बोन मैरो ट्रांसप्लांट गंभीर रक्त संबंधी रोगों और ब्लड कैंसर व ल्यूकेमिया आदि के इलाज की एक सुरक्षित और प्रभावी मानी जाने वाली प्रक्रिया है। यह उपचार किसी सर्जरी के बजाय ब्लड चढ़ाने जैसी विधि से होता है, जिससे अस्वस्थ हो चुकी स्टेम सेल्स की जगह हेल्दी सेल्स शरीर में डाल दी जाती हैं। आधुनिक तकनीकों, डोनर्स के बेहतर विकल्पों और जीन थैरेपी आदि ने इस प्रक्रिया को बेहतर बना दिया है। इससे हजारों मरीजों का सामान्य जिंदगी जीना संभव हुआ। बोन मैरो ट्रांसप्लांट तकनीक व लाभों के बारे में बता रहे हैं नयी दिल्ली स्थित हेमेटोलॉजिस्ट एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट फिजिशियन डॉ. नरेंद्र अग्रवाल।
बोन मैरो यानी अस्थि मज्जा हड्डियों के बीच का मुलायम स्पंज जैसा भाग होता है। जो शरीर में व्हाइट ब्लड सेल्स, रेड ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स बनाने व इम्यूनिटी बढ़ाने में मददगार है। कुछ गंभीर रोगों में स्टेम सेल्स असामान्य रूप ले लेती हैं और धीरे-धीरे स्वस्थ कोशिकाओं की जगह घेरने लगती हैं। वहीं कुछ आनुवंशिक बीमारियों में बोन मैरो पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ रक्त कोशिकाएं बना ही नहीं पाता। ऐसे में बोन मैरो ट्रांसप्लांट नामक चिकित्सा प्रक्रिया के तहत रोगी के अस्वस्थ या नष्ट हो चुके बोन मैरो (अस्थि मज्जा) को स्वस्थ स्टेम सेल्स से बदला जाता है। यह मुख्य रूप से ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर), लिंफोमा, मल्टीपल माइलोमा, थैलेसीमिया जैसी गंभीर रक्त संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है।
आम धारणा के उलट, बोन मैरो ट्रांसप्लांट न तो कोई बड़ा ऑपरेशन है और न ही जोखिम भरी प्रक्रिया- यह शरीर के रक्त और रोग-प्रतिरोधक तंत्र को नए सिरे से खड़ा करने की एक वैज्ञानिक विधि है।
सर्जरी नहीं, रक्त चढ़ाने जैसी प्रक्रिया
जब भी डॉक्टर किसी मरीज या उसके परिजनों को बताता है कि उन्हें बोन मैरो ट्रांसप्लांट कराना होगा, तो उनमें डर और उलझन दिखाई देती है। वे सोचते हैं कि रीढ़ की हड्डी में चीरा लगाकर कोई बड़ी सर्जरी की जाएगी। हालांकि असल तस्वीर इससे अलग है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट किसी भी तरह की सर्जरी नहीं है। हार्ट, किडनी या लिवर ट्रांसप्लांट के विपरीत, इसमें ऑपरेशन थिएटर, चीरा या टांके- कुछ भी शामिल नहीं होता। पूरी प्रक्रिया एक सामान्य IV लाइन (इंट्रावेनस लाइन) के जरिये उसी तरह पूरी होती है जैसे किसी मरीज को खून चढ़ाया जाता है। यह जितना आसान दिखता है, इसका असर उतना ही गहरा होता है, क्योंकि यही प्रक्रिया शरीर के संपूर्ण रक्त-निर्माण तंत्र और इम्यून सिस्टम को दोबारा खड़ा कर सकती है। यही कारण है कि आज ब्लड कैंसर और अन्य कई गंभीर आनुवंशिक रक्त रोगों के इलाज में यह एक भरोसेमंद और स्थापित विकल्प बन चुका है।
अंदरूनी फैक्ट्री, जहां बनता है खून
हमारा बोन मैरो असल में एक फैक्ट्री की तरह काम करता है। यहीं से ऑक्सीजन ढोने वाली रेड ब्लड सेल्स, संक्रमण से लड़ने वाली व्हाइट ब्लड सेल्स, और खून बहने से रोकने वाले प्लेटलेट्स तैयार होते हैं। इन तीनों का उद्गम एक ही जगह से होता है - स्टेम सेल्स, जिन्हें पैरेंट सेल भी कहा जा सकता है, क्योंकि जीवनभर यही कोशिकाएं नई रक्त कोशिकाओं को जन्म देती रहती हैं।
बीमारी की जड़ पर वार
ल्यूकेमिया और अन्य ब्लड कैंसर में यही स्टेम सेल्स असामान्य रूप ले लेती हैं और धीरे-धीरे स्वस्थ कोशिकाओं की जगह घेरने लगती हैं। कुछ आनुवंशिक बीमारियों में समस्या इससे अलग होती है, वहां बोन मैरो पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ रक्त कोशिकाएं बना ही नहीं पाता। दोनों ही स्थितियों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट बीमारी की जड़ पर वार करता है, क्योंकि यह खराब स्टेम सेल्स को हटाकर उनकी जगह स्वस्थ स्टेम सेल्स प्रत्यारोपित करता है।
