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दर्शकों के थिएटर लौटने से फिर बढ़ी बॉलीवुड की चमक

भारतीय सिनेमा उद्योग लंबे उतार-चढ़ाव और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजरते हुए आज ऐसे मुकाम पर खड़ा दिखाई देता है, जहां उसे फिर से ‘स्वर्ण युग’ जैसे विशेषणों से नवाजा जा रहा है। वर्ष 2025 के आंकड़े पुष्टि...

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भारतीय सिनेमा उद्योग लंबे उतार-चढ़ाव और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजरते हुए आज ऐसे मुकाम पर खड़ा दिखाई देता है, जहां उसे फिर से ‘स्वर्ण युग’ जैसे विशेषणों से नवाजा जा रहा है। वर्ष 2025 के आंकड़े पुष्टि करते हैं कि महामारी के बाद जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थी कि क्या दर्शक सिनेमाघरों में लौटेंगे, क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म थिएटरों को पीछे छोड़ देंगे, यह बात काफी हद तक गलत साबित हुई। दर्शकों की मजबूत वापसी, बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड कमाई और मल्टीप्लेक्स कंपनियों के मुनाफे में उछाल संकेत देते हैं कि सिनेमा का सामूहिक अनुभव आज भी दर्शकों के लिए अहम है।

बीते साल यानी 2025 में भारतीय फिल्मों का ग्रॉस बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 13,395 करोड़ रुपए तक पहुंचना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह आंकड़ा महामारी से पहले के तीन वर्षों के औसत से 32 प्रतिशत अधिक है, जो दर्शकों के व्यवहार में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाता है। लंबे समय तक घरों में बंद रहने और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट देखने के बाद जब दर्शकों को फिर से सिनेमाघरों में लौटने का अवसर मिला, तो उन्होंने इसे उत्साह के साथ अपनाया। तीसरी तिमाही में 4.05 करोड़ दर्शकों का सिनेमाघरों में पहुंचना और पिछले वर्ष की समान अवधि से 8.6 प्रतिशत की वृद्धि यह स्पष्ट करती है कि थिएटर अब केवल मनोरंजन का विकल्प नहीं बल्कि सामाजिक अनुभव का केंद्र बन चुके हैं। इस सफलता के पीछे कई कारक हैं। सबसे प्रमुख कारण मजबूत कंटेंट पाइपलाइन है। वर्ष 2025 में 100 करोड़ रुपए से अधिक कमाने वाली 37 फिल्मों का रिकॉर्ड बनना दर्शाता है कि निर्माताओं ने दर्शकों की पसंद को समझते हुए विविध विषयों पर फिल्में बनाई हैं। बड़े बजट की व्यावसायिक फिल्मों से लेकर छोटे बजट की कंटेंट-आधारित फिल्मों तक, दर्शकों को हर शैली और भाषा में विकल्प मिले। इससे सिनेमाघरों में भीड़ बनी रही।

मल्टीप्लेक्स उद्योग, विशेषकर पीवीआर आइनॉक्स जैसी कंपनियों ने इस उछाल का भरपूर लाभ उठाया है। अक्तूबर-दिसंबर तिमाही में कंपनी का मुनाफा 166.5 प्रतिशत बढ़कर 95.7 करोड़ रुपए तक पूरे प्रदर्शन तंत्र की मजबूती का संकेत है। यह भी कि सिनेमाघर केवल टिकट बिक्री पर निर्भर नहीं बल्कि फूड एंड बेवरेज, प्रीमियम अनुभव और ब्रांड साझेदारियों के जरिए भी राजस्व बढ़ा रहे हैं। औसत टिकट की कीमत 293 रुपए तक पहुंचना और प्रति व्यक्ति खानपान खर्च 146 रुपए तक बढ़ना दर्शकों की खर्च क्षमता और प्राथमिकताएं दर्शाता है। आज दर्शक केवल फिल्म देखने नहीं, बल्कि पूरे अनुभव के लिए सिनेमाघर जाता है। बेहतर स्क्रीन, उन्नत ध्वनि तकनीक, आरामदायक सीटें और खान-पान विकल्प उसके लिए महत्वपूर्ण हो गए। टिकट महंगा होने के बावजूद दर्शक संख्या में वृद्धि हुई।

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सिनेमा का अपना अलग ही नेटवर्क

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पीवीआर आईनॉक्स की रणनीति में छोटे शहरों और नए क्षेत्रों में विस्तार उल्लेखनीय है। 112 शहरों में 1,791 स्क्रीन का नेटवर्क दिखाता है कि सिनेमाघर अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं। टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्क्रीन जोड़ने से नए दर्शक वर्ग तक पहुंच संभव हुई। लेह और गंगटोक जैसे क्षेत्रों में विस्तार संकेत है कि सिनेमा अब देश के हर कोने तक पहुंच रखता है। दक्षिण भारत में 33 प्रतिशत स्क्रीन होना और उत्तर भारत में 27 प्रतिशत स्क्रीन का वितरण क्षेत्रीय संतुलन को दर्शाता है। इस विस्तार का आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट है। मूवी एग्जीबिशन सेगमेंट से कमाई चार गुना बढ़कर 159.3 करोड़ रुपए तक पहुंचना बताता है कि स्क्रीन बढ़ाने की रणनीति सफल रही। मल्टीप्लेक्स उद्योग अब विस्तार के साथ स्थिरता पर भी ध्यान दे रहा है। क्षेत्रीय सिनेमा की भूमिका इस स्वर्णिम दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वर्ष 2025 में क्षेत्रीय फिल्मों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 6,488 करोड़ रुपए तक पहुंचना बताता है कि भारतीय दर्शक अब केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं। मलयालम फिल्मों का लगातार दूसरे वर्ष 1,000 करोड़ रुपए से अधिक कमाई करना दिखाता है कि क्षेत्रीय उद्योग गुणवत्ता और कहानी कहने के स्तर पर नई ऊंचाइयां छू रहा है।

