सेहत संवारने और तेज बढ़ाने की शरद ऋतु
सर्दी शरीर को संवारने व ऊर्जा सहेजने का सर्वोत्तम मौसम होता है। ऐसे में जरूरी है कि हम ऐसे खानपान व विहार को अपनायें जो प्रकृति की लय के साथ चले। इन दिनों शरीर को भारी व पौष्टिक भोजन...
सर्दी शरीर को संवारने व ऊर्जा सहेजने का सर्वोत्तम मौसम होता है। ऐसे में जरूरी है कि हम ऐसे खानपान व विहार को अपनायें जो प्रकृति की लय के साथ चले। इन दिनों शरीर को भारी व पौष्टिक भोजन देना चाहिये। आयुर्वेद के अनुसार शीत ऋतु में लवण, अम्ल व मधुर प्रकृति का आहार उत्तम है। घी खास तौर पर उपयोगी है। गुड़ पाचन शक्ति बढ़ाता है व जठराग्नि को उद्दीप्त करता है।
हमारी चिकित्सा व्यवस्था के बाजार केंद्रित होने और हमारे द्वारा पश्चिमी जीवन शैली और खानपान का अंधानुकरण करने से हम सदियों पुराने आहार-विहार को भूल गए हैं। हम एक नया साल ऐसे वक्त में मना रहे होते हैं जब चारों ओर कोहरे, शीत-लहर और उदासीनता का वर्चस्व होता है। बाजार व चिकित्सा कारोबार हमें सर्दी के नाम पर भयादोहन करता है। वास्तव में शीत ऋतु शरीर को स्वस्थ बनाने का स्वर्णिम अवसर होता है। यदि हम सही खानपान व विहार को अपनायें तो सर्दियों में बनायी सेहत सारे साल काम आ सकती है। दरअसल, यह वक्त प्रकृति की लय में जीने का होता है। यदि हम आयुर्वेद में वर्णित बातों व सिद्धांतों का अनुकरण करें तो सर्दियों में निरोगी काया का दुर्लभ सुख हासिल कर सकते हैं।
निरोगी काया के सूत्र
असल में, सर्दियों में ठंड से बचाव के लिए शरीर कैसे प्रतिक्रिया देता है और इस दौरान हमारा खानपान कैसे होना चाहिए, वागभट्ट का अष्टागंहृदय विस्तृत रूप में मार्गदर्शन करता है। यह विडंबना ही है कि प्रकृति की लय के साथ जीवन को ढालने वाले प्राचीन ज्ञान की हम लगातार अनदेखी करते हैं। शीत ऋतु में निरोगी काया के सूत्रों का अष्टांग हृदय में विस्तार से वर्णन किया गया है। यह निर्विवाद तथ्य है कि आयुर्वेद के सिद्धांत ‘यथा पिंड तथा ब्रह्मांडे’ के अनुरूप हमारे शरीर के पंचमहाभूत तत्व व्यवहार करते हैं।
वास्तव में सर्दी का मौसम शरीर को बनाने व संवारने का सर्वोत्तम मौसम होता है। दरअसल, सर्दियों में हमारा शरीर प्रकृति के अनुसार खुद को ढालने के लिये कोशिकाओं को संकुचित करके ऊर्जा को अपने भीतर संजो लेता है। ऊष्मा को बचाने के लिये शरीर के रोम सिकुड़ जाते हैं। जिसका मकसद शरीर की गर्मी को बाहर जाने से रोकना होता है। फिर ये बढ़ी ऊर्जा हमारे शरीर के केंद्र यानी जठराग्नि में केंद्रित हो जाती है। ये संचित ऊर्जा जठराग्नि को प्रबल बना देती है। ये शरीर की आत्मरक्षा प्रणाली को संरक्षण देती है। लेकिन यह अग्नि दुधारी तलवार की भांति होती है। यदि इस मौसम में शरीर को भारी व पौष्टिक भोजन न दिया जाए तो ये अग्नि हमारी शरीर की अन्य धातुओं को भस्म कर सकती है। जिससे शऱीर में कमजोरी बढ़ने, रूखापन आने और वात का प्रकोप बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है जाड़ों के दिनों में भूखा रहना सेहत के लिये घातक माना जाता है।
अनुकूल भोजन से स्वास्थ्य
दरअसल, आयुर्वेद शरीर को यज्ञ की वेदी मानता है। जठराग्नि इस वेदी की अग्नि है। जो सर्दी की ऋतु में प्रबल हो जाती है। इस मौसम में खाया गया भोजन बलवर्धक होता है और शरीर को लगता है। यदि इस यज्ञ में उत्तम आहुति दी जाती है यानी गुणवत्ता व मौसम अनुकूल भोजन खाया जाता है, स्वास्थ्य उत्तम हो जाता है। उससे हमारी सात धातुओं रस (प्लाज्मा), रक्त, मांस (मांसपेशियां), मेद (वसा), अस्थि, मज्जा (बोनमैरो) व शुक्र (प्रजनन संबंधी ऊतक) का बेहतर निर्माण होता है। वास्तव में ये स्वस्थ धातुएं स्वस्थ शरीर व हमारे तेज का निर्माण करती हैं।
खानपान की प्रकृति
