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स्वास्थ्य अनुसंधान की अनदेखी के चिंताजनक संकेत

प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति में बायोमेडिकल और स्वास्थ्य अनुसंधान एवं विकास पर खर्च बढ़ाने जैसे लक्ष्य शामिल हैं। लेकिन कुछ पहलू चिंताजनक हैं। मसलन, इसमें हेल्थ रिसर्च के लिए फंड अभी भी नाकाफी रहेगा। वहीं निजी और सीएसआर निवेश...

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प्रस्तावित राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति में बायोमेडिकल और स्वास्थ्य अनुसंधान एवं विकास पर खर्च बढ़ाने जैसे लक्ष्य शामिल हैं। लेकिन कुछ पहलू चिंताजनक हैं। मसलन, इसमें हेल्थ रिसर्च के लिए फंड अभी भी नाकाफी रहेगा। वहीं निजी और सीएसआर निवेश को बढ़ावा देने से रिसर्च की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगता है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत आने वाले स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) ने एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति का प्रस्ताव दिया है। यह विभाग करीब दो दशक से मौजूद है, लेकिन अब जाकर इसकी नींद खुली कि भारत में हेल्थ रिसर्च पर कोई खास नीति नहीं है।

जुलाई में जारी अनुसंधान एवं विकास आंकड़ों के अनुसार, देश में स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए मुख्य संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) को राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के लिए रखे फंड का महज 3.3 प्रतिशत हिस्सा मिलता है, जबकि रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्रों को क्रमशः 32 और 15 फीसदी। भारत का आरएंडडी हेतु रखा गया फंड बहुत कम है -जीडीपी का 0.84 फीसदी, जबकि चीन का 2.58 प्रतिशत है।

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नई स्वास्थ्य अनुसंधान नीति के जाहिर लक्ष्यों में से एक बायोमेडिकल और स्वास्थ्य अनुसंधान एवं विकास पर खर्च बढ़ाना है। लक्ष्य है कि स्वास्थ्य अनुसंधान में निवेश को जीडीपी के अंशानुसार वर्तमान में 0.024 फीसदी से बढ़ाकर 2037 तक 0.072 प्रतिशत और 2047 तक 0.15 फीसदी करना है। भले ही यह बढ़ोतरी बड़ी लग सकती है, लेकिन भारत के मौजूदा और अनुमानित बीमारियों के बोझ और उभरती स्वास्थ्य चुनौतियों की तुलना में यह बहुत कम है। इसके अलावा, प्रस्तावित बढ़ोतरी के लिए समय-सीमा बहुत दूर की है, लक्ष्य प्राप्ति अनिवार्य नहीं व इसके लिए कोई बजटीय मदद भी नहीं है।

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प्रस्तावित बढ़ोतरी कैसे हासिल की जाएगी, ज़्यादा समस्या वाली बात यह है। नीति में कहा गया है ः ‘सार्वजनिक निवेश धीरे-धीरे बढ़ेगा, और इसके साथ उत्तरदायित्वपूर्ण निजी, परोपकारी और गैर-सरकारी निवेश भी होगा’। यह औपचारिक रूप से स्वास्थ्य अनुसंधान में निजी निवेश के लिए द्वार खोलना है।

सरकार जिस तरह निजी निवेश को बढ़ावा देना चाहती है, वह ज़्यादा चिंता का विषय होना चाहिए। नीति में कहा है कि निजी कंपनियों से मिलने वाले कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड का इस्तेमाल सार्वजनिक संस्थानों में आरएंडडी प्रोजेक्ट्स के लिए किया जा सकेगा, और सेहत अऩुसंधान विभाग ऐसी फंडिंग को आसान बनाने को ज़रूरी नीतियां बनाएगा।

यह तरीका दवा या वैक्सीन विकास के लिए मौजूदा पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल से अलग है, जिसमें कोविड-19 वैक्सीन के विकास जैसी अहम परियोजना के तहत फार्मा कंपनियां और सार्वजनिक संस्थान शामिल होते थे। अगर किसी कंपनी-चाहे वह फार्मा कंपनी हो या कोई और -अथवा किसी कंपनी द्वारा प्रायोजित परोपकारी संस्था से सीएसआर फंड लेने की इजाज़त दी जाएगी, तो इससे अनुसंधान में पक्षपात हो सकता है या कोई छिपा एजेंडा हो सकता है। जैसे कि पर्यावरण से जुड़े सेहत जोखिम (वायु प्रदूषण, तंबाकू, शराब का प्रभाव), पेशेवराना स्वास्थ्य खतरे, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे विवादित विषयों पर ‘वैज्ञानिक संदेह’निर्मित करना।

अजीब बात है कि एक तरफ़ सरकार ने विदेशी योगदान से जुड़े नियमों के नाम पर स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत कुछ बड़े स्वास्थ्य एनजीओ और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के जमीनी अनुसंधान अध्ययनों की राह में रोड़े अटका दिए तो दूसरी तरफ़ वह उद्योग जगत और विदेशी संस्थानों द्वारा हेल्थ रिसर्च करने की राह खोल रही है। जबकि स्वदेशी अनुसंधान करने वालों को अभी भी भारतीय व विदेशी अनुसंधानकर्ताओं के बीच वैज्ञानिक सहयोग के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय की स्क्रीनिंग कमेटी से मंज़ूरी लेनी होगी।

