अल्ज़ाइमर को अक्सर भूलने की बीमारी माना जाता है लेकिन विज्ञान अब इसे केवल याद्दाश्त खोने के रूप में नहीं देखता। दरअसल मस्तिष्क में अल्ज़ाइमर से जुड़े बदलाव, स्मृति के स्पष्ट रूप से प्रभावित होने से वर्षों पहले शुरू हो सकते हैं। कुछ ऐसे बदलाव दिखते हैं, जिन्हें अक्सर उम्र बढ़ने, थकान या कमजोरी समझकर अनदेखा किया जाता है। मसलन, नींद के पैटर्न में बदलाव, चाल धीमी होना, सूंघने की क्षमता घटना, बातचीत में सही शब्द न सूझना। इसलिए समय रहते डॉक्टरी सलाह लेना जरूरी है।
अल्ज़ाइमर का नाम जुबान पर आते ही हमारे जेहन में सबसे पहले जो तस्वीर बनती है, वह एक ऐसे बुजुर्ग की होती है, जिन्हें चीजें भूलने, नाम याद न रहने, सामान रखकर भूल जाने या एक ही सवाल को बार-बार पूछने की आदत होती है। लेकिन विज्ञान अब इस बीमारी को केवल याद्दाश्त खोने की कहानी के रूप में नहीं देखता। मस्तिष्क में अल्ज़ाइमर से जुड़े बदलाव, स्मृति स्पष्ट रूप से प्रभावित होने से वर्षों पहले शुरू हो सकते हैं। इस दौरान शरीर और व्यवहार में कुछ ऐसे सूक्ष्म परिवर्तन दिखायी दे सकते हैं, जिन्हें अक्सर उम्र बढ़ने, थकान या सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हालांकि हमेशा इसका अर्थ यह नहीं होता कि हर ऐसा परिवर्तन अनिवार्य रूप से अल्ज़ाइमर ही होता है। फिर भी नींद की कमी, अवसाद, दवाओं के दुष्प्रभाव, विटामिन की कमी, थायरॉयड की समस्या और अन्य चिकित्सीय स्थितियां भी मिलते-जुलते लक्षण पैदा कर सकती हैं। इसलिए इन संकेतों का महत्व चेतावनी के रूप में है, निदान के रूप में नहीं।
जब बदलने लगे नींद का पैटर्न
मनोवैज्ञानिक कहते हैं, मस्तिष्क और नींद का बहुत गहरा रिश्ता है। नींद के दौरान मस्तिष्क दिनभर की सूचनाओं को व्यवस्थित करता है और कुछ महत्वपूर्ण जैविक सफाई प्रक्रियाएं भी एक्टिव रहती हैं। विभिन्न शोधों में नींद और अल्ज़ाइमर के जोखिमों के बीच गहरा संबंध पाया गया है। बार-बार नींद टूटना, दिन में अधिक से अधिक नींद आना, नींद के पैटर्न में लगातार बदलाव होना, ये सब ऐसी बातें हैं, जिन पर ध्यान देने की जरूरत होती है। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है। हर अनिद्रा की समस्या अल्ज़ाइमर नहीं होती, उम्र के साथ-साथ नींद के पैटर्न में बदलाव होता ही है और स्लीप एपनिया जैसी स्थिति भी नींद को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए मायने रखती है चाल
किसी बुजुर्ग व्यक्ति के चलने में धीरे-धीरे बदलाव आना, सामान्य उम्र बढ़ने का हिस्सा माना जाता है। लेकिन चाल के संतुलन और मानसिक क्षमता के बीच भी गहरा संबंध होता है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि जब किसी उम्रदराज व्यक्ति की चाल अचानक जरूरत से ज्यादा धीमी हो जाए तो उसमें संज्ञानात्मक गिरावट पायी जाती है। खास तौर पर तब ध्यान देना चाहिए, जब व्यक्ति पहले की तुलना में कुछ ज्यादा ही धीमा हो जाए। इसके साथ ही वह दिशा बदलने में असहजता महसूस करे या फिर चलते समय एक साथ कोई दूसरा काम करने में कठिनाई महसूस करे, फिर भी इसका कारण केवल अल्ज़ाइमर नहीं हो सकता। मांसपेशियों की कमजोरी, गठिया, लकवा, पार्किंसन या दृष्टि संबंधी समस्या भी इसकी वजह हो सकती है।
