कई माह चलने वाले त्योहारों के सीजन के बाद मार्च में नौकरीपेशा लोगों के लिए कार्य स्थल पर दबाव भी बढ़ जाते हैं। खासकर वित्तीय क्लोजिंग के दिनों में टारगेट पूरे करने, अप्रेज़ल, टैक्स निवेश जैसी चिंताएं रहती हैं। वहीं घरेलू बजट काबू में रखने का भी प्रेशर होता है। जिस कारण लोग भविष्य और नौकरी की स्थिति को लेकर बेचैन हो जाते हैं। इससे कैरियर बर्नआउट की आशंका बन जाती हैं। आवेश में वे कैरियर संबंधी बड़ा फैसला यानी रिजाइन कर बैठते हैं। जिसे टाला जा सकता है।
भारत में त्योहार सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक अवसर नहीं होते। वे हमारी सामूहिक भावनाओं, उम्मीदों और सामाजिक दबावों से भी गहरे तक जुड़े होते हैं। दीपावली से लेकर मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अंततः होली उत्सवों की लगातार चलने वाली शृंखला है। यह उत्सवी परंपरा जितनी रंगीन और खुशियों से भरी दिखती है, उतनी ही थकाने-उबाने वाली भी होती है। यही कारण है कि किसी भी वित्तीय वर्ष का मार्च का महीना भले बसंत में आता हो, लेकिन यह सही मायनों में कैरियर और मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद खतरनाक महीना साबित होता है।
उत्सव से जुड़ी बाध्यताएं
दरअसल त्योहारों की खुशी अब अकसर स्वाभाविक न रहकर अनिवार्य हो चुकी है। मुस्कुराना, मिलना-जुलना, उपहार देना, रिश्तों को निभाना और इस दौरान लगातार खर्च करना, इन सबके बीच व्यक्ति को यह साबित भी करना पड़ता है वह खुशहाल है। समस्या तब शुरू होती है, जब यह खुशी अभिनय बन जाती है। जो लोग पहले से ही नौकरी के दबाव, असंतोष या अनिश्चित भविष्य की स्थितियों से जूझ रहे होते हैं, उनके लिए त्योहार एक तरह का भावनात्मक बोझ बन जाता है। वे दिखते तो मुस्कुराते हुए, लेकिन वास्तव में वे अंदर से टूटे और थके होते हैं। क्योंकि नंवबर से मार्च तक लगातार उत्सव परंपरा चलने के कारण वे बर्नआउट हो चुके होते हैं या इसकी दहलीज पर पहुंच गये होते हैं। क्योंकि इस अवधि में शायद ही कोई ऐसा महीना होता हो, जब यात्रा न करनी पड़ती हो, अनुमान से ज्यादा खर्च न करना पड़ता हो व पारिवारिक अपेक्षाएं लगातार न बढ़ रही हों। ठीक उसी समय में काम का बोझ काफी बढ़ चुका होता है। एक तरह से रुक-रुककर लेकिन लगातार ऑफिस में छुट्टियों के कारण रुका हुआ काम पहाड़ जैसे बन जाता है। इस निरंतरता का असर शरीर से ज्यादा मस्तिष्क पर पड़ता है। क्योंकि दिमाग को न तो पूरी तरह से काम का मोड मिलता है और न ही विश्राम की स्थितियां बनती हैं। इससे धीरे-धीरे क्रॉनिक फटीग यानी स्थाई थकान की स्थिति बन जाती है।
वित्तीय वर्षांत में दबाव की शुरुआत
