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सोच-जीवनशैली बदलने से थमेगा पार्किंसंस

कभी साठ पार का रोग माना जाने वाला पार्किंसंस लोगों को समय से पहले रोगी बनाने लगा है। दरअसल, सेवानिवृत्ति के बाद उपेक्षा का भाव, शारीरिक निष्क्रियता और इगो की समस्या इसके मूल में होती है। हम जीवन में हो...

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कभी साठ पार का रोग माना जाने वाला पार्किंसंस लोगों को समय से पहले रोगी बनाने लगा है। दरअसल, सेवानिवृत्ति के बाद उपेक्षा का भाव, शारीरिक निष्क्रियता और इगो की समस्या इसके मूल में होती है। हम जीवन में हो रहे बदलाव को स्वीकार करके, शारीरिक सक्रियता बढ़ाकर और योग-ध्यान से इसका बढ़ना रोक सकते हैं। कैसे- बता रहे हैं योगाचार्य आचार्य बलविंदर।

जीवनशैली में बदलाव के चलते कई रोग एक उम्र के बाद अपना शिकंजा कसने लगते हैं। जिनका अंतिम उपचार विज्ञान अभी तक नहीं ढूंढ पाया है। लेकिन यदि हम चिकित्सकों द्वारा लिखी दवा को नियमित लेते रहें और अपनी जीवन शैली व सोच में बदलाव लाएं तो इन रोगों में आराम मिल जाता है। ऐसा ही एक रोग है पार्किंसंस, जिसके बारे में अब तक धारणा थी कि यह आमतौर पर साठ साल की उम्र के बाद होता है। इस रोग को आनुवंशिक और पर्यावरणीय कारकों का संयोजन माना जाता है। जिसके प्रभाव को कम करने की दवाइयां तो उपलब्ध हैं, लेकिन स्थायी इलाज की तलाश जारी है। वहीं अब हमारे जीवन में बढ़ते तनाव व अस्वस्थ करने वाली परिस्थितियों के चलते यह रोग कम उम्र में भी व्यापक असर दिखाने लगा है।

मस्तिष्क से जुड़ा विकार

दरअसल,पार्किंसंस मस्तिष्क से जुड़ा एक विकार है, जिसमें हमारे शरीर में डोपामाइन बनाने वाली तंत्रिका की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। दरअसल, ये कोशिकाएं हमारे शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करती हैं। जिसके चलते शरीर में अकड़न, कंपन, चाल का धीमा होना, मांसपेशियों में जकड़न और संतुलन बिगड़ने जैसी समस्याएं उम्रदराज व्यक्ति के शरीर में पैदा होने लगती हैं। लिखावट में भी बदलाव देखा जाता है। धीरे-धीरे आवाज धीमी व अस्पष्ट हो जाती है। इतना ही नहीं, नींद भी बाधित होती है। अवीसाद के चलते सोचने-समझने में परेशानी नजर आती है। स्थिति गंभीर होने पर व्यक्ति चलने में भी असमर्थ हो जाता है। दैनिक जीवन के कार्य करना भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन इस रोग की समय रहते पहचान करने और जीवनशैली व सोच में बदलाव के जरिये उचित प्रबंधन के सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। तंत्रिकाओं के विकार से उपजे इस रोग में दिमाग के कुछ विशेष हिस्सों में धीमापन आ जाता है।

तनाव बड़ी वजह

वास्तव में इस रोग के मूल में तनाव का बड़ा रोल है। जब व्यक्ति की मांसपेशियां सहज स्थिति में होती हैं तो व्यक्ति काम में व्यस्त रहते हुए तनाव को नजरअंदाज कर देता है। दरअसल, तनाव का व्यक्ति की जीवनशैली में समायोजन हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो तनाव महसूस करने का उसके पास समय नहीं होता। तनाव बढ़ने के फलस्वरूप व्यक्ति उच्च रक्तचाप की स्थिति का सामना करता है। अगर समय पर तनाव की स्थिति का पता लग जाए तो रोग का उपचार संभव है।

छिपे दुश्मन जैसा उच्च रक्तचाप

चिकित्सक हमारे उच्च रक्तचाप को छिपे दुश्मन की तरह छिपा हुआ रोग मानते हैं। जब तक हमें इसकी घातकता का पता चलता तो तब तक हम लेट हो जाते हैं। फिर यह हमारे शरीर में कई तरह के रोग के रूप में प्रकट होता है। यही वजह है कई बार डॉक्टर कहते हैं उच्च रक्तचाप एक साइलेंट किलर है। जब हमारे शरीर में तनाव बढ़ता है तो यह व्यक्ति को एंग्जाइटी की तरफ ले जाता हे। शरीर व मन को बेचैन करता है। तनाव से फिर अवसाद की स्थिति पैदा होती है। ये तनाव न जाने शरीर के किस भाग पर कुप्रभाव दिखाए। इसका प्रभाव शरीर व मन पर समान रूप से होता है। जिसे हम मनोशारीरिक प्रभाव बोलते हैं।

जेम्स पार्किंसंस को श्रेय

इस रोग पर गंभीर पड़ताल करने का श्रेय ब्रिटिश चिकित्सक जेम्स पार्किंसंस को दिया जाता है, जिनके नाम पर इस रोग का नाम रखा गया। उन्होंने इस पर पहला विस्तृत शोधपत्र प्रस्तुत किया। पहले इसे अवसाद के रूप में ही देखा जाता था। ऐसा रोग जिसमें मासपेशियों पर नियंत्रण खोने से व्यक्ति छोटे बच्चों की तरह असंतुलित ढंग से चलने लगता है। याददाश्त खोने लगता है। दरअसल, यह एक जीर्ण रोग है और धीरे-धीरे व्यक्ति पर इसका प्रभाव नजर आता है। व्यक्ति अवसाद जैसी स्थिति में थकान, बेचैनी, मांसपेशियों में दर्द, शरीर में जकड़न महसूस करता है। लेकिन उसे अहसास नहीं होता है कि शरीर में डोपामाइन बनाने वाला तंत्र शिथिल हो गया है।

