सदियों की लाचारी और समाज की संवेदनहीनता के चलते हाथ से सीवर की सफाई की अमानवीय प्रथा बदस्तूर जारी है। जारी ही नहीं है बल्कि मजबूर सफाई कर्मियों की मौत का सबब भी बनी हुई है। निश्चय ही यह घिनौनी प्रथा किसी भी सभ्य समाज के लिये एक कलंक के समान ही है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि हाथ से सीवर लाइन साफ करने की प्रथा मजबूर लोगों की लगातार जान ले रही है। हाल ही में लोकसभा में पेश किए गए आंकड़े इस समस्या के भयावह पक्ष को ही उजागर करते हैं। केंद्र सरकार की ओर बीते सप्ताह लोकसभा में बताया गया कि साल 2017 से अब तक देश में सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते हुए 620 से अधिक सफाईकर्मियों की मौत हो चुकी है। कहना कठिन है कि ये आंकड़े वास्तविक हैं और सभी मौतों को देश में रिपोर्ट किया जा रहा है। ग्रामीण व दूरदराज के इलाकों में ठेकेदार दिहाड़ीदार सफाई कर्मियों की मौत को रफा-दफा करने का प्रयास करते हैं। कुछ चतुर-चालाक लोग परिजनों की मजबूरी को भांपते हुए छोटी-मोटी रकम देकर मामले पर पर्दा डाल देते हैं। ऐसे मामले शायद ही सामने आते हों कि सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद सफाईकर्मियों से सीवर व सेप्टिक टैंक की सफाई करवाने वाले ठेकेदार व स्थानीय निकाय के अधिकारियों को दंडित किया गया हो। क्या किसी लोकतांत्रिक समाज में किसी मजबूर सफाईकर्मी के जीवन का कोई मूल्य नहीं है? निस्संदेह, लोकसभा में पेश किए गए आंकड़े घोर लापरवाही को ही उजागर करते हैं। विडंबना यह भी है कि जहां करीब 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला है, वहीं करीब 52 परिवारों को कोई पैसा नहीं मिला। निर्विवाद रूप से किसी मृत सफाई कर्मी के परिजनों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता कोई दान नहीं है, बल्कि समाज का एक कानूनी और नैतिक दायित्व भी है। जब इस जरूरी सहायता में कोई कमी रह जाती है तो हमारी व्यवस्थागत उदासीनता ही उजागर होती है।
निस्संदेह, यह कष्टकारी स्थिति साल 2047 में देश को विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प पर सवालिया निशान लगाती है। वहीं सरकारी दावा है कि मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 में किए गए एक सर्वेक्षण में देशभर के किसी भी जिले में हाथ से मैला साफ करने वाले सफाईकर्मी नहीं पाए गए हैं। सवाल ये है कि जब हाथ से सफाई करने वाले सफाई कर्मचारी देश में नहीं हैं तो सीवर व सेप्टिक टैंक में जहरीली गैस के चपेट में आकर लोगों के मरने की खबरें कैसे आ रही हैं? यह दुखद ही है कि बीते मंगलवार को छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित एक प्रमुख अस्पताल में सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन सफाई कर्मचारियों की दर्दनाक मौत हो गई। सीवर-सेप्टिक टैंक की सफाई में मशीन के उपयोग को बढ़ावा देकर मैनुअल स्कैवेंजिंग को खत्म करने के उद्देश्य से ही सरकार द्वारा साल 2023-24 में शुरू की गई राष्ट्रीय मशीनीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकीय तंत्र यानी नमस्ते परियोजना को अभी भी लंबा रास्ता तय करना है। केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्य मंत्री ने पिछले दिनों स्वीकार किया था कि मशीनीकरण के कारण दक्षता या सफाई व्यवस्था में सुधार के जरूरी संकेतक अभी तक पहचान में नहीं आए हैं। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग को पिछले वर्ष वेतन का भुगतान न होने, सुरक्षा उपकरणों की कमी और जाति आधारित भेदभाव को लेकर करीब 842 शिकायतें प्राप्त हुई थीं। जो इस बात का प्रमाण हैं कि समस्या की जड़ें बहुत गहरे रूप में विद्यमान हैं। हालांकि सरकारी दावा है कि सफाई का काम व्यवसाय पर आधारित है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि सदियों से हाशिये पर पड़े समुदायों के श्रमिकों के बूते ही सफाई व्यवस्था चलायी जा रही है। निस्संदेह, दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था का दावा करने वाले समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी नागरिक को अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिये बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। श्रम की गरिमा के सवाल का जबाव महज एक नारे से हासिल नहीं किया जा सकता। इसे एक जमीनी हकीकत बनाना होगा।

