Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

अनुकूल दिनचर्या व भोजन से बेहतर स्वास्थ्य

शिशिर ऋतु में सेहत

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

मकर संक्रांति से आरम्भ होने वाली शिशिर ऋतु में शरीर में कफ का संचय होने लगता है व जठराग्नि प्रबल हो जाती है। भूख अधिक लगती है। दरअसल यह आदान-काल का प्रवेश-द्वार है, जो शरीर से विशेष सावधानी, पोषण और संतुलन की अपेक्षा करता है। इन दिनों आयुर्वेदिक ऋतुचर्या के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन-व्यवहार अपनाया जाए, तो मौसमी रोगों से रक्षा होती है, वहीं बल व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

भारतवर्ष को ऋतुओं का देश कहा गया है। यहां षड्ऋतु-चक्र क्रमशः चलता रहता है—एक ऋतु के जाने पर दूसरी ऋतु का आगमन होता है। हेमंत ऋतु के पश्चात शिशिर ऋतु आती है। शिशिर ऋतु मकर संक्रांति से आरम्भ होकर आदान-काल की शुरुआत को सूचित करती है। आयुर्वेद के अनुसार, वर्ष को दो प्रमुख कालों—आदान काल और विसर्ग काल—में विभाजित किया गया है। आदान काल वह समय है जिसमें सूर्य उत्तरायण होकर अपनी तीव्र, रूक्ष और शोषक किरणों द्वारा पृथ्वी तथा समस्त प्राणियों से बल, स्निग्धता और सौम्यता का क्रमशः हरण करता है। शिशिर ऋतु इस आदान-काल की प्रथम ऋतु है, अतः यह शरीर, मन और जीवन-व्यवहार पर दूरगामी प्रभाव डालती है। इस ऋतु में शीत अपने चरम पर पहुंच जाती है और कई क्षेत्रों में तापमान अत्यन्त न्यून स्तर तक गिर जाता है।

ठंडे मौसम में उपयोगी धूप सेवन

शिशिर ऋतु में दिन छोटे और रातें लम्बी हो जाती हैं। ग्रीष्म ऋतु में जो सूर्य-ताप असहनीय और कष्टदायक प्रतीत होता है, वही ताप इस ऋतु में सुखद और हितकारी लगने लगता है। सूर्य की किरणें दुर्बल नहीं होतीं, अपितु शीत वातावरण में वे शरीर के लिए उपयोगी सिद्ध होती हैं। हिमालय और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में इस काल में हिमपात होता है। कई बार तो पर्वत, वन, मार्ग, सरोवर, गृह और उद्यान—सभी हिम से आच्छादित हो जाते हैं। जल भी हिम में परिवर्तित हो जाता है। हालांकि पर्वतीय क्षेत्रों में शिशिर ऋतु में जीवन अत्यन्त दुरूह हो जाता है। निरन्तर हिमपात, शीतलहर और तीव्र पवन के कारण लोग प्रायः घरों के भीतर ही रहते हैं, बाहर कम निकलते हैं। शिशिर ऋतु में वातावरण को गर्म रखना स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित होता है। उसके लिए आग तापना और और गर्म कपड़ों का प्रयोग सुखद और सुरक्षात्मक अहसास देता है। इसके विपरीत, यही शिशिर ऋतु पर्वतीय क्षेत्रों को अत्यन्त रमणीय भी बना देती है। चारों ओर फैली हिम की श्वेत चादर पृथ्वी को मानो शुभ्र वस्त्र से ढक देती है।

कफ संचय और जठराग्नि की प्रबलता

आयुर्वेदिक दृष्टि से शिशिर ऋतु का महत्व अत्यन्त गहन है। इस ऋतु में बाह्य वातावरण में शीत और रुक्षता की प्रधानता होती है। ऐसे में शरीर में कफ का संचय स्वाभाविक रूप से होने लगता है। साथ ही शीत के प्रभाव से शरीर अपनी आन्तरिक ऊष्मा को संरक्षित रखने का प्रयास करता है, जिससे जठराग्नि प्रबल हो जाती है। यही कारण है कि शिशिर ऋतु में भूख अधिक लगती है और भोजन की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। यदि इस समय शरीर को पर्याप्त एवं उपयुक्त पोषण न मिले, तो बलक्षय, संधिशूल, त्वचा की रुक्षता, कास, श्वास तथा प्रतिश्याय जैसे विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

स्निग्ध, उष्ण और बलवर्धक आहार

शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि आदान-काल में प्रतिदिन शरीर के गुणों—जैसे बल, ओज और स्निग्धता—का हरण होता है। अतः इस काल में आहार द्वारा इन गुणों की पूर्ति करना आवश्यक है। शिशिर ऋतु में गुरु, स्निग्ध, उष्ण और बलवर्धक आहार की विशेष अनुशंसा की गई है। तिल, घृत, दुग्ध, पुराना गुड़, मूंगफली तथा विविध अन्न-दालों से बने सुपाच्य भोजन वात-कफ को संतुलित रखते हैं और शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं। अत्यधिक रूक्ष, शीतल और अल्प आहार इस ऋतु में शरीर के लिए अहितकर सिद्ध होता है।

हल्का व्यायाम है लाभकारी

विहार की दृष्टि से शिशिर ऋतु में शीत से संरक्षण अत्यन्त आवश्यक है। उष्ण वस्त्रों का प्रयोग, नियमित तैलाभ्यंग, हल्का व्यायाम और समय पर निद्रा शरीर को ऋतुजन्य विकारों से सुरक्षित रखते हैं। प्रातःकालीन सूर्य-किरणों का सेवन विशेष रूप से लाभकारी माना गया है, क्योंकि यह प्राण शक्ति को जाग्रत करता है, प्रतिरक्षा-तंत्र को सुदृढ़ बनाता है और मानसिक स्फूर्ति प्रदान करता है। दिनचर्या में अनुशासन और संयम इस ऋतु में विशेष महत्व रखते हैं।

मानसिक दृष्टि से भी शिशिर ऋतु का प्रभाव उल्लेखनीय है। दीर्घ रात्रियां और सीमित प्रकाश कभी-कभी आलस्य, उदासी और निष्क्रियता को बढ़ा सकते हैं। अतः सकारात्मक दिनचर्या, उचित आहार-विहार और सूर्य-प्रकाश का सेवन मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक होता है।

प्रकृति के साथ बनाएं सामंजस्य

शिशिर ऋतु केवल ठंड और हिम का मौसम नहीं है, बल्कि आदान-काल का प्रवेश-द्वार है, जो शरीर से विशेष सावधानी, पोषण और संतुलन की अपेक्षा करता है। यह ऋतु हमें संयम, संरक्षण और प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश देती है। यदि इस काल में आयुर्वेदिक ऋतुचर्या के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन-व्यवहार अपनाया जाए, तो न केवल ऋतुजन्य रोगों से रक्षा होती है, बल्कि बल, ओज, प्रतिरोधक क्षमता और दीर्घायु की प्राप्ति भी सुनिश्चित होती है। शिशिर ऋतु वास्तव में स्वास्थ्य-संरक्षण और शरीर-संवर्धन का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसे समझना और आत्मसात करना आज के समय में अत्यन्त आवश्यक है।

Advertisement
×