Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Add Tribune As Your Trusted Source
search-icon-img
Advertisement

70 पार की स्वास्थ्य चुनौतियों के अनुकूल ढालें जिंदगी को

आमतौर पर जब उम्र 70 वर्ष पार हो जाए तो नींद, टेंप्रेचर कंट्रोल, सामाजिक संबंध, शरीर का बैलेंस बनने और मसल्स की शक्ति में बदलाव आने स्वाभाविक हैं। जिंदगी के इस पड़ाव पर बड़ी चुनौती है नयी स्थितियों में खुद...

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

आमतौर पर जब उम्र 70 वर्ष पार हो जाए तो नींद, टेंप्रेचर कंट्रोल, सामाजिक संबंध, शरीर का बैलेंस बनने और मसल्स की शक्ति में बदलाव आने स्वाभाविक हैं। जिंदगी के इस पड़ाव पर बड़ी चुनौती है नयी स्थितियों में खुद को ढालना। जरूरी है कि घबराने के बजाय उन्हें समझें व जीवनशैली बदलें। नियमित व्यायाम, प्रोटीन से भरपूर फूड का सेवन, विटामिन डी का ख्याल , सामाजिक सक्रियता तथा शरीर की नई जरूरतों को स्वीकार करके स्वस्थ, सक्रिय जीवन जीना संभव है। इस आयु में जरूरी सावधानियों, परिवर्तनों व सुरक्षा उपायों के बारे में दिल्ली स्थित सर गंगा राम अस्पताल में सीनियर फिजीशियन डॉ. एम वली से रजनी अरोड़ा की बातचीत।

70 की उम्र के बाद जिंदगी में कई बदलाव धीरे-धीरे दस्तक देते हैं। शरीर पहले की तरह हर मौसम, हर गतिविधि और हर चुनौती के साथ आसानी से तालमेल नहीं बैठा पाता। नींद का पैटर्न बदलने लगता है, मांसपेशियों की ताकत और संतुलन प्रभावित हो सकता है, गर्मी-ठंड का असर अधिक महसूस होने लगता है और सामाजिक दायरा भी धीरे-धीरे छोटा हो सकता है। अध्ययन बताते हैं कि आर्थिक स्थिति, शारीरिक क्षमता या इच्छाशक्ति चाहे जो भी हो, इस उम्र में लगभग सभी को कुछ समान चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये बदलाव केवल उन लोगों तक सीमित नहीं जिन्होंने जीवनभर अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखा, अनुशासित और सक्रिय जीवन जीने वाले लोगों को भी इस उम्र में शरीर की नई जरूरतों के अनुसार खुद को ढालना पड़ता है। इसलिए 70 के बाद चुनौती केवल अधिक उम्र तक जीने की नहीं, बल्कि बदलते शरीर और परिस्थितियों को समझते हुए स्वस्थ, सक्रिय और स्वतंत्र जीवन जीने की है।

नींद में बदलाव

Advertisement

70 के बाद सबसे पहले नींद प्रभावित होती है। यह सिर्फ जल्दी जागने या झपकी की जरूरत बढ़ने तक सीमित नहीं, बल्कि शरीर के आराम करने के तरीके में गहरा परिवर्तन है। मस्तिष्क गहरी नींद की मात्रा घटा देता है, जो शारीरिक रिकवरी, प्रतिरक्षा तंत्र और स्मृति के लिए जरूरी होती है, जिससे रात में बार-बार जागना और थकान न मिटना आम हो जाता है। नींद नियंत्रित करने वाला हार्मोन मेलाटोनिन हर साल तेजी से घटता है, इसलिए थकान होते हुए भी बीच रात जागकर दोबारा सोना मुश्किल होता है। जैविक घड़ी भी 2-3 घंटे आगे खिसक जाती है (एडवांस्ड स्लीप फेज), जिससे जल्दी खाना और जल्दी सोना स्वाभाविक हो जाता है-यह प्राकृतिक अनुकूलन है। असली दिक्कत नींद का बार-बार टूटना है।

Advertisement

युवावस्था जैसी नींद की आदतें बनाए रखने की कोशिश निराशा और अनिद्रा को जन्म दे सकती है। बेहतर है शरीर की नई लय स्वीकार करना- शाम को जल्दी थकान महसूस हो तो शरीर के संकेतों के अनुसार सोना, कमरे को ठंडा रखना, सुबह उठने के बाद प्राकृतिक रोशनी लेना और शाम को स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना मददगार हो सकता है।

तापमान नियंत्रण की क्षमता घटना

70 के बाद शरीर की तापमान नियंत्रित करने की क्षमता भी घटती है। मस्तिष्क तापमान में बदलाव पहचानने में कमजोर पड़ता है, पसीने की ग्रंथियां कम सक्रिय होती हैं, रक्त वाहिकाएं धीमी प्रतिक्रिया देती हैं और त्वचा के नीचे की वसा घट जाती है-इस वजह से शरीर ठंड और गर्मी दोनों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है। प्यास या अत्यधिक ठंड जैसे चेतावनी संकेत भी कमजोर पड़ जाते हैं, जिससे निर्जलीकरण या तापमान संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ता है।

