000 साल पुराने और 100 साल आगे के तरीके मिल जाएंगे।’ किसान बोला, ‘हुज़ूर, खाद और पानी के पैसे नहीं हैं।’ तोते ने तुरंत कहा, ‘डेटा ही आज का तेल है, खाद की क्या ज़रूरत!’

कहानी से शिक्षा : सरकार का ‘भारत-विस्तार’ टूल उस डॉक्टर की तरह है जो मरीज को ये तो बता देता है कि उसे बीमारी कौन सी है, पर दवाई के लिए मरीज को खुद ही ‘जड़ी-बूटियां’ ढूंढने जंगल भेज देता है।

चूहा और ‘सर्कुलर’ इकोनॉमी का जाल

पंचतंत्र कथा : एक चूहे को पता चला कि लघु उद्यमों के लिए 10,000 करोड़ का ‘ग्रोथ फंड’ आया है। वह दौड़ा-दौड़ा बैंक (बिल्ले) के पास गया। बिल्ले ने बड़ी शालीनता से कहा, ‘ज़रूर! बस तुम अपना ‘कवच-कुंडल’ (कोलैटरल), तीन जन्मों का टैक्स रिटर्न और चंद्रमा पर अपनी जमीन के कागज ले आओ।’

चूहा निराश लौट रहा था, तभी उसे पता चला कि ‘सट्टेबाजी’ पर टैक्स बढ़ गया। उसने सोचा, ‘चलो, कम से कम मेरा सट्टा हारने का गम अब सरकार के टैक्स देने के गम से छोटा है।’

कहानी से शिक्षा: छोटे उद्योगों के लिए बजट का ‘फंड’ उस गाजर की तरह है जो गधे के सामने लटकी तो रहती है, पर गधा उसे तब तक नहीं खा पाता जब तक वह खुद ‘घोड़ा’ न बन जाए।

टिटहरी का अंडा और ‘फिस्कल डेफिसिट’

पंचतंत्र कथा : एक टिटहरी (आम आदमी) समुद्र के किनारे रहती थी। उसने बजट की खबर सुनी कि राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट 4.3 फीसदी पर सिमट गया है। वह खुशी से नाचने लगी कि अब समुद्र (महंगाई) शांत हो जाएगा। तभी मदिरा और सट्टेबाजी पर नए टैक्स की लहर आई। टिटहरी घबरा गई। कौवे (विशेषज्ञ) ने आकर समझाया, ‘पगली, ये अनुशासन है! अर्जुन की तरह लक्ष्य पर नज़र रख। अगर तूने शेयर बाजार में सट्टा लगाया है, तो तेरा अंडा (पोर्टफोलियो) फूटना तय है। तभी तो सेंसेक्स 1547 पॉइंट नीचे गिरा है। सट्टे से दूर रह, वरना तेरा निजी डेफिसिट बढ़ जायेगा। सरकार तो अपना डेफिसिट बढ़ा सकती है, तू नहीं बढ़ा सकती। वह गैरजिम्मेदार होना अफोर्ड कर सकती है, टिटहरी तू तो जिम्मेदार नागरिक है। तू ऐसा नहीं कर सकती।

कहानी से शिक्षा: गैर जिम्मेदारी सत्ता को शोभा देती है, आम नागरिक को तो जिम्मेदारी ही दिखानी चाहिए।

बंदर और दो बिल्लियों का ‘डिजिटल’ बंटवारा

पंचतंत्र कथा : दो बिल्लियां (लघु उद्योग और बड़े उद्योग) रोटी के टुकड़े के लिए लड़ रही थीं। तभी एक ‘एआई पाॅवर्ड’ बंदर (भारत-विस्तार टूल) आया। बंदर ने कहा, ‘लड़ो मत! हमारे पास सहदेव जैसी दूरदर्शिता है। सेमीकंडक्टर के लिए 40,000 करोड़ हैं और बायो-फार्मा के लिए 10,000 करोड़।’

