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बेहतर पाचन और पोषण की नींव संयमित खानपान से

वर्तमान तेज रफ्तार जिंदगी में भोजन को भूख शांत करने और एनर्जी प्राप्त करने का साधन माना जाता है। यदि हम जल्दी में, तनाव में, स्क्रीन देखते हुए, उससे पाचन बिगड़ता है और रोग बढ़ते हैं। लेकिन श्रीभगवद्गीता के...

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वर्तमान तेज रफ्तार जिंदगी में भोजन को भूख शांत करने और एनर्जी प्राप्त करने का साधन माना जाता है। यदि हम जल्दी में, तनाव में, स्क्रीन देखते हुए, उससे पाचन बिगड़ता है और रोग बढ़ते हैं। लेकिन श्रीभगवद्गीता के अनुसार भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि एक यज्ञ है। यदि हम भोजन को सम्मान दें, तो हमारा स्वास्थ्य सुधरेगा। अधिक भोजन पाचक अग्नि को दबाता है, जबकि संयम अग्नि को जाग्रत करता है।

तेज़ रफ्तार जीवन, स्क्रीन से घिरी दिनचर्या और झटपट खाने की आदतों ने आज स्वास्थ्य की सबसे बुनियादी व्यवस्था - पाचन को असंतुलित कर दिया है। दुनिया भर में करोड़ों लोग पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं। केवल अमेरिका में ही 40 प्रतिशत से अधिक लोग प्रतिदिन किसी न किसी पाचन समस्या से प्रभावित हैं। इसके दुष्परिणाम कई बार हृदय रोग या कैंसर जितने घातक सिद्ध होते हैं।

आमतौर पर भोजन को हम एक यांत्रिक प्रक्रिया मानते हैं - भूख लगी, खाना खाया, ऊर्जा मिली। लेकिन श्रीभगवद्गीता इस साधारण से दिखने वाले कर्म में भी दैवी व्यवस्था को उजागर करती है। गीता बताती है कि भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को संचालित करने वाली सूक्ष्म शक्ति से जुड़ा एक यज्ञ है।

भगवद्गीता के 15वें अध्याय के 14वें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं – ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः। प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥’ अर्थात - मैं ही वैश्वानर अग्नि बनकर सभी प्राणियों के शरीर में निवास करता हूं, प्राण और अपान वायु के साथ मिलकर मैं चार प्रकार के अन्न का पाचन करता हूं। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि जो शक्ति भोजन को पचाती है, वही शक्ति जीवन को भी संचालित करती है। गीता के अनुसार खाने वाला, पचाने वाला और ऊर्जा देने वाला - तीनों एक ही शक्ति के विभिन्न रूप हैं।

आधुनिक सोच में शरीर को एक मशीन की तरह देखा जाने लगा है - ईंधन डालो और काम लो। लेकिन गीता इस धारणा को खारिज करती है। वह कहती है कि शरीर एक सजीव यज्ञकुंड है और उसमें जलने वाली पाचन अग्नि स्वयं ईश्वर का रूप है। इसी कारण भारतीय परंपरा में भोजन से पहले गीता का यह श्लोक उच्चारित किया जाता है – ‘ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्…’, जिसका भाव है - अर्पण भी ब्रह्म है, आहुति भी ब्रह्म है, अग्नि भी ब्रह्म है और कर्म भी ब्रह्म है। इस दृष्टि से भोजन कोई भोग नहीं, बल्कि यज्ञ बन जाता है।

संतुलित आहार की प्राचीन समझ

गीता अन्न को चार वर्गों में विभाजित करती है। भक्ष्य यानी चबाकर खाया जाने वाला भोजन। भोज्य मतलब निगलकर खाया जाने वाला, लेह्य - चाटने योग्य और चोष्य यानी चूसने योग्य भोजन। यह वर्गीकरण आज की बैलेंस्ड डाइट की अवधारणा का प्राचीन रूप है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि इन सभी प्रकार के अन्न को पचाने वाली शक्ति वही वैश्वानर अग्नि है। यह दृष्टि हमें संयम, कृतज्ञता और संतुलन का पाठ पढ़ाती है।

समान भोजन, असमान पाचन?

चिकित्सक जानते हैं कि समान भोजन करने के बावजूद हर व्यक्ति का पाचन समान नहीं होता। कारण स्पष्ट है - भोजन से अधिक महत्वपूर्ण है पाचन शक्ति। गीता कहती है कि उस पाचन शक्ति का नाम वैश्वानर है। एक ऐसी ऊर्जा जो शरीर और चेतना को जोड़ती है। यही समझ चिकित्सा विज्ञान को भी यह सिखाती है कि उपचार में अंतिम भूमिका किसी सूक्ष्म दैवी संतुलन की होती है। एक मां जब कहती है – ‘शायद बच्चे की अंदर की ताकत कमजोर है’, तो अनजाने में वह गीता का ही सत्य बोल रही होती है।

शरीर को कष्ट नहीं, अग्नि को संतुलन

भारतीय योग और उपवास की परंपरा शरीर को दंड देने के लिए नहीं, बल्कि वैश्वानर अग्नि को संतुलित करने के लिए है। अधिक भोजन अग्नि को दबाता है, जबकि संयम अग्नि को जाग्रत करता है। इसीलिए गीता कहती है कि शरीर की देखभाल भी एक आध्यात्मिक अनुशासन है। आज हम जिस तरह खाते हैं। जल्दी में, तनाव में, स्क्रीन देखते हुए, उससे पाचन बिगड़ता है और रोग बढ़ते हैं। गीता का यह श्लोक हमें एक गहरा प्रश्न पूछने को मजबूर करता है - क्या हमने भोजन को सिर्फ पेट का विषय बना दिया है, आत्मा का नहीं?

