Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

मगर महात्मा को पसंद नहीं था सिनेमा

गांधीजी के जीवन पर फिल्में

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

महात्मा गांधी आम तौर पर फिल्मों से दूर रहे, लेकिन सिनेमा उनसे दूरी नहीं बना सका। फिल्मकारों की हर पीढ़ी ने अपने समय के सवालों संग गांधीजी को नए रूप में पर्दे पर तलाशा—कभी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक के रूप में, कभी पिता के रूप में और कभी रोजमर्रा की जिंदगी में मार्गदर्शक ‘..मुन्नाभाई’ के गांधी के रूप में।

जिस आदमी को सिनेमा की चमक-दमक कभी आकर्षित नहीं कर सकी, उसकी छवि रुपहले पर्दे पर बार-बार लौटती रही। गांधीजी ने फिल्मों से दूरी बनाए रखी, लेकिन सिनेमा गांधी से दूरी नहीं बना सका। हर पीढ़ी ने अपने समय के सवालों के साथ गांधी को नए रूप में पर्दे पर तलाशा—कभी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रतीक के रूप में, कभी एक असहाय पिता के रूप में और कभी रोजमर्रा की जिंदगी में रास्ता दिखाने वाले ‘मुन्नाभाई के गांधी’ के रूप में।

असल सवालों से दूर लगी फिल्में

Advertisement

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में जब भारत में सिनेमा अपनी जगह बना रहा था, उसी समय महात्मा गांधी का स्वतंत्रता आंदोलन भी जन-आंदोलन का रूप ले रहा था। लेकिन गांधी को फिल्मों की दुनिया खास आकर्षित नहीं करती थी। उन्हें लगता था कि सिनेमा में मनोरंजन की प्रधानता है और यह लोगों को वास्तविक जीवन की समस्याओं से दूर ले जा सकता है। भारतीय सिनेमाटोग्राफ समिति के संदर्भ में भी गांधीजी ने सिनेमा के प्रति अपनी असहमति जाहिर की थी। 1937 में ‘हरिजन’ में उन्होंने फिल्मों को लेकर टिप्पणी की। इसे ऐसी तकनीक बताया जिसे वे नैतिक दृष्टि से समस्याग्रस्त मानते थे। उनके लिए जीवन का सच्चा रंग पर्दे पर नहीं, समाज के बीच था।

Advertisement

पूरी तरह अनजान नहीं रहे

फिर भी गांधी पूरी तरह सिनेमा से अनजान नहीं रहे। 1943 में बनी ‘राम राज्य’ उन्होंने बाद में देखी। इससे पहले वे अंग्रेजी फिल्म ‘मिशन टू मॉस्को’ भी देख चुके थे। इसलिए यह धारणा कि गांधीजी ने जीवन में केवल एक फिल्म देखी थी, सही नहीं है। हां, ‘राम राज्य’ को आम तौर पर वह एकमात्र हिंदी फिल्म माना जाता है, जिसे उन्होंने देखा। यही विरोधाभास गांधी और सिनेमा के रिश्ते को दिलचस्प बनाता है—जिस व्यक्ति को फिल्में पसंद नहीं थीं, वही आगे चलकर भारतीय और विश्व सिनेमा के सबसे चर्चित पात्रों में शामिल हो गया।

पर्दे पर आया प्रतिरोध

गांधी के विचारों और व्यक्तित्व की छाया भारतीय सिनेमा पर उनके जीवनकाल में ही दिखाई देने लगी थी। साल 1921 की मूक फिल्म ‘भक्त विदुर’ उल्लेखनीय उदाहरण है। फिल्म के विदुर का पहनावा और व्यक्तित्व गांधी से मिलता-जुलता था। यही समानता अंग्रेजी शासन को खली और फिल्म को सेंसरशिप का सामना करना पड़ा। इसके बाद ‘अछूत कन्या’ (1936) और ‘दुनिया न माने’ (1937) जैसी फिल्मों ने सामाजिक रूढ़ियों, छुआछूत और स्त्री की स्थिति जैसे सवालों को पर्दे पर उठाया। उस दौर के सामाजिक सुधार और समानता के विमर्श से इनका रिश्ता दिखाई देता है।

आजादी के बाद सिनेमा ने गांधी के विचारों को अलग ढंग से याद किया। 1954 की ‘जागृति’ का गीत—‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल’—गांधी की अहिंसक लड़ाई की लोकप्रिय सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन गया।

महात्मा से मनुष्य तक

गांधी समय के साथ पर्दे पर सिर्फ ‘महात्मा’ नहीं रहे, बल्कि उनके भीतर का मनुष्य भी दिखाई देने लगा। साल 1996 की ‘द मेकिंग ऑफ द महात्मा’ गांधी के दक्षिण अफ्रीका के वर्षों और उनके व्यक्तित्व के निर्माण की कहानी कहती है। साल 2007 की ‘गांधी, माई फादर’ ने गांधी के जीवन का एक और कठिन पक्ष सामने रखा—उनका अपने बड़े बेटे हरिलाल के साथ संबंध।

गोडसे से एटनबरो तक

गांधीजी की हत्या ने भी सिनेमा को लंबे समय तक प्रभावित किया। 1963 की ‘नाइन ऑवर्स टू रामा’ ने नाथूराम गोडसे की नजर से हत्या से पहले के अंतिम घंटों को केंद्र में रखा। इसके बाद गांधी पर बनी फिल्मों में उनके जीवन, विचारों और हत्या के अलग-अलग पहलुओं को देखने की कोशिश होती रही। फिर 1982 में रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ ने गांधी को विश्व सिनेमा के बड़े पर्दे पर पहुंचा दिया। बेन किंग्सले ने गांधी की भूमिका निभाई। फिल्म को 11 ऑस्कर नामांकन मिले।

भारतीय सिनेमा ने भी गांधी को सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं रखा। 1993 की ‘सरदार’ में सरदार पटेल और गांधी के रिश्ते के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीति और अंतर्विरोधों को देखा गया। दूसरी ओर ‘तमस’ (1988) और ‘पिंजर’ (2003) ने विभाजन की त्रासदी को दिखाया, जिस दौरान गांधी ने सांप्रदायिक सद्भाव की वकालत की थी।

जब गांधी ‘गांधीगिरी’ बन गए

2006 में ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ ने गांधी को एक बिल्कुल नए अंदाज में लोकप्रिय संस्कृति में वापस ला दिया। यहां गांधी इतिहास की किताब के पन्नों से निकलकर एक आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी में आ गए। ‘गांधीगिरी’ शब्द ने अहिंसा, सत्य और विनम्रता को नए अंदाज में लोकप्रिय बनाया।

हर दौर ने अपने गांधी तलाशे

सिनेमा में गांधीजी की मौजूदगी को केवल गांधी पर बनी फिल्मों की सूची से नहीं समझा जा सकता। उनका असर उन फिल्मों में भी दिखाई देता है, जो बिना गांधी का नाम लिए सत्य, अहिंसा, सामाजिक बराबरी, ग्राम स्वराज, आत्मनिर्भरता और सांप्रदायिक सद्भाव जैसे सवाल उठाती हैं। अभी गांधीजी का सिनेमाई सफर खत्म नहीं हुआ।

Advertisement
×