बंदर ने रोटी के दो बड़े हिस्से किए और दोनों खा गया, उसने कहा कि ‘ये मशीन और रिसर्च का खर्चा है।’ बिल्लियों को सिर्फ ‘डिजिटल रसीद’ थमा दी गई।

कहानी से शिक्षा: मिलना किसी और को है, आम आदमी का काम ताली बजाने का है।

बगुला भगत और ‘शी-मार्ट’ की आत्मनिर्भरता

कथा : एक बगुला भगत (सिस्टम) नदी किनारे ‘शी-मार्ट’ का बोर्ड लगाकर खड़ा था। उसने मछलियों (महिला उद्यमियों) से कहा, ‘आओ, मैं तुम्हें आत्मनिर्भरता के छात्रावास में ले चलता हूं।’ एक मछली ने पूछा, ‘मगर हुज़ूर, नदी में प्रदूषण (बेरोजगारी) बहुत है?’ बगुला मुस्कुराया, ‘वो सब छोड़ो! देखो, हमने कैंसर की दवा सस्ती कर दी। पहले बीमार तो पड़ो, फिर सस्ते इलाज का मजा लेना।’

शिक्षा : बजट में इलाज सस्ता करने का वादा वैसा ही है जैसे किसी को कुछ अनहेल्दी खिलाने के बाद कहना- ‘घबराओ मत, दवा-इलाज पर डिस्काउंट है।’

शेर का ‘डिजिटल’ भोज और भूखा सियारम

पंचतंत्र कथा : वनराज (सरकार) ने जंगल में ‘भूख मिटाओ योजना’ के तहत एक भव्य भोज का आयोजन किया। चूहे (गरीब) को निमंत्रण मिला कि वह ‘जन-धन’ गुफा में जाकर अपना ऑनलाइन पंजीकरण कराए। चूहा गया, पर वहां नेटवर्क गायब था। जब तक नेटवर्क आया, तब तक भेड़िए और लोमड़ियां (बिचौलिए) सारा भोजन डकार चुके थे। अंत में सियार को एक ‘डिजिटल सर्टिफिकेट’ मिला, जिस पर लिखा था- आपका पेट वर्चुअली भर गया है, अब आप विकसित जंगल के नागरिक हैं।’

कहानी से शिक्षा: योजनाओं का ‘मेन्यू’ पंचसितारा होटल जैसा है, पर गरीब की थाली में सिर्फ ‘डाउनलोड’ करने की सलाह बची है।

बंदर का चश्मा और ‘स्किल इंडिया’

पंचतंत्र कथा : एक बंदर को ‘कौशल विकास योजना’ के तहत चश्मा बनाने की ट्रेनिंग दी गई। बंदर ने बहुत मेहनत की। ट्रेनिंग खत्म होने पर उसे एक सर्टिफिकेट और एक काला चश्मा मिला। जब बंदर ने चश्मा लगाया, तो उसे जंगल की हरियाली के बजाय सिर्फ ‘भविष्य का सुनहरा सपना’ दिखने लगा। बंदर खुश हुआ, पर जैसे ही उसने चश्मा उतारा, पता चला कि उसके पास न चश्मा बेचने के लिए दुकान है और न ही चश्मा खरीदने के लिए किसी के पास पैसे।

शिक्षा : सरकार ने सबको ‘डिग्री’ का चश्मा तो दे दिया, पर समाज में ‘नौकरी’ की रोशनी ही गायब है।

नीतिशास्त्र कहता है कि प्यासे को पानी दो। ‘योजना-शास्त्र’ कहता है कि प्यासे को ‘नल’ का फोटो दिखाओ, ‘पाइपलाइन’ का टेंडर निकालो और उसे समझाओ कि ‘प्यास’ लगना एक मानसिक स्थिति है जिसे ‘अभ्यास’ से ठीक किया जा सकता है।

गधा और ‘कैंसर की संजीवनी’

कथा : जंगल के राजा ने ऐलान किया कि अब ‘संजीवनी’ (कैंसर की दवा) पर कोई टैक्स नहीं लगेगा। जंगल के सभी जानवर (बीमार परिवार) नाचने लगे कि अब कोई धन के अभाव में नहीं मरेगा।