ये फ़िल्में बनी सफलता का आधार

भारतीय सिनेमा के लिए साल 2025 यादगार रहा। इस साल महामारी के बाद गुम हुई सिनेमा संस्कृति पूरी तरह लौट आई और बड़े बजट, दमदार कंटेंट व पैन-इंडिया अपील ने बॉक्स ऑफिस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। साल के शुरू में ‘छावा’ ने दर्शकों को आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो साल के अंत में ‘धुरंधर’ ने चमत्कृत किया। कांतारा भी सफल रही। इन एक्शन फिल्मों से लगा कि दर्शक को ऐसी फ़िल्में ज्यादा पसंद आ रही हैं, तो यह भ्रम ‘सैयारा’ ने तोड़ दिया। इस प्रेम कहानी ने दर्शकों को मोहब्बत से सराबोर किया। ‘स्त्री-2’ ऐसी फिल्म रही, जिसने कंटेंट की ताकत साबित की। हॉरर-कॉमेडी के सफल फॉर्मूले, मजबूत स्क्रिप्ट और राजकुमार राव-श्रद्धा कपूर की जोड़ी ने दर्शकों को आकर्षित किया। छोटे बजट में बड़े मुनाफे ने इसे ट्रेड की पसंदीदा फिल्म बनाया। ‘पुष्पा-2’ ने भी कमाई का सिलसिला जारी रखा। विजुअल ग्रैंड्योर और पौराणिक-साइंस फिक्शन मिश्रण से दर्शकों को ‘कल्कि 2898 एडी’ ने सिनेमाघरों तक खींचा। प इसके अलावा ‘भूल भुलैया-3’ जैसी कुछ मध्यम बजट की सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया। क्योंकि, दर्शक अब कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा को प्राथमिकता दे रहे हैं।

बड़े परदे का अनुभव कुछ अलग ही

डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बावजूद सिनेमाघरों की लोकप्रियता का कारण यह भी है कि बड़े पर्दे का अनुभव अब भी अद्वितीय है। बड़े बजट की फिल्मों के दृश्य प्रभाव, ध्वनि और सामूहिक दर्शक प्रतिक्रिया को घर पर दोहराना कठिन है। इसके अलावा, मल्टीप्लेक्स कंपनियों ने प्रीमियम फॉर्मेट्स और तकनीकी नवाचारों के जरिए सिनेमाघरों को आधुनिक बना दिया है। इससे युवा दर्शकों को आकर्षित करने में मदद मिली है। हालांकि, इस चमकदार तस्वीर के बीच कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। टिकट कीमतों में लगातार वृद्धि भविष्य में मध्यम वर्ग और छोटे शहरों के दर्शकों पर प्रभाव डाल सकती है। कंटेंट की गुणवत्ता बनाए रखना भी उद्योग के लिए बड़ी चुनौती है। फिर भी, आंकड़े दर्शाते हैं कि भारतीय सिनेमा उद्योग ने महामारी के बाद न केवल खुद को पुनर्जीवित किया बल्कि नए विकास मॉडल भी विकसित किए। क्षेत्रीय भाषाओं का उदय, मल्टीप्लेक्स का विस्तार, प्रीमियम अनुभवों की मांग और विविध कंटेंट की उपलब्धता मिलकर मजबूत पारिस्थितिकी बना रहे हैं।

आत्मविश्वास की वापसी का प्रतीक

फिल्म उद्योग के सामने अपार संभावनाएं हैं। युवा आबादी, बढ़ती आय और शहरीकरण सिनेमा के लिए दीर्घकालिक बाजार तैयार कर रहे हैं। यदि कंपनियां छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में किफायती और सुलभ सिनेमाघर मॉडल विकसित करती हैं, तो दर्शकों का आधार और व्यापक हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता विदेशी राजस्व के नए अवसर खोल रही है। अंततः, वर्ष 2025 भारतीय सिनेमा के लिए केवल आर्थिक सफलता का वर्ष नहीं बल्कि आत्मविश्वास की वापसी का प्रतीक है। दर्शकों ने यह साबित कर दिया है कि सिनेमा उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है। मजबूत कंटेंट, तकनीकी नवाचार और व्यापक विस्तार की रणनीतियों ने उद्योग को एक नए युग में प्रवेश कराया है। यदि गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया तो आने वाले वर्षों में भारतीय सिनेमा घरेलू बाजार व वैश्विक मंच पर और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। यही कारण है कि वर्तमान दौर को सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जा रहा है।

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