कृतज्ञता से शुरू होता स्वास्थ्य

स्वामी ज्ञानानंद के अनुसार, गीता 15.14 यह सिखाती है कि ईश्वर हर कौर में उपस्थित है। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि जो पचाता है, वह भी वही है - तो भोजन में संयम आता है और जीवन में विनम्रता। परंपरागत भारतीय घरों में भोजन से पहले की जाने वाली प्रार्थना कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि मानसिक तैयारी थी, जिससे मन शांत होता और पाचन सुधरता है।

आधुनिक जीवन में गीता का आईना

आज का मनुष्य भोजन करते समय शायद ही कभी इस पर ध्यान देता है कि वह किस मानसिक अवस्था में खा रहा है। जल्दी-जल्दी खाना, मोबाइल पर नजर, तनाव, क्रोध या चिंता की अवस्था में भोजन करना - ये सभी आज सामान्य आदतें बन चुकी हैं। आयुर्वेद और योगशास्त्र पहले से ही चेतावनी देते आए हैं कि ऐसी स्थिति में लिया गया भोजन शरीर के लिए पोषण नहीं, बल्कि बोझ बन जाता है। भगवद्गीता का वैश्वानर सिद्धांत इस आधुनिक जीवनशैली पर एक दार्शनिक प्रश्नचिह्न लगाता है। गीता हमें यह समझाती है कि भोजन केवल रासायनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चेतना से जुड़ी क्रिया है। जब मन अशांत होता है, तो पाचन अग्नि भी असंतुलित हो जाती है। यही कारण है कि समान भोजन करने पर भी किसी का पाचन ठीक रहता है और किसी का बिगड़ जाता है। गीता के अनुसार इसका उत्तर शरीर की आंतरिक शक्ति-वैश्वानर में छिपा है।

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद का विषय

महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में पूछा गया प्रश्न – ‘प्राणी किससे जीवित रहता है?’, जितना सरल लगता है, उसका उत्तर उतना ही गूढ़ है। युधिष्ठिर उत्तर देते हैं कि प्राणी केवल अन्न या जल से नहीं, बल्कि उस शक्ति से जीवित रहता है जो अन्न को भीतर पचा सके। यह कथन गीता के 15.14 श्लोक की ही व्याख्या है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जीवन का आधार भोजन नहीं, बल्कि पाचन-शक्ति है। यदि पाचन शक्ति संतुलित नहीं, तो उत्तम भोजन भी शरीर को लाभ नहीं पहुंचा सकता।

योग, उपवास और संयम : दैवी विज्ञान

भारतीय परंपरा में योग और उपवास को अक्सर गलत समझ लिया जाता है। इन्हें शरीर को कष्ट देने की प्रक्रिया माना जाता है, जबकि इनका वास्तविक उद्देश्य वैश्वानर अग्नि को संतुलित करना है। अधिक भोजन पाचन अग्नि को दबा देता है, वहीं नियंत्रित आहार और उपवास उसे पुनः जाग्रत करते हैं। गीता के अनुसार, शरीर की देखभाल केवल भौतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुशासन है। जब मनुष्य अपने शरीर को यज्ञकुंड रूप में देखता है, तब वह भोजन, विश्राम और श्रम, तीनों में संतुलन स्थापित करता है।

कृतज्ञता : स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी

स्वामी ज्ञानानंद के अनुसार गीता 15.14 यह सिखाती है कि जब मनुष्य यह भाव विकसित करता है कि जो भोजन को पचाता है, वही ईश्वर है, तब भोजन में संयम और जीवन में विनम्रता अपने आप आ जाती है। परंपरागत भारतीय परिवारों में भोजन से पहले प्रार्थना करने की परंपरा इसी भावना की अभिव्यक्ति थी। यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि मन को शांत करने और शरीर को भोजन के लिए तैयार करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया थी।

फास्ट फूड बनाम फास्ट लाइफ

आज का समाज फास्ट फूड और फास्ट लाइफ के दौर में जी रहा है। भोजन केवल स्वाद और तृप्ति का साधन बन गया है, जीवन का संस्कार नहीं। गीता का वैश्वानर सिद्धांत इस प्रवृत्ति को चुनौती देता है और याद दिलाता है कि भोजन यदि यज्ञ नहीं रहेगा, तो शरीर रोगों का घर बन जाएगा। वैश्वानर सिद्धांत हमें एक अत्यंत सरल लेकिन गहन सत्य से परिचित कराता है कि जीवन की गुणवत्ता भोजन की मात्रा या स्वाद से नहीं, बल्कि पाचन और चेतना के संतुलन से निर्धारित होती है। आज जब मानव अनेक आधुनिक रोगों से जूझ रहा है, तब गीता का यह श्लोक केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, बल्कि एक जीवनोपयोगी मार्गदर्शन बन जाता है। यदि हम भोजन को सम्मान दें, शरीर को यज्ञ मानें और पाचन को ईश्वर की कृपा समझें, तो न केवल हमारा स्वास्थ्य सुधरेगा बल्कि जीवन-दृष्टि भी अधिक संतुलित और सकारात्मक होगी। कभी-कभी अध्यात्म आकाश में नहीं, थाली में उतरता है। -लेखक पूर्व कुलपति हैं।

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