भाषाओं की सीमा के पार फिल्म दर्शकों का संसार
भारत का फिल्म दर्शक अब बहुभाषी हो रहा है, वह हिंदी फिल्मों का दर्शक भी है और तमिल, तेलगू व मलयालम फिल्मों का भी। उनकी पसंद में भाषा अकेली निर्णायक चीज नहीं, कहानी और अनुभव भी मायने रखते हैं। साेशल...
भारत का फिल्म दर्शक अब बहुभाषी हो रहा है, वह हिंदी फिल्मों का दर्शक भी है और तमिल, तेलगू व मलयालम फिल्मों का भी। उनकी पसंद में भाषा अकेली निर्णायक चीज नहीं, कहानी और अनुभव भी मायने रखते हैं। साेशल मीडिया व ओटीटी ने इस बदलाव को और तेज किया है। अब दक्षिण भारत के सितारों को हिंदी दर्शक भी अपनेपन से ले रहा है। इस बदलाव के साथ कारोबार भी रिकॉर्ड तोड़ रहा है। हालांकि अभी कुछ विरोधाभास भी हैं।
एक जमाना था, जब हिंदी फिल्म का मतलब ही पूरे भारत की मुख्यधारा की फिल्म से लगाया जाता था। मुंबई में बनी फिल्म दिल्ली, पटना, भोपाल, लखनऊ और जयपुर से लेकर देश के हजारों छोटे-बड़े कस्बों और शहरों में एक ही सांस्कृतिक धागे में दर्शकों को जोड़ती थी। दक्षिण भारतीय फिल्में अपने राज्यों में तो बेहद लोकप्रिय थीं, लेकिन राष्ट्रीय बॉक्स ऑफिस की कल्पना करते समय हिंदी सिनेमा को ही केंद्रीय स्थान मिलता था। लेकिन अब यह तस्वीर बदल चुकी है। दिलचस्प है कि यह बदलाव बॉलीवुड के खत्म होने की कहानी नहीं कहता बल्कि भारतीय दर्शक वर्ग के विस्तार को बताता है। साल 2025 इसका बड़ा प्रमाण बनकर सामने आया।
ऑरमैक्स के मुताबिक, भारतीय बॉक्स ऑफिस ने पहली बार 13 हजार करोड़ रुपये का आंकड़ा पार करते हुए 13,395 करोड़ रुपये का कारोबार किया, जिसमें हिंदी सिनेमा की हिस्सेदारी 5,504 करोड़ रुपये थी। निःसंदेह यह हिस्सा अभी भी बाकी सबसे ज्यादा था, लेकिन देखने वाली बात यह कि 2026 शायद इससे भी आगे निकल रहा है। क्योंकि पहली छमाही में बाकी बॉक्स ऑफिस ने 6,398 करोड़ रुपये का कारोबार कर लिया है और उम्मीद है कि अगली छमाही इससे भी बेहतर होगी।
भाषा की दीवार सेे आगे
ऐसा नहीं कि इस कमाई में हिंदी फिल्मों की हिस्सेदारी कुछ कम हो गई हो, उलटे यह बढ़ी ही है। साल 2025 की पहली छमाही में जहां हिंदी फिल्मों का फिल्मी कारोबार में हिस्सा 39 प्रतिशत था, वहीं इस साल यह बढ़कर 44 प्रतिशत हो गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर आखिर बदलाव आया कहां है? वास्तव में बदलाव दर्शकों में आया है। आज का दर्शक पहले की तरह सिर्फ अपनी भाषा की फिल्म नहीं देखता, वह तमिल फिल्म के हिंदी संस्करण में भी रुचि लेता है और मलयालम फिल्म को भी सबटाइटल्स के साथ रुचिपूर्वक देखता है। तेलगू और कन्नड़ सितारों को भी आज हिंदी हार्टलैंड में बॉलीवुड के सितारों तरह पहचाना जाता है। ओटीटी ने इस बदलाव को और तेज किया है।
मुकाबला अब फिल्मों के बीच
इंटरनेट और सोशल मीडिया ने भाषा की दीवारों को पहले से कहीं ज्यादा कमजोर कर दिया है। अब बॉलीवुड बनाम साउथ का सवाल पुराना पड़ चुका है। असली मुकाबला अब फिल्मों के बीच है, भाषाओं के बीच नहीं। अक्तूबर 2026 इस बदलाव के लिए खास है, क्योंकि 2 अक्तूबर को अजय देवगन की ‘दृश्यम: द कन्क्लूजन’ सिनेमाघरों में लगी। जबकि 15 अक्तूबर को रजनीकांत की ‘जेलर-2’ रिलीज होगी। इस माह दर्शक जहां हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय फ्रैंचाइजी से रूबरू होगा, वहीं तमिल सिनेमा के सुपर स्टार रजनीकांत की फिल्म का इंतजार पूरा होगा। रोचक यह कि दोनों फिल्मों को देखने वाले दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा एक ही होगा।