जब कम हो सूंघने की क्षमता
नाक से आने वाली खुश्बू सीधे मस्तिष्क के उन क्षेत्रों से जुड़ती है, जिनका संबंध स्मृति और भावनाओं से होता है। इसलिए शोधकर्ताओं ने लंबे समय से यह देखा है कि कुछ न्यूरोडिजनरेटिव बीमारियों में सूंघने की क्षमता कम हो जाती है और कई बार तो बिल्कुल खत्म हो जाती है। यदि किसी व्यक्ति को पहले की परिचित खुशबू जैसे फूल, मसाले या भोजन पहचानने में लगातार कठिनाई होने लगे तो इसे चिकित्सीय संदर्भ में देखा जा सकता है। लेकिन सर्दी, जुकाम, एलर्जी, नाक की समस्या और संक्रमण भी सूंघने की क्षमता कम कर सकते हैं। इसलिए इसे अकेले अल्ज़ाइमर का संकेत भी मानना गलत होगा। इस फर्क पर भी बारीकी से नजर रखना होगा।
दिमाग का शब्द जुबान पर न आए
कई बार ऐसा होता है कि कोई शब्द हमारे दिमाग में होता है, लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी जुबान पर नहीं आ पाता। बस यह लगता है कि जुबान में शब्द आया-आया, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी अंततः वह शब्द जुबान पर नहीं आता। ऐसा व्यक्ति बातचीत करते हुए बार-बार बीच में रुक जाता है। किसी वस्तु का नाम जानते हुए भी बता नहीं पाता और अपनी बात पूरी करने के लिए असामान्य रूप से दूसरे शब्दों का सहारा लेने की कोशिश करता है। यह बदलाव केवल स्मृति से संबंधित नहीं है। मस्तिष्क के भाषा संबंधी हिस्सों की कार्यक्षमता में परिवर्तन भी इसका कारण हो सकता है। इसलिए परिवार को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि व्यक्ति चीजें भूल रहा है या नहीं बल्कि यह देखना चाहिए कि वह अपनी बात कहने के तरीके में कितना बदल गया है।
परिचित काम भी कठिन लगने लगे
किसी ऐसे काम में कठिनाई आने लगना, जिसे कोई व्यक्ति वर्षों से आसानी से कर रहा हो, तो यह भी अल्ज़ाइमर के दबे पांव आ पकड़ने का महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। मसलन, किसी परिचित को रास्ते पर चलने में परेशानी महसूस होने लगे, घरेलू उपकरण चलाने में भी असमंजस महसूस होने लगे या डर लगने लगे और पैसों का हिसाब-किताब करते हुए बार-बार गलती हो, तो यह समस्या भूलने की नहीं है बल्कि पहले से सीखी हुई क्षमताओं का धीरे-धीरे कमजोर होते जाना है।
अल्ज़ाइमर को समझने का सबसे जरूरी बदलाव शायद यही है कि हम इसे केवल उस दिन से न गिनें, जब कोई व्यक्ति अपना नाम या किसी करीबी का चेहरा भूलने लगे। मस्तिष्क में बीमारी की प्रक्रिया उससे बहुत पहले शुरू हो जाती है। इसलिए शरीर में होने वाले छोटे-छोटे मगर लगातार बदलाव पर भी नजर रखनी जरूरी है। ये बदलाव सिर्फ उम्र के नहीं होते बल्कि कई बार ये अल्ज़ाइमर के संकेत होते हैं। इसलिए डॉक्टर कहते हैं अल्ज़ाइमर अचानक नहीं आता, वह पहले बहुत संकेत देता है। जरूरत सिर्फ इतनी होती है कि हम उन संकेतों को समय रहते पहचानना सीखें।
-इ.रि.सें.