एक बूढ़ा गधा (गरीब मरीज) दवा की दुकान पर गया। दुकानदार ने कहा, ‘टैक्स तो हट गया, पर दवा की ‘बेस प्राइस’ बढ़ गई है और डॉक्टर साहब की ‘विजिट’ पर 18 फीसदी जीएसटी है।’ गधे ने हिसाब लगाया—दवा पर 50 रुपये बचे थे, पर अस्पताल के बेड और जांच में 5000 रुपये बढ़ गए थे। गधा रोने लगा। तभी वनराज का एक प्रतिनिधि आया और बोला, ‘मूर्ख, रोता क्यों है? देख, कस्टम ड्यूटी हट गई है! डाक्टर के रेट बढ़ गये हैं, तो इसमें बजट क्या करे।

कहानी से शिक्षा- कैंसर की दवा से टैक्स हटाना वैसा ही है जैसे कपड़ों से वंचित आदमी को ‘टाई’ मुफ्त देना। सभ्य दिखेगा, पर ठंड से मरना उसका तय है।

स्थितप्रज्ञ बंदर और ‘डिजिटल व्यसन’ का कोपभवन

पंचतंत्र कथा : जंगल के बंदरों को ‘डिजिटल व्यसन’ (मोबाइल की लत) लग गई थी। वे पेड़ों पर कूदने के बजाय ‘रील्स’ बना रहे थे। वनराज ने ‘टेली-मानस’ और ‘निमहेंस-2’ की घोषणा की। उनमें से एक बंदर को डॉक्टर के पास ले जाया गया। उस बंदर को डॉक्टर ने कहा, ‘वत्स, तुम ‘स्थितप्रज्ञ’ बनो। मोबाइल छोड़ो और फिर कुदरत को देखो।’ बंदर ने पूछा, ‘डॉक्टर साहब, आपकी सलाह तो बहुत अच्छी है, पर क्या इसकी कोई ‘ऐप’ है? या क्या मैं आपकी क्लीनिक से ‘सेल्फी’ लेकर डाल सकता हूं?’ डॉक्टर ने अपना सिर पकड़ लिया और खुद के लिए ‘मानसिक परामर्श’ बुक कर लिया।

बगुला भगत और ‘मेडिकल टूरिज्म’ का तालाब

कथा: एक बहुत चतुर बगुला (सिस्टम) तालाब के किनारे एक पैर पर खड़ा होकर ‘मंत्र’ का जाप कर रहा था। उसके गले में एक बोर्ड लटका था—‘िवश्व-वैद्य केंद्र : यहां सात समंदर पार की मछलियों का इलाज ‘सुषेण वैद्य’ की गति से किया जाता है।’पड़ोसी तालाब की एक विदेशी मछली (मेडिकल टूरिस्ट) अपना इलाज कराने आई। बगुले ने उसे ‘एकीकृत स्वास्थ्य परिसर’ में भर्ती किया और कहा, ‘देखो, अमेरिका में तुम्हें मगरमच्छ खा जाते, यहां मैं तुम्हें ‘आयुष’ और ‘योग’ से ठीक करूंगा।’ तब तालाब की एक स्थानीय मछली (आम नागरिक) तड़पती हुई आई और बोली, ‘महाराज, मुझे सांस लेने में दिक्कत है।’बगुले ने बिना आंख खोले कहा, ‘वत्स, तुम तो ‘जटायु’ के वंशज हो, थोड़ा सब्र करो। अभी मैं विदेशी मुद्रा (विदेशी मछली) की सेवा में हूं। तुम ‘डिजिटल ऐप’ पर जाकर टोकन लो, अगले जन्म तक तुम्हारा नंबर आ जाएगा।’

कहानी की शिक्षा: खुद ‘विश्व-वैद्य’ तो बन रहे हैं, लेकिन स्थिति ऐसी है कि घर का जटायु ‘ट्रॉमा सेंटर’ के बाहर स्ट्रेचर का इंतज़ार कर रहा है और पड़ोस का रावण ‘प्रीमियम सुइट’ में इलाज करा रहा है।

