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दुनिया से जाने के बाद की जिंदगी का डिजिटल अवतार

एआई का प्रयोग करके मृतकों को पुनःजीवित किया जा रहा है ताकि परिजनों को दिलासा दिया जा सके। ग्रीफबोट्स वह एआई सिस्टम्स हैं जो मृत व्यक्ति के व्यक्तित्व, बोलने के अंदाज़ और व्यवहार का अनुकरण (सिमुलेट) करते हैं। इन्हें...

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एआई का प्रयोग करके मृतकों को पुनःजीवित किया जा रहा है ताकि परिजनों को दिलासा दिया जा सके। ग्रीफबोट्स वह एआई सिस्टम्स हैं जो मृत व्यक्ति के व्यक्तित्व, बोलने के अंदाज़ और व्यवहार का अनुकरण (सिमुलेट) करते हैं। इन्हें सांत्वना देने वाले टूल्स के रूप में मार्किट किया जा रहा है। एआई टेक्नोलॉजी मृतक की हूबहू कापी, आवाज़ और भाव बना देती है, जिससे परिवार वर्चुअली मृतक से मिलकर बात कर सकता है। हालांकि इसके उपयोग के औचित्य पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।

सिग्मंड फ्रायड ने कहा था कि इंसानों को अपने अमर होने का यक़ीन है। इसलिए मौत पर चर्चा करना आम तौर पर भयावह, घृणास्पद, विकट और रोग समझा जा सकता है। जब से टेक्नोलॉजी ने मरने की प्रक्रिया को दीर्घ व जटिल बनाया है तब से यह लेखिका अच्छी मौत के कारणों पर विचार कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ध्यान में रखते हुए कि सम्मान के साथ मरना मौलिक अधिकार है, मौत की गुणवत्ता के महत्व पर ध्यान दिया जाना स्वाभाविक ही होगा। अच्छी मौत में रोगी की इच्छाओं का संज्ञान लिया जाता है कि उसकी उपचार संबंधी प्राथमिकताएं क्या हैं, उसे ज़िंदगी और मौत की कैसी गुणवत्ता चाहिए व इसके साथ ही उसके सम्मान को भी बरकरार रखा जाये।

अनंत डिजिटल जीवन का एक विकल्प

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आज मौत का अर्थ है जीवन का अंत। लेकिन अल्फा पीढ़ी के लिए यह कुछ अलग हो सकता है। इस नयी जेनरेशन के लिए परम्परागत जीवन के अंत के बाद अनंत डिजिटल जीवन एक विकल्प हो सकता है। मसलन, ग्रीफबोट्स वह एआई सिस्टम्स हैं जो मृत व्यक्ति के व्यक्तित्व, बोलने के अंदाज़ और व्यवहार का अनुकरण (सिमुलेट) करते हैं। इसके तहत वर्चुअल ह्यूमनोइड अवतार को ट्रेन किया जाता है कि वह टेक्स्ट मैसेज, ईमेल, सोशल मीडिया पोस्ट्स और वीडियोज तैयार करे व भेजे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जितना अधिक डाटा सप्लाई किया जायेगा उतना ही वास्तविक अवतार होगा।

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प्रियजन का डिजिटल वर्ज़न देखना-सुनना

इस डिजिटल प्रक्रिया के माध्यम से उपयोगकर्ता यानी यूजर अपने प्रियजन के डिजिटल वर्ज़न को देख व सुन सकेंगे और उससे बातें भी कर सकेंगे। बातचीत करने वाला एआई इमेज सिंथेसिस व वॉइस क्लोनिंग का प्रयोग करता है। डिजिटल जुड़वां बनाने के लिए वह रियल-टाइम में प्राकृतिक भाषा व भावनाओं के साथ प्रतिक्रिया करता है। यहां उल्लेखनीय है कि प्रोजेक्ट दिसम्बर, हियरआफ्टर एआई और स्टोरीफाइल जैसे प्लेटफॉर्म्स ग्रीफबोट का अनुभव प्रदान करते हैं।

सांत्वना देने वाले टूल्स पर सवाल भी

ग्रीफबोट्स को मृत व्यक्ति के परिजनों को सांत्वना देने वाले टूल्स के रूप में मार्किट किया जा रहा है। लोग अपने प्रियजनों की मौत को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। वह चाहते हैं कि जीवन जैसे डिजिटल अवतार से निरंतर संपर्क में रहें। लेकिन इसके लम्बे समय तक प्रयोग करने से भावनात्मक उपचार बाधित हो सकता है, जिससे अस्वस्थ निर्भरताएं उत्पन्न हो सकती हैं। ग्रीफबोट्स से मृतक के सम्मान को सुरक्षित रखने के संदर्भ में सवाल उठते हैं। गलत प्रतिनिधित्व और मौत से पहले मंज़ूरी न लेने से चिंताएं उत्पन्न होती हैं। निजता के मानकों का सख्ती से पालन करना कठिन है और साथ ही देयता, ज़िम्मेदारी व जवाबदेही को भी।