ट्रांसप्लांट से पहले कीमोथेरेपी, और जरूरत पड़ने पर रेडिएशन, के जरिए बोन मैरो को तैयार किया जाता है। चिकित्सा भाषा में इसे कंडीशनिंग कहते हैं। एक समय था जब यह इलाज सिर्फ युवा और पूरी तरह स्वस्थ मरीजों तक सीमित माना जाता था, लेकिन रिड्यूस्ड-इंटेंसिटी रेजिमेन जैसी नई पद्धतियों ने अब बुजुर्ग मरीजों और अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए भी यह रास्ता खोल दिया है।
न चीरा, न टांका - बस एक सुई
वास्तविक ट्रांसप्लांट प्रक्रिया सरल है। स्टेम सेल्स को केवल IV के जरिए शरीर में डाला जाता है, न कोई कट लगता है, न ऑपरेशन थिएटर की जरूरत पड़ती है। इन कोशिकाओं में ‘होमिंग’ नाम की एक खास क्षमता होती है, यानी ये अपने आप बोन मैरो तक का रास्ता ढूंढ लेती हैं और वहीं जाकर बस जाती हैं। दो से चार हफ्तों के भीतर ये नई, स्वस्थ रक्त कोशिकाएं बनाना शुरू कर देती हैं, जिसे एंग्राफ्टमेंट कहा जाता है।
डोनर की तलाश अब मुश्किल नहीं
वर्षों तक बोन मैरो ट्रांसप्लांट की सबसे बड़ी बाधा उपयुक्त डोनर ढूंढना रही। पहले माना जाता था कि केवल पूरी तरह मेल खाने वाला भाई-बहन ही सही डोनर हो सकता है, और भारत जैसे आनुवंशिक रूप से बेहद विविध देश में यह एक बड़ी चुनौती थी। अब यह तस्वीर बदल चुकी है। हाफ-मैच्ड फैमिली ट्रांसप्लांट और डोनर रजिस्ट्रियों से मिलने वाले अनरिलेटेड डोनर्स की मदद से किए गए ट्रांसप्लांट, पूरी तरह मेल खाने वाले सिबलिंग ट्रांसप्लांट जितनी ही सफलता दर दिखा रहे हैं। नतीजन, आज लगभग हर मरीज के लिए उपयुक्त डोनर मिलने की उम्मीद बनी रहती है।
जीन थेरेपी : इलाज की नयी तकनीक
इस क्षेत्र में आ रही नई तकनीकें भी उतनी ही उत्साहजनक हैं। जीन थेरेपी ने सिकल सेल डिजीज और थैलेसीमिया जैसी बीमारियों के इलाज में नई राह दिखाई है, जहां किसी बाहरी डोनर की जरूरत ही नहीं पड़ती है। मरीज की अपनी स्टेम सेल्स को लैब में ठीक करके दोबारा शरीर में डाल दिया जाता है। फिलहाल यह इलाज महंगा है और सीमित देशों में ही
उपलब्ध है।
रिकवरी: धैर्य और निगरानी का दौर
ट्रांसप्लांट के बाद रिकवरी रातोंरात नहीं होती। इम्यून सिस्टम को पूरी तरह सामान्य होने में महीनों लग सकते हैं, और इस दौरान संक्रमण के साथ-साथ ग्राफ्ट-वर्सेस-होस्ट डिजीज पर करीबी नजर रखनी पड़ती है। यह वह स्थिति है जिसमें प्रत्यारोपित इम्यून सेल्स मरीज के अपने ऊतकों को ही निशाना बनाने लगती हैं। राहत की बात यह है कि इम्यूनोसप्रेसिव और टार्गेटेड थैरेपी में हुई प्रगति ने इन जटिलताओं को पहले से कहीं बेहतर नियंत्रित करना संभव बना दिया है, जिससे अधिकतर मरीज इलाज के बाद पढ़ाई, नौकरी और पारिवारिक जिंदगी में सामान्य ढंग से लौट पाते हैं।
डर नहीं, भरोसे की कहानी
ब्लड कैंसर का नाम सुनते ही आज भी परिवारों के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं, और यह स्वाभाविक भी है। लेकिन पिछले दो दशकों में इलाज के क्षेत्र में हुई प्रगति ने यह तस्वीर काफी हद तक बदल दी है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट अब कोई प्रायोगिक इलाज नहीं, बल्कि वैज्ञानिक प्रमाणों पर टिका एक स्थापित उपचार है, जो भारत में लगातार सुरक्षित, प्रभावी और सुलभ होता जा रहा है। असल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट सिर्फ जान नहीं बचाता बल्कि मरीजों को दोबारा एक सामान्य ज़िंदगी जीने का मौका देता है। यही वजह है कि आज देशभर में हजारों मरीजों के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट महज एक इलाज नहीं, बल्कि जिंदगी की एक नई शुरुआत साबित हो रहा है।

