...मेरी पेशानी पे हिंदुस्तान लिख देना

स्मृति शेष : राहत इंदौरी

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चन्द्र त्रिखा

चन्द्र त्रिखा

‘दो गज़ सही, ये मेरी मिल्कीयत तो है।

ऐ मौत तूने मुझे ज़मीदार कर दिया॥’

अब क्या हुआ यह तो चिकित्सा-जगत वाले अपने रिकार्ड के लिए तय कर लेंगे, मगर अंतिम सत्य यही है कि अपने लिये दो गज़ ज़मीन से ही तस्कीन बताने वाले लोकप्रिय शायर राहत इन्दौरी नहीं रहे।

सिर्फ एक रात पहले ही वह ‘कोरोना पाॅजिटिव’ पाए गए थे और बीती रात एक अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उनकी रूह इस फानी जिस्म को छोड़ गई।

उर्दू अदब वह कोरोना-पूर्व काल में ‘उर्दू मुशायरों की जान कहलाने वाले ‘राहत ’ पिछले कुछ माह से कुछ ज्यादा ही चर्चा में रहे थे। उम्र भी ज्यादा नहीं थी। वर्ष 1950 की पहली तारीख यानी 1 जनवरी को इन्दौर में जन्मे राहत कुरैशी के वालिद रफातुल्लाह कुरैशी एक कपड़ा मिल में काम करते थे। शुरुआती शिक्षा वहीं हुई थी और बाद में बरकतुल्ला यूनिवर्सिटी भोपाल से एम.ए. के बाद उन्होंने ‘उर्दू में मुशायरा’ विषय पर पीएच.डी. की और यूनिवर्सिटी में ही पढ़ाने लगे थे।

लगभग 40 से 45 वर्ष तक उन्हें मुशायरों में सुनता रहा था। कई बार उनसे खुली बातचीत भी हुई और एक समय ऐसा भी आया जब उनकी मौजूदगी में किसी भी मुशाायरे की सफलता की ‘गारंटी’ मानी जाने लगी। निदा फाज़ली के जाने के बाद और बशीर बद्र साहब की लम्बी बीमारी के कारण वह कमोबेश हर ‘मुशायरे की जान’ बन गए थे। शायद वह अकेले ऐसे शायर थे, जो कई बार अमेरिका, ब्रिटेन, दुबई, कुवैत, कनाडा, सिंगापुर, मॉरीशस, कतर, पाकिस्तान, बांग्लादेश और ओमान आदि देशों में मुशायरे ‘लूटने’ गए थे।

शायरी के अलावा भी ऐसे अनेक टी.वी. ‘शो’, जिनमें उन्हें पूरे सम्मान के साथ देखा, सुना व रिकॉर्ड किया गया। हाल ही में ‘टिकटॉक, फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम’ में भी वे छा गए थे। अब तो उनका नाम व उनके अशआर मुहावरों की तरह उद्धृत किए जा रहे थे। अनेक फिल्मों मसलन ‘मैं तेरा आशिक’, ‘आशियां’, ‘सर’, ‘जानम’, ‘खुद्दार’, ‘नाराज’, ‘मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.’, ‘मिशन कश्मीर’, ‘करीब’, ‘बेगम जान’ ‘इश्क व घटक’ में उनके गीतों ने खूब धूम मचाई थी।

उनकी चर्चित कृतियों में ‘रुत’, ‘दो कदम और सही’, ‘मेरे बाद’, ‘धूप बहुत है’, ‘चांद पागल है’, ‘मौजूद’, ‘नाराज’ आदि विशेष उल्लेखनीय रही हैं।

उनके शे’र मुहावरों की तरह प्रयोग होने लगे थे, उनमें :-

‘मैं पर्बतों से लड़ता रहा और चंद लोग।

गीली ज़मीन खोद के करहाद हो गए॥

हमसे पहले भी मुसाफिर कई गुज़रे होंगे।

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते॥

आंख में पानी रखो, होंठों पे चिंगारी रखो।

ज़िन्दा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो॥

11 अगस्त की सुबह 7:35 पर उनका ट्विटर-संदेश था, कोविड के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कल शाम मेरा कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। ऑरबिन्दो हॉस्पिटल में एडमिट हूं। दुआ कीजिए जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं। एक और इल्तिजा है, मुझे या मेरे घर के लोगों को फोन न करें। मेरी खैरियत ट्विटर और फेसबुक पर आपको मिलती रहेगी और उसके बाद खबर पूरे जहान में फैल गई कि उर्दू का यह नायाब व बेहतरीन शायर अपने लाखों प्रशंसकों को ‘सदमे’ व ‘सकते’ में छोड़कर एकाएक रुखसत हो गया। राहत को भले ही कुछ लोगों ने कुछ विवादों में लाने की गुस्ताखी की थी, मगर उनका एक शे’र ऐसे विवादों को खारिज़ करने के लिए काफी है :-

मैं मर जाऊं तो मेरी इक अलग पहचान लिख देना।

लहू से मेरी पेशानी पे ‘हिन्दुस्तान’ लिख देना॥

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