बदली जीवनशैली से बड़ी संख्या में विद्यार्थी मानसिक तनाव, सीखने की कठिनाइयों और व्यावहारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। वहीं कुछ बच्चे विशेष शैक्षिक जरूरतें भी रखते हैं। इसीलिए कई शिक्षा बोर्डों ने स्कूलों में काउंसलर और स्पेशल एजुकेटर की नियुक्ति को अनिवार्य किया है। ऐसे में इन दोनों पेशों की मांग लगातार बढ़ रही है।
आज का विद्यालय केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने का स्थान नहीं रहा। बदलती जीवनशैली, प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक दबाव, डिजिटल दुनिया और विविध प्रकार की सीखने की जरूरतों ने बच्चों की मानसिक व शैक्षिक चुनौतियों को बढ़ा दिया है। ऐसे समय में स्कूलों में चाइल्ड काउंसलर और स्पेशल एजुकेटर की भूमिका अत्यंत आवश्यक हो गई है। ये दोनों पद न केवल बच्चों के जीवन को दिशा देते हैं, बल्कि युवाओं के लिए एक अर्थपूर्ण, सम्मानजनक और संतोषजनक कैरियर विकल्प भी प्रस्तुत करते हैं।
पेशेवर के तौर पर भूमिका
चाइल्ड काउंसलर वह प्रशिक्षित पेशेवर होता है जो बच्चों और किशोरों की मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक तथा व्यावहारिक समस्याओं को समझता है और समाधान हेतु मार्गदर्शन देता है। वे बच्चों को आत्म-विश्वास, तनाव प्रबंधन, परीक्षा भय, व्यवहार सुधार, रिश्तों की समझ और कैरियर चयन में सहायता प्रदान करते हैं। वहीं दूसरी ओर स्पेशल एजुकेटर वे शिक्षक होते हैं जो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों—जैसे सीखने में कठिनाई (लर्निंग डिफिकल्टीज), ऑटिज़्म, बौद्धिक अक्षमता, दृष्टि या श्रवण बाधा आदि—के साथ काम करते हैं। ये शिक्षक सामान्य पाठ्यक्रम को बच्चे की क्षमता के अनुसार ढालकर उसे सीखने योग्य बनाते हैं।
जिम्मेदारी के विभिन्न पहलू
स्कूलों में चाइल्ड काउंसलर बच्चों की भावनात्मक स्थिति का आकलन करते हैं, व्यक्तिगत व समूह काउंसलिंग करते हैं, अभिभावकों को मार्गदर्शन देते हैं और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार को समझने में सहयोग करते हैं। वे कैरियर गाइडेंस कार्यक्रम, जीवन-कौशल सत्र और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता गतिविधियां भी संचालित करते हैं। वहीं स्पेशल एजुकेटर बच्चों की पहचान (स्क्रीनिंग), मूल्यांकन और उनके लिए व्यक्तिगत शिक्षा योजना (इंडिविजुअल एजुकेशन प्रोग्राम) बनाते हैं। वे समावेशी कक्षा में शिक्षक के साथ मिलकर काम करते हैं ताकि विशेष आवश्यकता वाला बच्चा भी मुख्यधारा में सीख सके।
अनिवार्यता की वजह
हाल के वर्षों में यह पाया गया है कि बड़ी संख्या में छात्र मानसिक तनाव, सीखने की कठिनाइयों और व्यावहारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार लगभग 10–15 फीसदी बच्चे किसी न किसी प्रकार की विशेष शैक्षिक आवश्यकता रखते हैं, जबकि किशोरों में तनाव और चिंता की समस्या तेजी से बढ़ी है। इसी को देखते हुए सीबीएसई सहित कई शिक्षा बोर्डों ने स्कूलों में काउंसलर और स्पेशल एजुकेटर की नियुक्ति को अनिवार्य किया है। इसका उद्देश्य है सुरक्षित, सहयोगी और समावेशी विद्यालय वातावरण तैयार करना।
जॉब के लिए योग्यताएं
चाइल्ड काउंसलर बनने के लिए किसी भी विषय में, (मनोविज्ञान को वरीयता) स्नातक , गाइडेंस एंड काउंसलिंग / मनोविज्ञान / स्कूल काउंसलिंग में डिप्लोमा / डिग्री / परास्नातक योग्यता अनिवार्य है। स्पेशल एजुकेटर बनने के लिए विशेष शिक्षा में मान्यता प्राप्त डिप्लोमा इन स्पेशल एजुकेशन या बीएड (स्पेशल एजुकेशन) चाहिये। (दोनों ही कोर्स रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त होने जरूरी हैं)।
पाठ्यक्रम में प्रवेश की न्यूनतम योग्यता
डिप्लोमा इन स्पेशल एजुकेशन हेतु न्यूनतम योग्यता 10+2 उत्तीर्ण तथा इस पाठ्यक्रम की अवधि 2 वर्ष है। वहीं बी एड (स्पेशल एजुकेशन) पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु न्यूनतम योग्यता स्नातक तथा अवधि 2 वर्ष है। इसके अतिरिक्त डिप्लोमा / पीजी डिप्लोमा इन काउंसलिंग हेतु न्यूनतम योग्यता स्नातक तथा अवधि 1 से 2 वर्ष होती है। प्रवेश सामान्यत: मेरिट, प्रवेश परीक्षा या साक्षात्कार के आधार पर होता है।
प्रमुख शिक्षण संस्थान व फीस
सरकारी संस्थानों में जैसे राष्ट्रीय बौद्धिक दिव्यांगजन संस्थान (एनआईईपीआईडी), राष्ट्रीय मानसिक पुनर्वास संस्थान, राज्य स्तरीय रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त कॉलेज आदि में फीस अपेक्षाकृत कम होती है—लगभग रुपए 5,000 से रुपए 20,000 प्रति वर्ष। निजी संस्थानों में यह फीस अधिक हो सकती है।
कैरियर अवसर और वेतन
पाठ्यक्रम पूर्ण करने के बाद अभ्यर्थी स्कूलों, विशेष विद्यालयों, पुनर्वास केंद्रों, गैर सरकारी संगठनों तथा काउंसलिंग क्लीनिक में कार्य कर सकते हैं। आरंभिक वेतन सामान्यतः रुपए 20,000 से रुपए 40,000 प्रति माह होता है, जो अनुभव और संस्था के अनुसार बढ़ता जाता है। चाइल्ड काउंसलर और स्पेशल एजुकेटर अपना स्वयं का परामर्श केंद्र स्थापित कर सकते हैं। चाइल्ड काउंसलर और स्पेशल एजुकेटर का कार्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि मानव सेवा का एक संवेदनशील और प्रभावशाली माध्यम है। इस क्षेत्र में कैरियर चुनने वाला व्यक्ति बच्चों के भविष्य को संवारते हुए स्वयं भी गहरी आत्म-संतुष्टि अनुभव करता है। बदलती शिक्षा व्यवस्था में इन पेशों की मांग लगातार बढ़ रही है, जिससे यह क्षेत्र आने वाले वर्षों में और अधिक संभावनाओं से भरा हुआ दिखाई देता है।