आयुर्वेद के अनुसार शीत ऋतु में तीन तरह की प्रकृति वाले भोजन पर बल दिया जाता है- लवण, अम्ल व मधुर। दरअसल, ये पदार्थ पृथ्वी व जल तत्व से बने होते हैं। ये स्वभाव से भारी, स्निग्ध व उष्ण यानी गर्म होते हैं। ये शरीर में बढ़ी वात की प्रवृत्ति को शांत करते हैं। जो शरीर की अस्थिरता को संतुलित कर ऊर्जा का नियमन करते हैं। इस मौसम में कड़वे व तीखे स्वाद वाले खानपान से बचने की सलाह दी जाती है। दरअसल, कड़वे व कसैले पदार्थ आकाश तत्व से बने होते हैं, जो कालांतर वात को बढ़ाने वाले होते हैं। इनके प्रयोग से जठराग्नि बाधित होती है। वो इनको खाने से असंतुलित होती है। इस प्रकृति की सब्जियों को घी व मसाले के साथ उपयोग करने की सलाह दी जाती है। सर्दी के मौसम में सलाद खाने से परहेज की सलाह दी जाती है क्योंकि ये शरीर की अग्नि पर बोझ का काम करते हैं।
जाड़ों में घी व तिल का सेवन
आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में जाड़ों में घी के सेवन पर बल दिया जाता है। जो जठराग्नि को सहारा देता है। इसे अमृततुल्य माना गया है। जैसे यज्ञ में घी डालने से अग्नि प्रज्वलित होती है, वैसे ही शरीर की वेदी पर जठराग्नि उद्दीप्त होती है। ये योगवाही का कार्य करते हुए ऊर्जा शरीर की हर कोशिका तक पहुंचती है। साथ ही बढ़ती उम्र के प्रभाव को रोकती है। सर्दियों में तिल के खूब उपयोग की सलाह दी जाती है। खाने में और शरीर की मालिश के रूप में इसके तेल के उपयोग की। जो शरीर को भीतर व बाहर से ऊष्मा देते हैं। सही मायने में तिल भोजन तो है ही, कारगर औषधि भी है। दरअसल, तिल की प्रवृत्ति स्निग्ध व उष्ण होती है। दूध व घी खाया हुआ शरीर को लगता है। खाने में गेहूं और मोटे अनाज ऊष्मा देने वाले होते हैं। मूंग का सूप बेहद उपयोगी होता है। हींग न केवल स्वाद बढ़ता है बल्कि पाचक का काम भी करता है।
संतुलित आहार से ओज का निर्माण
सही मायनों में संतुलित व स्वास्थ्यवर्धक भोजन व अच्छी आदतें केवल सात धातुओं का ही नहीं बल्कि हमारे ओज का भी निर्माण करते हैं। ऐसे में शीत ऋतु धातुओं को पुष्ट करने का एक सुनहरा मौका है। दरअसल, शरीर में भोजन से रस, ,रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा का तथा अंतिम धातु शुक्र का निर्माण होता है। इन सातों धातुओं की उत्तम गुणवत्ता से ही हमारे शरीर के ओज का निर्माण होता है। यानी एक शक्तिशाली अदृश्य सूक्ष्म ऊर्जा। हमारे ‘औरा’ बनाते हैं। वो चमक जो हमारे चेहरे व आंखों में दिखायी देती है। जो हमारे मन को भी उल्लासित करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी देह का प्रकाश होता है। ऐसे में गलत खान-पान से हम इस देह के प्रकाश से वंचित हो जाते हैं। सही मायनों में यही हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता का आधार भी है। हम मानकर चलें कि शरद ऋतु सेहत का खजाना जुटाने का मौसम है। जरूरत इस बात की है कि हमारी जीवन शैली व खान-पान प्रकृति की लय के साथ चले। यह भी तय है कि सर्दी में शरीर में निवेश किया गया गुणात्मक संवर्धन हमें फिर बारह महीने स्वस्थ बनाने में सहायक हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि हम प्रकृति के संदेश को ध्यान में रखते हुए अपनी आदतों व खानपान का संतुलित निर्धारण करें।
मधुर प्रकृति के गुड़ व शहद
सर्दियों में मधुर भोजन के रूप में गुड़ व शहद सेवन की सलाह दी जाती है। गुड़ का सेवन जहां तत्काल ऊर्जा देता है, वहीं पाचन शक्ति को भी बढ़ाता है। साथ ही जठराग्नि को भी उद्दीप्त करता है। दरअसल, आयुर्वेद की मान्यता रही है कि हमारे शरीर में सभी रोगों की वजह मंदाग्नि ही है। इस मौसम में वर्जित व ठंडा भोजन खाना पाचक अग्नि में पानी डालने जैसा है, जो इसे बुझा देता है। इस मौसम में रात के भोजन में भी अतिरिक्त सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। असली नियम तो यही है कि सूर्यास्त के साथ ही डिनर हो जाना चाहिए। लेकिन समय के साथ हमारी जीवन शैली में भारी बदलाव आया है। हम इस नियम का पालन नहीं कर सकते। लेकिन ध्यान रहे कि हमारी जठराग्नि सूर्य की ऊर्जा से संचालित होती है। स्वाभाविक रूप से रात को हमारी जठराग्नि शांत होती है। रात को इस पर गरिष्ठ भोजन डालना किसी सोये हुए व्यक्ति को काम करने के लिये बाध्य करने जैसा ही है। यही वजह है कि रात में सलाद, कच्चे फल और दही खाने को मना किया जाता है। दरअसल, इनसे कफ बढ़ता है जो जठरग्नि को ऐसे ही ढक लेता है जैसे अग्नि को राख। इन पदार्थों का दिन में सीमित मात्रा में उपयोग कर लेना चाहिए।