‘याद-चेतना की वर्चुअल स्टोरेज’

मौत के बाद डिजिटल जीवन को डिजिटल आफ्टर लाइफ, डिजिटल इम्मोर्टलिटी, वर्चुअल इम्मोर्टलिटी व भौतिक मृत्यु के बाद व्यक्ति की स्थायी ऑनलाइन उपस्थिति कहा जाता है। आज व्यक्ति के व्यक्तित्व, यादों और चेतना को डिजिटल प्लेटफार्म (कंप्यूटर, ह्यूमनोइड या साइबरस्पेस) पर स्टोर या क्लोन करना संभव है। मूल व्यक्ति की अवतार नकल वर्चुअल वातावरण में ‘अनंत जीवन’ को मुमकिन बनाती है। इस विविधता को प्रभावी बनाने के लिए इसमें मूल्यों, आस्थाओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को शामिल करना आवश्यक है। रोगियों पर एआई आधारित निर्णयों का भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ना चिंता का विषय है।

श्रद्धांजलि देने से जुड़ा ‘रि-मेमोरी’

ग्रीफबोट्स का जिस तेज़ी से व्यवसायीकरण हो रहा है वह ज़िम्मेदारी भरे डिप्लॉयमेंट, शोध व नियमों को पीछे छोड़ रहा है। ग्रीफबोट्स वास्तविकता व कल्पना के बीच की रेखा को धुंधला कर सकता है, जिससे नुकसान को स्वीकार करके आगे बढ़ने की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है। ‘रि-मेमोरी’ एआई-आधारित स्मृति-सेवा (दिवंगत व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने और उसकी यादों को सम्मान देने के लिए आयोजित कार्यक्रम) है, जिसे डीपब्रेन एआई ने विकसित किया है, जिससे जिंदा लोग अपने मृत प्रियजनों के अति वास्तविक डिजिटल अवतार से संपर्क कर सकते हैं।

एडवांस्ड एआई टेक्नोलॉजी मृतक की हूबहू कॉपी, आवाज़ और भाव बना देती है, जिससे दुखी परिवार वर्चुअल सेटिंग में मृतक से ‘मिल’ सकता है व बातें कर सकता है। डीपब्रेन की एआई प्रोप्राइटरी टेक्नोलॉजी लाइफलाइक (जीवन जैसा) डिजिटल अवतार जनरेट करती है, जो वीडियो के ज़रिये इंटरएक्ट करता है, यानी दो-तरफा बातचीत होती है। यह अनुभव वर्चुअल पुनर्मिलन जैसा होता है। यूजर यादें शेयर करते हैं। ‘रि-मेमोरी’ को स्मृति-सेवाओं में, पारिवारिक समारोह में, शादियों में और जन्मदिनों पर प्रयोग किया जा रहा है ताकि दिवंगत को ‘जीवित’ के रूप में शामिल किया जा सके। अपने मृत प्रियजन से पुनः मिलकर व्यक्ति अपने दुःख से उबरता है, अनसुलझे जज़्बात को संबोधित करता है और अच्छी यादों को संजोकर रखता है। यह सेवा दिलासा देती है, भावनात्मक उपचार करती है और सम्पर्कों को हमेशा के लिए बनाये रखती है।

कृत्रिम आत्मीयता और ठोस वास्तविकता

परम्परागत तौरपर भारतीय संस्कृति अनासक्ति की वकालत करती है। दिवंगत को सम्मान व इज़्ज़त के साथ श्रद्धांजलि देने के हमारे अपने तरीके हैं। क्या हमारे बच्चे हमारे जाने के बाद हमें याद रखने व हमसे संपर्क बनाने के नये रास्तों का प्रयोग करेंगे। क्या हम अपनी मानवता को कृत्रिम आत्मीयता पर कुर्बान कर दें, जोकि ठोस वास्तविकता से भिन्न है? असल और वर्चुअल में कहां रेखा खींची जाये? मूल और नकल में क्या अंतर रह गया है? मृतक के सम्मान व इज़्ज़त के जो वैश्विक तौरपर स्वीकृत सिद्धांत हैं उन्हें फिर से लिखना होगा। ग्रीफ टेक कम्पनियां जीवन के अंत को भुना रही हैं, दुखी व्यक्तियों की सेवा व मदद के नाम पर। एआई का प्रयोग करके मृतकों को पुनःजीवित किया जा रहा है ताकि जिन्दों को दिलासा दिया जा सके। -इ.रि.सें.

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