मार्च सिर्फ त्योहारों का महीना नहीं होता। वित्तीय नजरिये से यह क्लोजिंग महीना है। इसलिए इस महीने में कई तरह के दबाव साथ चलते हैं। जैसे टारगेट पूरे करने का दबाव, परफोर्मेंस रिव्यू, बोनस की अनिश्चितता, अप्रेज़ल की चिंता, टैक्स निवेश और पारिवारिक खर्च को काबू में रखने का दबाव। चूंकि मार्च में त्योहारों की इंतहा और उनका समापन होता है। ऐसे में हर बार अनुमान से ज्यादा खर्च होता है। जिस कारण लोग बैंक बैलेंस, भविष्य और नौकरी की स्थिति को लेकर कहीं ज्यादा बेचैन हो जाते हैं। मार्च में होली का पर्व भारत में लोगों के उत्साह का चरम होता है। लेकिन उसके तुरंत बाद शून्य जैसी स्थिति हो जाती है और दिमाग सोचने लगता है क्या मेरी यही जिंदगी है? क्या यही काम मैं अगले 20 साल तक कर सकता हूं और क्या मैं त्योहारों के इंतजार में ही जी रहा हूं? दरअसल इन्हीं सवालों से कैरियर बर्नआउट की शुरुआत होती है।
कैरियर बर्नआउट के मायने
कैरियर बर्नआउट केवल साधारण थकान नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें काम से नफरत होने लगती है। छोटी-छोटी बातों से चिड़चिड़ापन होने लगता है। छुट्टी लेने के बाद भी आपको आराम का मौका नहीं मिलता और सामान्य दिन की तरह छुट्टियों वाला दिन कुछ और जिम्मेदारी से भर जाता है, इस कारण रविवार को लेकर खुशी नहीं बोझ महसूस होने लगता है और सोमवार से काम के दबाव से डर लगने लगता है। यानी मार्च माह कैरियर बर्नआउट के लिहाज से बहुत बोझिल होता है। त्योहार, रिश्ते और नौकरी के बीच जो भी संतुलन बनाने में असफल रहता है, उसके लिए सब कुछ फेल होने की स्थितियां यानी कैरियर बर्नआउट की आशंकाएं पैदा हो जाती हैं। खासकर नौकरीपेशा वालों को कैरियर बर्नआउट जैसी थकान का अहसास होने लगता है। पर आंकड़े बताते हैं कि मार्च के महीने में सबसे ज्यादा कैरियर बर्नआउट की घटनाएं दर्ज होती हैं और इन सबमें 30 से 45 वर्ष की आयुवर्ग के प्रोफेशनल्स सबसे ज्यादा शिकार होते हैं, विशेषकर शिक्षक और मीडियाकर्मी। इस दौरान कारपोरेट सेक्टर और टारगेट बेस्ड जॉब करने वाले सब लोग इस अहसास से भर जाते हैं कि उन्हें जीवन में आराम नहीं मिल रहा, इसलिए नौकरी बोझ सरीखी लगने लगती है।
बर्नआउट के बाद क्या
भले मार्च में बर्नआउट की स्थितियां ही बनें और उसका नतीजा अप्रैल या मई के महीने में देखने को मिले, फिर भी जांच पड़ताल से यह मालूम पड़ा है कि ज्यादातर लोगों के अपने काम से रिजाइन देने की स्थितियां मार्च के महीने में ही बनती हैं। इससे वे आवेश में कैरियर संबंधी फैसला कर बैठते हैं और नतीजतन उन्हें नौकरी छोड़कर भटकन का शिकार होना पड़ता है। अगर गहराई से सोचें तो यह नौकरी छोड़ने का कैल्कुलेशन नहीं होता बल्कि मार्च के महीने की थकान का विस्फोट होता है। इसलिए जरूरी है कि मार्च के महीने में कैरियर संबंधी महत्वपूर्ण फैसला लेने से बचें। तुरंत नौकरी छोड़ना किसी तरह कैरियर के लिए समाधान नहीं बल्कि खुद को परेशानी में डालने का सबब है। इसलिए मार्च के महीने में कोशिश करके एक-दो दिन का मानसिक ब्रेक लेना जरूरी है और अपने कैरियर संबंधी महत्वपूर्ण फैसलों को अप्रैल तक टालना जरूरी है, नहीं तो कैरियर के लिए मार्च का महीना शोक गीत लिखने वाला साबित होता है। -इ.रि.सें.
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