ऐसा लगता है कि पूरी सोच स्वास्थ्य अनुसंधान को हर स्तर पर केंद्रीकृत करने और नौकरशाही तंत्र स्थापित करने की है। नीति में एक ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा’ बनाने की बात कही गई है जो वृहद स्तर पर प्राथमिकताएं तय करेगा और इस एजेंडा को लागू करने के लिए तीन-स्तरीय प्रशासनिक तंत्र होगा। सबसे ऊपर ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान संचालन समिति’ होगी जो रणनीतिक दिशा तय करेगी। इसके मुखिया ‘प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार’ होंगे और इसमें कई नौकरशाह (विज्ञान विभागों के सचिव) सदस्य के तौर पर शामिल होंगे। दूसरे स्तर पर स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग होगा, जो मुख्य समन्वय एजेंसी के तौर पर काम करेगा, और तीसरे स्तर पर आईसीएमआर होगा, जिसका जिम्मा वैज्ञानिक एवं तकनीक संबंधी कार्य करना होगा।

प्रस्तावित प्रशासनिक व्यवस्था राज्यों की भूमिका को कमज़ोर करती है और इस बात को नज़रअंदाज़ करती है कि जनस्वास्थ्य मुख्य रूप से राज्य का विषय है और ‘मेडिकल शिक्षा एवं अनुसंधान’ संविधान की समवर्ती सूची में है। स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा तय करने का अधिकार ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान संचालन समिति’ को देने से राज्य सिर्फ़ क्रियान्वयन करने वाली एजेंसी बनकर रह जाएंगे। नीति में कहा गया है, ‘राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्थानीय स्वास्थ्य ज़रूरतों के हिसाब से काम करने और कार्यक्रम बनाने, बतौर सेवा प्रदाता और जनस्वास्थ्य कार्यक्रम चलाने में मदद करेंगे’।

नीति एक और अहम बदलाव लाती है- ‘एकीकृत स्वास्थ्य’ को बढ़ावा देने के नाम पर आयुर्वेद और अन्य चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक मेडिसिन के लिए रखे अनुसंधान फ़ंड का इस्तेमाल करने की इजाज़त देना। ऐसा तब हो रहा है जब इन पद्धतियों के लिए आयुष मंत्रालय के तहत अलग से रिसर्च फंड और उसके द्वारा चलाए जा रहे तंत्र मौजूद हैं। इससे ‘पुष्टिकरण विज्ञान’ को बढ़ावा मिलेगा, मसलन, गोमूत्र से इलाज जैसे पारंपरिक ढंग की ‘आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के जरिए हुई पुष्टि’ दिखाना। साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग जैसी अन्य एजेंसियों से फ़ंडिड प्रोजेक्ट्स के ज़रिए ऐसा पहले ही हो रहा है।

भारत न सिर्फ़ भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से विविधता वाला देश है, बल्कि यहां स्वास्थ्य से जुड़ी कई तरह की ज़रूरतों और स्वास्थ्य तंत्र तक पहुंच में असमानताएं भी हैं। मसलन, केरल का स्वास्थ्य सूचकांक और चुनौतियां बिहार या ओडिशा से अलहदा हैं। राज्यों पर केंद्र से थोपा गया एजेंडा लागू करवाने के बजाय, उन्हें अपनी-अपनी प्राथमिकताओं व ज़रूरतों के आधार पर अपना-अपना स्वास्थ्य अनुसंधान ढांचा बनाने और विकसित करने में मदद व मार्गदर्शन दिया जाए। स्वास्थ्य अनुसंधान का मतलब सिर्फ़ नई तकनीक का परीक्षण या नई वैक्सीन और दवाएं बनाना नहीं। इसके परिणाम स्वास्थ्य नीति और बजट तय करने वाले हों। इसका बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य तंत्र के कामकाज व स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने से जुड़ा है, ताकि बेहतर नतीजे मिल सकें। स्वास्थ्य अनुसंधान एक सतत एवं गतिशील प्रक्रिया है, जो सामाजिक-आर्थिक कारकों से गहरी जुड़ी है। मसलन, शहरी गरीब और आदिवासी जैसे हाशिए पर मौजूद समूहों व समुदायों की सेहत समस्याओं पर अक्सर कम रिसर्च होती है। हाल के वर्षों में बड़ी संख्या में मेडिकल कॉलेज खोले गए। उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर रिसर्च करने को प्रेरित करने की ज़रूरत है।

दीर्घकालीन जरूरतों की खातिर एक समर्पित स्वास्थ्य अनुसंधान नीति बनाने का विचार लंबे समय से महसूस किया जा रहा था। हालांकि, यह नीति जिस दिशा में आगे बढ़ रही है-अनुसंधान एंजेडा विकसित करने को अपनाया केंद्रीकृत तरीका, निजी क्षेत्र को अहम भूमिका देना व आधुनिक मेडिकल स्वास्थ्य अनुसंधान में पारंपरिक चिकित्सा को जोड़ने वाला एजेंडा फिट करना- वह बल्कि ज्यादा हानिकारक है।

लेखक विज्ञान संबंधी विषयों के टिप्पणीकार हैं।

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