सर्दियों की एक आम-सी सुबह। सड़कें मौजूद हैं, लेकिन दिखाई नहीं देतीं। हवाई अड्डों पर उड़ानें रुक जाती हैं, एक्सप्रेसवे पर गाड़ियों की रफ्तार थम जाती है और पूरा उत्तर भारत धुंध की चादर में लिपटा रहता है। जाड़ों की दस्तक के साथ शुरू होने वाला कोहरा देखने में जितना शांत लगता है, असल में व्यवस्था, सुरक्षा और जीवन के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती है। इसी धुंध के आर-पार देखने की कोशिश में जुटा है विज्ञान। जिसे समझने के लिए आईआईटीएम ने शुरू किया वाईफैक्स अभियान।
पुणे से संचालित एक विशेष वैज्ञानिक अभियान विंटर फॉग एक्सपेरिमेंट यानि वाईफैक्स जो कोहरे को केवल महसूस नहीं करता, बल्कि उसे मापता है, समझता है और पहले से भांपने की कोशिश करता है। विंटर फॉग एक्सपेरिमेंट जानने की कोशिश करता है कि कोहरा कैसे बनता है, कब सबसे घना होगा, कितनी देर टिकेगा और किस वक्त छंटेगा। यह अध्ययन सिर्फ मौसम वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है। यह उन पायलटों के लिए उपयोगी जानकारी है जिन्हें कम दृश्यता में उड़ान भरनी होती है। उन ट्रैफिक और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के लिए अहम है, जिनके लिए एक गलत अनुमान बड़े हादसे में बदल सकता है और उन नीति-निर्माताओं के लिए जरूरी है जो खराब मौसम के प्रभाव को पहले से समझना चाहते हैं। इसी वैज्ञानिक सोच और दूरदृष्टि का केंद्र है, भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटिरियोलॉजी यानी आईआईटीएम), पुणे।
वाईफैक्स के निदेशक कहते हैं ...
हाल ही में पीआईबी चंडीगढ़ की महिला पत्रकारों का एक समूह पीआईबी पुणे और पीआईबी मुंबई के साथ आईआईटीएम के दौरे पर पहुंचा तो वाईफैक्स के अधिकारियों ने विस्तार से जानकारी दी। इस प्रयोग के ज़रिये कोहरे का 85 प्रतिशत तक सटीक पूर्वानुमान किया जाता है। दृश्यता यानि विजिबिलिटी की बेहतर जानकारी के जरिये हवाई और सड़क यातायात को राहत दी जा रही है। वाईफैक्स बीते कुछ सालों में बादल, बिजली और तूफ़ान की भाषा बखूबी समझने लगा है।
1962 से शुरू हुई वैज्ञानिक यात्रा
आईआईटीएम की स्थापना 17 नवंबर 1962 को पुणे के रामदुर्ग हाउस में हुई थी। शुरुआत में यह संस्थान भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अंतर्गत कार्य करता था और इसे विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) का सहयोग प्राप्त था। समय के साथ इसका स्वरूप बदला और 1971 में स्वायत्त दर्जा मिला। 1985 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत था। 2006 से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन है। आज आईआईटीएम भारत का प्रमुख राष्ट्रीय संस्थान है, जहां उष्णकटिबंधीय मौसम और जलवायु पर बुनियादी और अनुप्रयुक्त शोध किया जाता है। यानी महासागर, वायुमंडल–जलवायु प्रणाली पर मूलभूत शोध के ज़रिये मौसम और जलवायु पूर्वानुमानों को बेहतर बनाने का काम कर रहा है आईआईटीएम। यहां किया गया शोध केवल अकादमिक नहीं रहता, बल्कि उसका सीधा असर कृषि और जल प्रबंधन,आपदा चेतावनी प्रणाली,परिवहन और शहरी जीवन,आम नागरिकों की सुरक्षा पर दिखाई देता है। आईआईटीएम में इसके अलावा क्लाउड फिजिक्स एंड डायनामिक्स, तूफान (थंडरस्टॉर्म फॉरकास्टिंग), कृत्रिम वर्षा (क्लाउड सीडिंग) जैसे विषयों पर भी शोध होता है। यानी यह समझने की कोशिश की जाती है कि बादल कैसे बनते हैं, बिजली क्यों गिरती है और तूफ़ान कैसे विकसित होते हैं।
मानसून : आईआईटीएम की धड़कन
भारत में मौसम का मतलब मानसून है और आईआईटीएम में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि लगातार अध्ययन का विषय है। यहां मानसून का अल्पकालिक पूर्वानुमान, मौसमी पूर्वानुमान, एक्सटेंडेड रेंज फोरकास्ट, मानसून की परिवर्तनशीलता और अनिश्चितता का अध्ययन कर सूचना आईएमडी को भेजी जाती है। कब बारिश शुरू होगी, कितनी होगी, सूखा पड़ेगा या बाढ़ आएगी—इन सवालों के पीछे आईआईटीएम के वर्षों के डेटा और विश्लेषण हैं।
एनडब्ल्यूपी से ऐसे लगाया जाता है अनुमान
आईआईटीएम में मौसम का अनुमान अनुभव से नहीं, बल्कि न्यूमेरिकल वेदर प्रिडिक्शन यानी एनडब्ल्यूपी से लगाया जाता है। इस खास प्रक्रिया में देश-दुनिया से मौसम का डेटा, डेटा असिमिलेशन, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटर पर मॉडल रन करना, पूर्वानुमान और चेतावनी जारी करना शामिल जैसे कई चरण शामिल है। यही एनडब्ल्यूपी तकनीक चक्रवात, भारी बारिश और चरम मौसम की समय रहते जानकारी देती है।
हवा की सेहत जांचता है ‘सफर’
बढ़ते शहरी प्रदूषण को देखते हुए आईआईटीएम ने विकसित किया सफर (एसएएफएआर) सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च ।
यह प्रणाली रियल-टाइम वायु गुणवत्ता डेटा निकालती है। प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभाव का अध्ययन करती है और प्रशासन और नीति-निर्माताओं को निर्णय में सहायता भी प्रदान करती है।
तकनीक जो आसमान तक देखती है
आईआईटीएम की ताकत उसकी अत्याधुनिक सुविधाएं हैं- हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम,डॉप्लर रडार, एक्स बैंड राडार, सी बैंड राडार का बैंड राडार (X, C और Ka बैंड राडार), मोबाइल लिडार (एलआईडीएआर), विंड फ्रोफाइलर, हाइपर स्पेक्ट्रल माइक्रोवेव रेडियोमीटर, हाइपर-स्पेक्ट्रल उपकरण, महाबलेश्वर स्थित हाई-एल्टीट्यूड ऑब्ज़र्वेटरी व स्थानीय शोध शामिल है। आईआईटीएम में जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसों और महासागर-वायुमंडल अंतःक्रिया जैसे विषयों पर किया गया शोध पानी, खेती, स्वास्थ्य, संचार व आपदा प्रबंधन तक असर डालता है।
1962 में शुरू हुआ यह संस्थान आज उस मुकाम पर है,जहां मौसम की चुनौती को केवल स्वीकारा नहीं जाता, समझा जाता है, पढ़ा जाता है और संभाला जाता है। जब अगली बार घना कोहरा आपकी सुबह को रोक दे, या मानसून समय पर दस्तक दे या किसी चक्रवात से पहले चेतावनी मिले तो याद रखिए, पुणे में कहीं बैठा आईआईटीएम धुंध के उस पार देखकर आपके आज और आने वाले कल को सुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहा है।