इसलिए घर का तापमान साल भर स्थिर रखना, एक्स्ट्रीम मौसम से बचना, नियमित पानी पीना, और आसपास के वातावरण के प्रति सजग रहना जरूरी हो जाता है। शरीर अब केवल सीमित तापमान दायरे में ही सहज रह पाता है, इसलिए लेयर्स में कपड़े पहनना बेहद उपयोगी उपाय है।

सामाजिक दायरे का सिमटना

उम्र के साथ करीबी लोगों की विदाई बढ़ती है और सामाजिक दायरा छोटा होता जाता है। जो रिश्ते रोज की जिंदगी का हिस्सा थे, वे धीरे-धीरे दूर होते जाते हैं, और यह दुनिया को महसूस करने के तरीके को भी बदल देता है-जीवन ज्यादा शांत और सीमित लगने लगता है। लंबे समय का अकेलापन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर असर डाल सकता है, ऐसा कई अध्ययन बताते हैं। इस उम्र में गहरी नई दोस्तियां बनाना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता, इसलिए सरल और सुलभ सामाजिक जुड़ाव बेहतर रणनीति है-जैसे परिचितों को नमस्ते कहना, अनौपचारिक समूह गतिविधियों में हिस्सा लेना, या सार्वजनिक स्थानों पर समय बिताना। ये हल्के संबंध भी मनोदशा और भावनात्मक स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर डालते हैं। छोटी बातचीत, मुस्कान भर की मुलाकात भी व्यक्ति को अपने परिवेश से जुड़ा महसूस कराती है। नियमित रूप से ऐसी जगहों पर जाना जहां परिचित चेहरे मिलें, अलगाव कम करने का व्यावहारिक तरीका है। अंततः बात ऐसे मानवीय नेटवर्क की है जो रोज की जिंदगी में साथ और अर्थ दे।

संतुलन कमजोर होना

संतुलन बिगड़ना किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई तंत्रों के एक साथ कमजोर होने से होता है-आंतरिक कान सिर की स्थिति सटीक रूप से पहचानने में असमर्थ हो जाता है, मुद्रा संबंधी नसों की संवेदनशीलता घटती है, और दृष्टि गहराई व अंतर पहचानने में कमजोर पड़ती है, जिससे सीढ़ियां या छायाएं तक बाधा बन सकती हैं। मस्तिष्क की प्रतिक्रिया धीमी होने से संतुलन बिगड़ने पर संभलने में देर होती है, टखनों की मांसपेशियां ताकत और लचीलापन खोती हैं, और गिरने का डर खुद तनाव बढ़ाकर गिरने का जोखिम और बढ़ा देता है।

रोकथाम के लिए दैनिक जीवन में संतुलन बढ़ाने वाले व्यायाम जरूरी हैं-जैसे कुछ सेकंड एक पैर पर खड़े होना या ताई-ची जैसी विधाएं, जो समन्वय, ध्यान और धीमी गतियों को जोड़ती हैं। साथ ही घर में ठोकर लगने वाली चीजें हटाना, रोशनी बढ़ाना, बाथरूम-गलियारों में सहारा लगाना और अच्छी पकड़ वाले जूते पहनना।

मांसपेशियों का क्षय (सार्कोपीनिया)

70 के बाद शरीर तेजी से मांसपेशी ऊतक खोने लगती है, जिससे उठना, चलना, सीढ़ियां चढ़ना प्रभावित होता है। यह सिर्फ ताकत घटने तक सीमित नहीं-शरीर प्रोटीन का उपयोग करने और व्यायाम पर प्रतिक्रिया देने में कम सक्षम हो जाता है, और हार्मोन में कमी, बढ़ती सूजन तथा ऊतक-मरम्मत करने वाली कोशिकाओं की कमी इसे और बढ़ाती है। चिंताजनक बात यह है कि सिर्फ 10 दिन के आराम से भी इतनी मसल लॉस हो सकता है जितनी सामान्य उम्र बढ़ने के कई वर्षों में होता है।

इससे बचने के लिए दिन भर प्रोटीन का सही बंटवारा जरूरी है-अंडे, डेयरी उत्पाद मददगार हैं, और ल्यूसिन जैसे अमीनो एसिड मांसपेशी निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। विटामिन डी की कमी भी बुजुर्गों में आम है , इसलिए इसे आहार में शामिल करें। नियमित व्यायाम, खासकर प्रतिरोध प्रशिक्षण-जैसे कुर्सी से उठना-बैठना, इलास्टिक बैंड या हल्के वजन का उपयोग-बड़ा फायदा देता है।

बदलाव स्वीकारने में ही समझदारी

उम्र बढ़ना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। 70 वर्ष के बाद शरीर के बदलावों के साथ तालमेल बैठाना कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी है। कुछ सरल लेकिन असरदार कदम उम्र के इस पड़ाव में व्यक्ति को बेहतर तरीके से संभालने में मदद करते हैं। पहला, पैरों को शामिल करने वाले छोटे-छोटे व्यायाम स्थिरता को बेहतर बनाते हैं और संतुलन की नींव मजबूत करते हैं। जरूरत पड़ने पर सहायता मांगना आत्मनिर्भरता छोड़ना नहीं है। इसके विपरीत, समय पर मदद लेना लंबे समय तक स्वतंत्र रहने में सहायता कर सकता है। नए माहौल की खोज करना भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। अलग-अलग स्थानों पर जाना, एकरसता तोड़ना और आसपास की दुनिया में रुचि बनाए रखना मन को सक्रिय रखता है।

Advertisement
×