चमक नहीं, मजबूती की तैयारी

कुछ रकम हाथ में हो तो दो विकल्प होते हैं—या तो मकान पर एक चमचमाती मंज़िल जोड़ दी जाये, ताकि पड़ोसी जल-भुन कर कहें ‘वाह! हैसियत देखो’। या फिर वही रकम पाइप बदलवाने, सीसीटीवी लगाने और घर के भीतर की दरारें भरने में खर्च कर दी जाये। इस बार का बजट 2026-27 साफ बता रहा है कि सरकार ने ‘नयी मंज़िल’ वाला विकल्प छोड़कर ‘पाइप बदलवाने’ वाला रास्ता चुना है।

यह बजट किसी जिम्मेदार गृहस्थ का बजट है—जो मोहल्ले में नई कार खड़ी करके डींगें नहीं मारता, बल्कि चुपचाप घर की छत की लीक ठीक करवा देता है। चमकदार घोषणाओं की तलाश करने वाले पत्रकारों को इसमें उतना ही मज़ा आया होगा जितना किसी शादी में ‘खाने में सिर्फ खिचड़ी’ देखकर आता है।

* रक्षा खर्च पंद्रह प्रतिशत बढ़ा दिया गया है, करीब 7.85 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। यानी घर के बाहर गार्ड की संख्या बढ़ गयी है।

* लघु, सूक्ष्म उद्योग फंड आया है 10000 करोड़ का,यह वैसा ही है जैसे गृहस्थ ने घर के छोटे बच्चों को पॉकेट मनी बढ़ा दी हो— ‘लो बेटा, स्टार्टअप खोल लो, पर दूध-भात समय पर खाना।’

* धार्मिक पर्यटन को मजबूत करने की बात है। यानी घर के बुजुर्गों के लिए ‘तीर्थयात्रा पैकेज’ तैयार है।

* कपड़ा उद्योग को ट्रंप के टैरिफ से बचाने की कोशिश है। यह वैसा है जैसे पड़ोसी ने आपके कपड़े सुखाने की रस्सी काट दी हो, और आप मजबूरी में नई रस्सी खरीद लें।

* रेयर अर्थ पर ठोस काम करने की योजना है। यह सुनकर आम आदमी सोच रहा होगा—‘रेयर अर्थ तो ठीक है, पर रेयर प्याज़ कहां से लायेंगे?’

* मेडिकल पर्यटन को बढ़ावा देने की बात है। यानी अब विदेशी मरीजों को बुलाकर कहा जायेगा—‘आइए, हमारे अस्पताल में इलाज कराइए, और जाते-जाते ताजमहल भी देख जाइए।’

* सबसे बड़ी बात यह है कि राजकोषीय घाटा सीमा में रखने का अनुशासन दिखाया गया है। यानी गृहस्थ ने बच्चों को साफ कह दिया है—‘इस बार टीवी नया नहीं आयेगा, पर पुराना वाला ठीक से चलता रहेगा।’

* यह बजट वैसा है जैसे शादी में डीजे न बुलाकर ‘भजन मंडली’ बुला ली जाये—शोर कम है, पर शांति ज़्यादा है।

* इसमें कोई ‘बड़ी कार’ नहीं है, बस ‘नये सीट कवर’ हैं।

* सरकार ने इस बार ‘फेसलिफ्ट’ नहीं कराया, बस ‘डेंटिंग-पेंटिंग’ करवाई है।

आम जनता को यह बजट उतना ही रोमांचक लगेगा जितना ‘रेलवे टाइमटेबल’ पढ़ना।

कुल मिलाकर, बजट 2026-27 चमकदार आतिशबाज़ी नहीं दिखाता, बल्कि घर की नींव मजबूत करने पर ध्यान देता है। यह वही गृहस्थ है जो पड़ोसियों को दिखावे में नहीं उलझता, बल्कि चुपचाप अपने घर की मरम्मत करता है। 

                                                                             -लेखक आर्थिक पत्रकार हैं।

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