आकर्षक व रोचक कहानी को तरजीह
वास्तव में यही आज के भारतीय सिनेमा की सबसे सफल कहानी है कि निर्माता, निर्देशक भले भाषा की पूंछ पकड़े हों, लेकिन दर्शक भाषाओं से ऊपर उठ चुका है, उसे जो कहानी ज्यादा आकर्षक और ज्यादा रोचक लगेगी, उसी के पक्ष में अपना मत देगा। रजनीकांत की साल 2023 की ‘जेलर’ ने 650 करोड़ रुपये से ज्यादा का आधिकारिक कारोबार किया था। लेकिन यह व्यवसाय सिर्फ दक्षिण भारत से नहीं आया था, इसमें हिंदी दर्शकों का भी योगदान था। अब यह साझा दर्शक वर्ग तब से कहीं ज्यादा हो गया है, इसलिए ‘जेलर-2’ की सफलता ‘जेलर’ से ज्यादा भी हो सकती है। क्योंकि अब हिंदी दर्शक बेहतर गैरहिंदी फिल्मों को तरजीह देते हैं। इस बदलाव ने स्टार सिस्टम को भी बदल दिया है। हाल के दिनों में दक्षिण भारतीय सितारे टीवी कार्यक्रम ‘कॉमेडी शो’ और ‘आपकी अदालत’ में दिखे हैं। इसका मतलब है कि अब दक्षिण भारत के सितारे सिर्फ दक्षिण भारत के नहीं रहे, उन्हें उत्तर भारतीय हिंदी दर्शक भी अपनेपन से ले रहा है।
विरोधाभास भी कम नहीं
हालांकि पैन इंडिया का अर्थ यह नहीं है कि हर फिल्म हर जगह बिजनेस कर रही है। एक विश्लेषण में यह भी सामने आया कि अधिकांश हिंदी फिल्मों के लिए दक्षिण भारतीय बाजार में मजबूत पकड़ बनाना अभी भी बड़ी चुनौती है। जबकि दक्षिण भारत की ज्यादातर फिल्में राष्ट्रीय स्तर पर आसानी से अपनी पहुंच बना लेती हैं। इसलिए भारतीय सिनेमा का नक्शा अभी भी कई तरह के विरोधाभासों से गुथा हुआ है। एक ओर भाषा के बीच की दूरी घट रही है, दूसरी ओर क्षेत्रीय बाजारों की अपनी मजबूत पहचान भी बनी हुई है। अक्तूबर की रिलीज सूची इस विविधता को दिलचस्प बनाती है। क्योंकि ‘दृश्यम’ और ‘जेलर’ के बाद ‘प्रहार: द उज्जवल निकम स्टोरी’ जैसी हिंदी फिल्म भी रिलीज के लिए सूचीबद्ध है यानी दर्शक के सामने अब केवल हीरो का सवाल नहीं, सवाल है कौन सी कहानी और किस तरह का अनुभव उसे सिनेमाघर तक खींच सकता है। वास्तव में यहीं फ्रैंचाइजी फिल्मों की ताकत सामने आती है। दृश्यम के मामले में दर्शक केवल अभिनेता अजय देवगन को देखने नहीं जा रहा, वह कहानी का अगला अध्याय देखने जा रहा है, जिससे वह पहले से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है और जेलर-2 के बारे में यही बात कही जा सकती है।
इसके साथ एक दूसरी प्रवृत्ति भी दिखायी देती है। छोटी और अपेक्षाकृत कम स्टार-निर्भर फिल्मों के लिए जगह भी बन रही है। इसी माह ‘प्रेम कीटाणु’ जैसी युवा रोमांटिक फिल्म भी रिलीज हो रही है, यह बदलाव युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि आज का युवा केवल हिट हीरो के नाम का दर्शक नहीं रह गया। वह सोशल मीडिया पर ट्रेलर देखता है, समीक्षाएं पढ़ता है, दोस्तों की प्रतिक्रिया देखता है और फिर तय करता है कि सिनेमाघर जाना है या ओटीटी का इंतजार करना है। इसका असर फिल्म बनाने के तरीके पर पड़ रहा है। अब किसी फिल्म के लिए केवल बड़ा बजट पर्याप्त नहीं है। उसे चर्चा पैदा करनी होती है। उसका कोई किरदार, संवाद, कोई दृश्य, गीत या विचार दर्शकों को ऐसा कारण देना चाहता है, जिसे वह दूसरों के साथ साझा करे।
भारत का फिल्म दर्शक अब बहुभाषी हो रहा है, वह हिंदी फिल्मों का दर्शक भी है और तमिल फिल्मों का भी। तेलगू का भी है और मलयालम सिनेमा का भी। उसकी पसंद में भाषा महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेली निर्णायक चीज नहीं है।
इ.रि.सें.