सेहत में मददगार जीवन प्रबंधन

इस रोग में डॉक्टर द्वारा बतायी गयी दवाइयां रोगी को लेते रहना चाहिए। लेकिन जीवन शैली में ऐसा सकारात्मक बदलाव करना चाहिए ताकि रोग बढ़े ना, बल्कि कम हो। हल्का व्यायाम, योग व अन्य शारीरिक अभ्यास करते रहने चाहिए। जितना हो सके, तनाव कम करने का प्रयास करें।

अपने जुनूनी गुण पहचानें

हर व्यक्ति में एक विशिष्ट गुण होता है- किसी को संगीत का जुनून , किसी को चित्रकला का व किसी को गार्डनिंग का। कोई ऐसा कार्य जिसको करने में मजा आए। ऐसा मन का काम, जिसे करते हुए उसे टाइम का पता न चले। वह कहां है उसका बोध न रहे।

इगो त्यागने से राहत

हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि यदि व्यक्ति में अहंकार नहीं है तो उसे तनाव नहीं होगा। व्यक्ति जो भी करे अपनी प्रकृति के अनुसार करे। दरअसल, जब व्यक्ति रिटायर होता है तो उसे लगता है कि उसकी परिवार में अनदेखी की जा रही है। उसे लगता है कि उसकी बात अब कोई नहीं सुनता। अब नए दौर की पीढ़ी है, वह अपने ढंग से जीवन जीती है। ऐेसे में व्यक्ति को अपना अकेलापन दूर करने के विकल्प तलाशने चाहिए। उसे अपने जैसे अन्य बुजुर्गों को देखना चाहिए। यदि वे सकारात्मक सोच के हैं तो अकेलापन दूर होगा। दरअसल, अहंकार का विक्षिप्त रूप है पार्किंसंस।

खुश रहने के मौके तलाशें

यदि व्यक्ति ज़ॉब से रिटायर हो जाने के बाद अपनी उम्र व सोच के साम्य वाला सर्किल बना ले, तो उसे जीवन का आनन्द मिल सकता है। वह खुश रह सकता है। इसमें योगिक व्यायाम व सैर करना मददगार हो सकते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी कि मित्रों का सर्किल खुशमिजाज लोगों वाला ही हो।

खानपान व जीवन शैली

पार्किंसंस के रोग में प्राणायाम व ध्यान खासे उपयोगी हैं। इसमें पौष्टिक आहार की भी बड़ी भूमिका होती है। यानी जो तनाव पैदा न करे। खाने में फ्रूट लें जो आसानी से हजम हो जाते हैं। सूप व जूस लें। भारी खाने से बचें। इसके रोगी मानसिक स्वास्थ्य के बारे में सोचें। बच्चों के साथ खेलने से व्यक्ति का तनाव कम होता है। हमारे जीवन में लचीलेपन का संतुलन बने।

योग कैसे लाभदायक

पार्किंसंस के रोग में योग शारीरिक व मानसिक रूप से लाभदायक है। हम हल्के आसन करें। ये पवनमुक्त समूह के आसन उपयोगी हो सकते हैं। इसमें सर्पासन, पवनमुक्त, नाड़ीतान आसन खासे मददगार हैं व तनाव को कम करते हैं। उल्टे लेटकर यानी पेट के बल लेटकर करने वाले आसनों में अर्द्ध सर्प व शलभ आसन भी शामिल हैं। सूक्ष्म व्यायाम के अलावा संतुलन के लिये ताड़ आसन करना उपयोगी होता है।

प्राणायाम बेहद उपयोगी

श्वसन से संबंधित योगिक व्यायाम भी इसमें बहुत लाभदायक है। इसमें गहन श्वसनक्रिया बेहद उपयोगी होती है। अनुलोम-विलोम कम से कम दस मिनट करें। भ्रामरी प्राणायाम हमारे तंत्रिकातंत्र के लिये बेहद उपयोगी है। हमारा ध्यान इस दौरान नर्वस सिस्टम पर होने वाली कंपन पर हो। प्राणायाम पूर्णता में हो, सुव्यवस्थित हो। जिससे दिमाग के रसायन ठीक हों। इसके रोगियों को भ्रामरी प्राणायाम दस से बीस बार करने चाहिए।

मेडिटेशन व योगनिद्रा

यह जरूरी है कि ध्यान लगाने की प्रक्रिया योग्य शिक्षक से सीखें। कम से कम पंद्रह-बीस मिनट करें। सुबह-शाम योगासन के दो सेट करें। एक सूर्योदय के समय व दूसरा सूर्यास्त होने पर। कुछ साधन न मिले तो सांसों के जरिये ध्यान लगाएं। जो शऱीर में तनाव कम करे। शरीर में संतुलन लाने का प्रयास करना चाहिए। अहंकार दूर करके व्यवहार में सहजता लाएं। जीवन में आ रहे बदलाव को स्वीकारने का भाव आए। जीवन की यात्रा में बदलाव को सत्य मानें। उससे जीवन में व्यापक बदलाव आएगा।

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